पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने लाइसेंसी असलहों और कारतूसों की जांच को बताया गैरकानूनी, दिए ये तर्क
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लाइसेंसी असलहों और कारतूसों के सत्यापन के दौरान लाइसेंस धारियों पर कायम किए गए मुकदमों पर पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह ने सवाल उठाए हैं। पिछले दिनों लखनऊ में लाइसेंसी शस्त्र और कारतूस के सत्यापन के दौरान कारतूसों का पूरा हिसाब नहीं दे पाने वाले चार असलहाधारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
सुलखान सिंह ने अपने फेसबुक पेज पर शस्त्र अधिनियम 2016 का उल्लेख करते हुए लिखा है, ‘लाइसेंस की शर्तों में ऐसी कोई शर्त नहीं है कि लाइसेंसी अपने कारतूसों का कोई रिकॉर्ड रखेगा। नियम 112 में कॉमन शर्तें दी गई हैं और इसमें भी ऐसी कोई शर्त नहीं है। जो शर्त अधिनियम में या नियमावली में नहीं है, वह किसी प्राधिकारी द्वारा नहीं लगाई जा सकती। इस आधार पर शस्त्र भी पुलिस अपने कब्जे में नहीं ले सकती। स्पष्ट है कि इस आधार पर लाइसेंस भी निरस्त नहीं किया जा सकता। पुलिस द्वारा लाइसेंस मांगने और शस्त्र कब्जे में लेने का प्रावधान शस्त्र की धारा 19 अधिनियम में है। इस धारा में कारतूसों का रिकॉर्ड रखने की शर्त शामिल नहीं है।’
उन्होंने आगे लिखा है कि नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहना ही चाहिए, पुलिस को भी गैरकानूनी कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखनी है लेकिन ‘व्यवस्था कानून के अंतर्गत’ रखनी है, कानून का अतिक्रमण करके नहीं।
कानून का शासन नागरिकों व पुलिस दोनों के हित में
पुलिस के लिए कानून का सख्त अनुपालन, शिष्ट सभ्य व्यवहार, नागरिकों के सम्मान की रक्षा और सभी को सम्मान देना ये चारों बातें जरूरी हैं। इनमें से एक में भी चूकेंगे तो पुलिस की शोहरत ठीक नहीं होगी। जनता के बीच अच्छी छवि के बिना पुलिस न तो अपने काम में सफल होगी और न ही झूठे आरोपों में निलंबन और जेल से बचेगी।
खराब छवि के कारण जनता, सरकारी विभाग और न्यायालय, पुलिस के खिलाफ लगाए गए किसी भी आरोप को सही मान लेते हैं। उन्होंने अंत में लिखा है कि कानून का शासन जो हमारे संविधान का मौलिक चरित्र है वह नागरिकों और पुलिस दोनों के हित में है।