'मेरी हर धड़कन शुक्रगुजार है लखनऊ की'
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लखनऊ के बारे में क्या-क्या कहूं और क्या न कहूं। मेरी तो नस-नस में समाया हुआ है यह शहर। पुराने शहर की वे संकरी गलियां, चौबारे और गोमती का किनारा। बहुत खूबसूरत, बेहद शांत।
मीठी-मीठी बोलियां और एक-दूसरे से संवाद करने की वह नजाकत। यही वे चीजें हैं, जिन्होंने मुझे एक पहचान दी। मेरी हर धड़कन इस शहर को हर पल शुक्रिया अदा करती है।
समय-समय के अंतराल पर हम पान दरीबा, इंदिरानगर और राजेंद्रनगर में रहे। मुझे याद है कि सुबह 7.30 बजे हॉकर अखबार डाल जाता था। चार-पांच घरों के बीच एक अखबार।
इतना ही नहीं जिसके यहां आता था, उसे सबसे अंत में पढ़ने को मिलता था। दरअसल अन्य चारों घरों में घूमते-घूमते तब वह अपने असली खरीदार के यहां पहुंचता था।
इसी तरह एक के घर में यदि फोन है तो बाकी पड़ोसियों की सभी कॉल्स उस फोन पर आया करती थीं। मजे की बात यह है कि इनमें कहीं कोई क्लेश नहीं दिखता। बेहद अपनेपन के साथ ये सारी गतिविधियां चलती रहती थीं। साझेपन का यह कॉन्सेप्ट अब कहां?
दुनिया बदलने का जज्बा लखनऊ में ही सीखा
जिस दौर में हमने लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई की, उस दौरान यूनिवर्सिटी लेवल पर सांस्कृतिक उत्सव आयोजित किए जाते थे। यह 80 के दशक की बात है।
नृत्य-संगीत के अद्भुत आयोजन होते थे। एक डिपार्टमेंट के लोग दूसरे से जुड़ते थे। सच कहूं तो संगीत के मेरे शौक, मेरे जुनून को एक नई दिशा देने में उन सांस्कृतिक उत्सवों का भी योगदान है।
इसके अलावा उस दौर का छात्रसंघ, यूं समझ लीजिए एकदम आदर्शवादी स्थिति, जिसकी कल्पना भी अब संभव नहीं। एक और खास गुण जो छात्रों में विकसित हुआ, वह यह कि हम स्टूडेंट्स स्लम्स में जाते, टीकाकरण के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते।
हमनें कई गांवों को गोद ले रखा था। सच कहूं तो दुनिया बदलने का जज्बा हमने इसी शहर में रहकर सीखा।
बर्दाश्त करने की गजब की क्षमता
लखनवियों की बर्दाश्त करने की क्षमता का जवाब नहीं। मैं शुक्रगुजार हूं उन सबका जिन्होंने हमारी नादानियों के साथ हमारे ड्रम के शोर को बर्दाश्त किया। इस घर से उस घर तक हम ड्रम बजाते रहते लेकिन उन्हें हमारे शोर से कोई परेशानी नहीं हुई।
या यह कहना ज्यादा सही होगा कि उन्होंने कभी शोर से होने वाली परेशानी का जवाब नाराजगी से नहीं दिया। कभी निरालानगर में किसी दोस्त के यहां तो कभी कहीं किसी के घर में बैठ जाते और शुरू हो जाता संगीत का अभ्यास।
सिटी गर्ल्स ने बताई हमारी अहमियत
1988-89 की बात है, आर्यन ग्रुप के कंसर्ट ‘शंखनाद’ का आयोजन अवध गर्ल्स कॉलेज में हुआ। यह कंसर्ट हमारे कॅरिअर के लिए भी वरदान साबित हुआ।
जिस तरीके से लड़कियां हमारे गीतों पर झूमीं और हमें वाहवाही मिली, उस दिन हमें अहसास हुआ कि हम कुछ हैं। हमारे गीत-संगीत में लोगों को झुमाने की क्षमता है। बस फिर क्या था आत्मविश्वास चरम पर पहुंच चुका था।