जानें, आखिर क्यों अयोध्या में रामजन्म भूमि का दर्शन करने नहीं गए राहुल गांधी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद भी ब्राह्मण नेता के रूप में अपनी पहचान बानने में लगे हैं। यही कारण है कि वे इन दिनों ब्राह्मणों के सम्मेलनों में दिखाई दे रहे हैं। जितिन प्रसाद से ब्राह्मण राजनीति व कांग्रेस राजनीति पर विस्तार से बातचीत की अमर उजाला के शोभित श्रीवास्तव ने...
सवाल- कांग्रेस जाति-धर्म के आधार पर राजनीति का हमेशा से विरोध करती आई है। लेकिन इस बार ब्राह्मणों की राजनीति करती दिखाई दे रही है?
जवाब- कांग्रेस हमेशा से ही सभी जाति-धर्म को साथ लेकर चलती आई है। सभी धर्म व जाति का प्रतिनिधित्व व भागीदारी होनी चाहिए। इस समाज को बनाने में ब्राह्मणों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। मगर सूबे में पिछले 27 साल से ब्राह्मण उपेक्षित महसूस कर रहा है। यदि कांग्रेस पार्टी ब्राह्मणों की बात कर रही है तो इसमें हर्ज क्या है।
'ब्राह्मणों का इस्तेमाल हर किसी ने दिया पर हिस्सा किसी ने नहीं दिया'
जवाब- पहली बात तो कांग्रेस ब्राह्मण सम्मेलन नहीं करवा रही है। यह सम्मेलन ब्राह्मण चेतना परिषद नाम की संस्था करवा रही है। उस संस्था ने हम लोगों को आमंत्रित किया था। इसलिए हम उसमें गए थे। ब्राह्मणों ने समाज के लिए त्याग किया है। जब तक ब्राह्मणों के हाथ में सूबे का नेतृत्व था तो वह सभी को साथ लेकर चलता था। आज थाने चौकियों में एक ही जाति के लोग तैनात हैं। सपा सरकार में एक ही जाति के लोगों का भला हो रहा है। ब्राह्मणों को कोई एहसान नहीं, केवल भागीदारी चाहिए। ब्राह्मणों का इस्तेमाल सब पार्टियों ने किया, लेकिन हिस्सा किसी ने नहीं दिया। कांग्रेस आज कम से कम उनकी बात तो रख रही है।
सवाल- कांग्रेस एक बार फिर हिंदू राजनीति की तरफ वापस आ रही है। राहुल गांधी का मंदिरों में जाना क्या उसी रणनीति का हिस्सा है?
जवाब- कांग्रेस सेकुलर थी और हमेशा रहेगी। इस पार्टी ने सभी धर्मों का सम्मान व प्रतिनिधित्व होता है। बीच में चंद पार्टियों ने जो धर्म के ठेकेदार बन गए, उन्होंने पूरा माहौल ही बिगाड़ दिया। वे धर्म के नाम पर राजनीति करने लगे, वोट के लिए धर्म के नाम पर लोगों को लड़वाते रहे। ऐसे ही धर्म के ठेकेदारों से यूपी को निजात दिलानी है। कांग्रेस हमेशा से मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे व गिरिजाघरों में जाती रही है। लेकिन कांग्रेस ने इनका इस्तेमाल वोट के लिए कभी नहीं किया।
सवाल- राहुल अयोध्या में हनुमान गढ़ी मंदिर गए, लेकिन राम जन्म भूमि नहीं गए। क्या विवाद से बचने के लिए उन्होंने ऐसा किया?
जवाब- राहुल जी हनुमान जी के मंदिर गए यह श्रद्घा का मामला है। इसे वोट के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। मंदिर कोई विवाद की जगह नहीं है। यह दुर्भाग्य की बात है कि भाजपा ने राम जन्मभूमि का राजनीतिकरण कर दिया है। इस कारण ही यह विवाद का विषय हो गया है। इसलिए आज आप भी यह सवाल कर रहे हैं।
'राहुल ने ही माफ करवाया था किसानों का कर्जा'
सवाल- कांग्रेस का आजकल पूरा जोर यात्राओं पर है। क्या आपको लगता है कि इसका सूबे की जनता पर कोई असर पड़ेगा?
जवाब- राहुल गांधी की किसान यात्रा को अपार समर्थन मिल रहा है। किसान आज त्रस्त हैं। उन्हें राहुल में एक उम्मीद की किरण नजर आ रही है। 'कर्जा माफ बिजली हाफ' का नारा किसानों को खूब भा रहा है। जब यूपीए की सरकार थी तो राहुल ने ही किसानों का कर्जा माफ किया था। इसलिए किसानों का समर्थन राहुल को यात्रा में मिल रहा है।
सवाल- अगर सब कुछ ठीक है तो फिर पार्टी के विधायक छोड़कर क्यों जा रहे हैं? अब तक आठ विधायक जा चुके है?
जवाब- चुनाव के मौके पर यह हमेशा से होता रहा है। अवसरवादी लोग हर पार्टी में होते हैं। जनता इन्हें पहचान जाती है। पार्टी से लोग जा भी रहे हैं और आ भी रहे हैं। लेकिन जो लोग जा रहे हैं उनका हश्र बहुत बुरा होगा, यह आप लोग भी देखेंगे। रही बात कांग्रेस में आने वालों की तो अभी रायबरेली के विधायक अखिलेश सिंह ने जॉइन किया है। कई लोग कांग्रेस में आना चाहते हैं। इसका खुलासा समय पर करेंगे।
वरिष्ठ नेताओं के आरोप है कि पीके कर देते हैं उनकी बेइज्जती
सवाल- प्रशांत किशोर से भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में बहुत नाराजगी है। वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि पीके उनकी इनसल्ट कर देते हैं?
जवाब- पीके कांग्रेस पार्टी की मदद के लिए लगाए गए हैं और वह पार्टी की मदद कर रहे हैं। जो पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, वे लोग ही झूठे लांछन लगा रहे हैं। ये वह लोग हैं जो दूसरी पार्टियों के एजेंट के रूप में कांग्रेस में काम करते थे। पीके नेता बनने नहीं बल्कि कांग्रेस की मदद करने आए हैं।
सवाल- ...तो सबसे पुरानी पार्टी को भी मैनेजर की जरूरत पड़ गई?
जवाब- मैनेजर की जरूरत नहीं है लेकिन हम लोकसभा चुनाव से यह कहते चले आ रहे हैं कि हम मार्केटिंग व कम्युनिकेशन में फेल हो गए थे। हम यूपीए की 10 साल की उपलब्धियां जनता तक नहीं पहुंचा पाए। इवेंट मैंनेजमेंट में विश्वास रखने वाली भाजपा जनता को बरगलाने में कामयाब हो गई। इसलिए पार्टी ने यह सोचा कि नए कम्युनिकेशन के माध्यम से भी जनता के बीच अपनी बात पहुंचाई जाए। पार्टी की नीतियों को ही वे जनता के बीच पहुंचा रहे हैं। उनका कहीं भी और कोई हस्तक्षेप नहीं है।