इंटरनेट यूज करते हैं तो हो सकती है ये बीमारी!
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इंटरनेट जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है,मगर इसकी लत आपको बीमार भी कर सकती है। अगर आप घंटों वर्चुअल दुनिया से जुड़े रहते हैं,तो इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर के शिकार हो सकते हैं।
‘इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर’का असर दिमाग पर ठीक वैसे ही पड़ता है,जैसे ड्रग्स या नशीली दवाओं के सेवन से नुकसान होता है। चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंस की स्टडी के अनुसार इंटरनेट की बुरी लत दिमाग को कमजोर करने के साथ कई अन्य तरह से नुकसान पहुंचाती है।
सफदरजंग अस्पताल की सीनियर रेजिडेंट साइकेट्रिस्ट डॉ. छवि भसीन कहती हैं कि क्या आप जानते हैं कि घंटों इंटरनेट से चिपके रहने की आदत एक मानसिक बीमारी ′इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर′ (आईएडी) का कारण बन रही है?
ऑनलाइन गेमिंग,पोर्नोग्राफी और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अधिक समय बिताना ज्यादातर लोगों की आदत बन चुकी है। ये आईएडी के शुरुआती लक्षण हैं। मगर,धीरे-धीरे व्यक्ति को इसकी लत लग जाती है। हालात ऐसे हो जाते हैं कि नेट का प्रयोग न कर पाने से गुस्सा,बेचैनी,चिड़चिड़ापन होने लगता है।
इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर के ये हैं लक्षण
आईएडी से ग्रस्त व्यक्ति पांच से दस घंटे का समय इंटरनेट पर बिताने लगता है। घर से बाहर निकलना,दोस्तों और परिवार को कम समय देना,खाना-पीना कम कर देना जैसे लक्षण सामने आते हैं।
हाथ एवं कलाई में दर्द,सूखी आंखें,वजन बढ़ना या घटना,हर काम कंप्यूटर के सामने बैठकर करना और अपने कमरे में अकेला रहते हुए राहत महसूस करना इस बीमारी के लक्षण होते हैं। कुछ शोधों में पाया गया है कि ‘इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर’से ग्रस्त लोग शराब और ड्रग्स जैसी चीजों को भी अपनाने लगते हैं।
‘इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर’ से ग्रस्त मरीज खुद को भावनात्मक रूप से कमजोर महसूस करने लगता है और उसका खुद पर नियंत्रण कम होने लगता है। हमेशा बेचैनी महसूस करना,तनाव,भूख न लगना,नींद न आना जैसी समस्या बढ़ जाती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के एक शोध के अनुसार इस बीमारी में मरीज हमेशा व्याकुल रहने लगता है। यही नहीं,किसी काम में मन न लगना,किसी भी काम पर फोकस न कर पाने जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।
ऐसे मिलेगी इस बीमारी से निजात
स्मार्टफोन,सोशल नेटवर्किंग साइट्स और पोर्नोग्राफी जैसी चीजें,धीरे-धीरे इंटरनेट का एडिक्ट बना देती हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैर्लिफोर्निया के शोध के अनुसार इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को इंटरनेट का प्रयोग कम करना चाहिए।
इसकी बजाय किताबों और संगीत को अपना दोस्त बनाइए। परिवार, दोस्तों के साथ समय बिताने से यह आदत धीरे-धीरे कम हो सकती है। पिछले कुछ समय में ‘इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर’के मामले तेजी से बढ़ते हुए देखे गए हैं।
′इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर′का उपचार दवाइयों के साथ-साथ बिहेवियर थेरेपी से किया जाता है। इसका आभास रोगी को नहीं होता। ग्रुप के साथ या अकेले भी यह थेरेपी दी जाती है। मरीज को धीरे-धीरे इंटरनेट की लत छोड़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। अगर वह दस घंटे इंटरनेट प्रयोग करता है, तो उसे पहले आठ घंटे फिर छह घंटे और फिर इससे भी कम इंटरनेट प्रयोग के लिए प्रेरित किया जाता है। इसकी जगह दूसरी गतिविधियों की और मरीज को आकर्षित किया जाता है।