'यूपी में तो सरकारी कर्मचारी पैसा लेकर भी रोक लेते हैं काम'
- पूर्व डीजीपी महेशचंद्र द्विवेदी ने पुस्तक में किए ब्यूरोक्रेसी के रोचक खुलासे
- राजधानी में हुआ ‘इंट्रेस्टिंग एक्सपोजर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ का विमोचन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
‘दूसरे प्रगतिशील राज्यों में जहां सचिवालयों में कर्मचारी पैसा लेकर काम तेजी से करते हैं, वहीं यूपी में कर्मचारी पैसा लेकर काम में बाधा पैदा करते हैं।’
ऐसे ही कई खुलासे प्रदेश के पूर्व डीजीपी महेशचंद्र द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘इंट्रेस्टिंग एक्सपोजर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ में किए हैं। इस पुस्तक का रविवार को विमोचन किया गया।
1963 बैच के आईपीएस अधिकारी महेशचंद्र ने अपनी पुस्तक में लगभग हर विभाग से जुड़े संस्मरणों को संजोया है। विकास से लेकर सुरक्षा तक के कामों में आईएएस और आईपीएस ऑफिसर आम तौर पर कैसा नजरिया रखते हैं, काम कैसे कराए जाते हैं और कैसे रोके जाते हैं, ऐसी कई भीतर की बातों की पोल उन्होंने खोली है।
सचिवालय यानी बाधाएं खड़ी करने वाला क्लब
1990 में पीडब्ल्यूडी के काम का बोझ कम करने के लिए सरकार ने निर्माण निगम, जल निगम, ब्रिज कॉर्पोरेशन, पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन आदि बनाए। इसके बाद हर प्रोजेक्ट के लिए छीना-झपटी होने लगी।
मंत्रियों और सचिवालय के अधिकारियों को इसके लिए रिश्वतें भी दी जाने लगीं। उन दिनों नए प्रोजेक्ट पर पीडब्ल्यूडी से ही तकनीकी अनुमति ली जाती थी।
पीडब्लयूडी ने अनुमति देने में देरी या फाइल रोकनी शुरू कर दी। द्विवेदी ने सचिवालय बैठक में यह मामला उठाया। तय हुआ कि कॉर्पोरेशन अपने महाप्रबंधकों का बायोडाटा अपने विभाग के सचिवों को भेजेंगे।
अगर वे योग्य पाए गए तो तकनीकी सहमति उन्हीं से ली जा सकेगी। द्विवेदी ने पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन के जीएम गोविंद राम का बायोडाटा भेजा जो बीई व एमई कर चुके थे।
छह महीने बाद सचिवालय से जवाब आया कि गोविंद राम की 10वीं और 12वीं की मार्क्सशीट नहीं भेजी गईं, इसलिए फाइल रोकी गई है। दरअसल पीडब्ल्यूडी और सचिवालय में मिलीभगत के चलते ऐसा किया गया था।
जवाब में द्विवेदी ने 12वीं और 10वीं के साथ क्लास 8 की मार्क्सशीट भी भेज दी। इस दफा फाइल को वित्त सचिव के पास भेजा जाना था, लेकिन एक महीने तक फाइल नहीं भेजी गई। पता चला कि विभाग के पास फाइल भेजने के लिए चपरासी नहीं है।
यूपी की पूर्व सीएम ने ऐसा जमाया ब्यूरोक्रेट के नए घर पर कब्जा
ब्यूरोक्रेसी में व्याप्त भ्रष्टाचार पर द्विवेदी लिखते हैं, एक ब्यूरोक्रेट ने नया घर बनवाया और भव्य गृह प्रवेश कार्यक्रम किया। वह ब्यूरोक्रेट सीएम का करीबी था। उनके मोबाइल में रिंग टोन लगी थी ‘मनवां काहे गुमान करे’।
फोन बजा और दूसरी ओर से संदेश दिया गया कि सीएम उनसे मिलना चाहती हैं। यह बात उन्होंने कार्यक्रम में खूब जोर-शोर से बताई। अगली सुबह वे सीएम से मिलने उनके घर गए। सीएम ने उन्हें बधाई दी तो उन्होंने जवाब में कहा ‘थैंक यू मैडम’।
सीएम ने पूछा कि घर कितने में बनवाया तो ब्यूरोक्रेट ने जवाब दिया, ‘40 लाख रुपये में’। वह यह बताने की स्थिति में नहीं था कि ऊपरी आमदनी के 1.60 करोड़ भी मकान में लगाए हैं।
सीएम के अधरों पर मुस्कान आई, दोनों की नजरें मिलीं और सीएम ने अपने निजी सचिव को बुलाया। ब्यूरोक्रेट को 40 लाख रुपये कैश दिए और उन्हें अपने घर की चाबियां और कागजात निजी सचिव को देने के लिए कहा।
सीएम ने ब्यूरोक्रेट को समझाया कि यह मकान उनके भाई के ऑफिस के पास है। उसे सुविधा होगी। इस बार ब्यूरोक्रेट का फोन फिर से घनघनाया ‘मनवां काहे गुमान करे’।
'इतनी बड़ी रकम के लिए मैं खुद सस्पेंड होने को तैयार था'
1995 में इलाहाबाद के वकीलों ने हाईकोर्ट परिसर में तोड़फोड़ की। मुख्य न्यायाधीश के चैंबर तक को नहीं छोड़ा। चीफ जस्टिस इससे खुश नहीं थे, लेकिन जज के लिए वकीलों पर एक्शन लेना आसान नहीं होता।
ऐसे में उन्होंने अपना गुस्सा सूबे की सरकार पर निकाला। अफवाह थी कि वे शाम तक प्रदेश सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल करार देते हुए बर्खास्त करने के लिए लिखने जा रहे हैं।
सूचना सूबे के पहलवान सीएम के पास पहुंची। उन्होंने इलाहाबाद जोन के आईजी को तुरंत सस्पेंड कर दिया। उनका यह कदम जज का गुस्सा शांत करने के लिए था।
दूसरी ओर उन्होंने सस्पेंड किए गए आईजी को बुलाया और चुपचाप एक लिफाफा थमा दिया। इसमें चार लाख रुपये थे जो यह कहकर दिए गए कि कुछ महीने सस्पेंड रहने पर वह चुप रहे।
आज से 20 साल पहले यह राशि बहुत बड़ी थी और द्विवेदी के अनुसार वे खुद इस रकम के लिए किसी भी समय सस्पेंड होने को तैयार थे।