सरकारी अस्पतालों को दलालों ने बनाया मंडी, निजी हॉस्पिटल को बेचे जा रहे मरीज, यूं होता है सौदा
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लखनऊ में मरीज बिकते हैं। चौंकिए नहीं...। ये हकीकत है...। इनकी दुकानें हैं। मंडियां हैं, जहां बाकायदा सौदा होता है। दूसरे जिलों से लाए गए मरीजों की बोली लगती है। निजी अस्पताल से ऑफ र दिया जाता है। एक मरीज के इलाज में वसूली जाने वाली रकम का 30- 35 प्रतिशत हिस्सा।
आजकल इन मंडियों में यही भाव चल रहा है। आप इसे दलाली कहिए, कमीशन कहिए पर ये धंधेबाजों के लिए इंसेंटिव है! आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि मरीज को बिल भुगतान न करने पर बंधक बना लिया गया। उससे वसूली की। दलाल निजी अस्पताल तक पहुंचा गया।
आखिर इन खबरों के पीछे हकीकत क्या है, कितना बड़ा नेटवर्क है ये, यह जानने के लिए हमने पड़ताल की। इसमें सामने आया कि ये काम निजी एंबुलेंस संचालक कर रहे हैं। इनका काम है केजीएमयू समेत सरकारी अस्पतालों को रेफर किए गए मरीज के परिवारीजनों को डराना। मसलन, वहां भीड़ बहुत है।
डॉक्टर ध्यान नहीं देते। डॉक्टर की लापरवाही से ये मर गया था... वो मर गया। फिर अच्छे इलाज का भरोसा देकर वहां पहुंचा दिया जाता है जहां उनकी सेटिंग होती है। जहां उन्हें मोटा कमीशन मिलता है।
.... ऐसे आया सेटिंग का गंदा खेल सामने
निजी एंबुलेंस के जरिए अस्पतालों में सेटिंग होती है, ये जानकारी सामने आती है हमारे रिपोर्टर ने निजी अस्पतालों से संपर्क किया। उन्हें यकीन दिलाने के लिए विजिटिंग कार्ड छपवाए। ताकि उन्हें यकीन दिलाया जा सके कि हम एंबुलेंस का संचालन कराते हैं। ट्रॉमा सेंटर व सरकारी अस्पतालों से रेफर होने वाले मरीज लाते हैं।
विजिटिंग कार्ड को अस्पतालों तक पहुंचाया गया। अस्पताल संचालकों से मरीजों को लाने को लेकर सौदेबाजी की गई। इस मामले का सभी अस्पतालों को वीडियो फुटेज व ऑडियो रिकार्डिंग अमर उजाला के पास मौजूद हैं।
देखें- ऐसे होता है सौदा
फैजुल्लागंज सीताराम मंदिर स्थित निजी अस्पताल
रिपोर्टर : हमारी एंबुलेंस ट्रॉमा पर लगती है, नया काम शुरू किया है, मरीज लाकर देंगे क्या कमीशन मिलेगा?
अस्पताल संचालक : पहले मरीज तो लाओ... सबसे ज्यादा देंगे। मरीज को लाने पर पहले कुछ एडवांस मिल जाएगा। मरीज जिस दिन डिस्चार्ज होगा, उस दिन फोन करके बुलाकर हिसाब कर दिया जाएगा।
रिपोर्टर : कई अस्पताल होकर आ रहे हैं, आप सही पैसा दो तो आप के ही यहां मरीज डाल दिया करें ?
संचालक : कमीशन का तो कोई झंझट ही नहीं है। साफ काम होता है...। ऐसा नहीं होगा कि मरीज से अधिक बिल वसूलकर तुमको कम बताया जाए। साथ काम करोगे तो पैसा रख नहीं पाओगे (खूब पैसा मिलेगा)...।
खदरा चुंगी स्थित निजी अस्पताल एंड मैटरनिटी सेंटर
रिपोर्टर : डॉक्टर साहब, हम एंबुलेंस वाले हैं। ट्रॉमा-लोहिया संस्थान पर गाड़ियां लगती हैं। मरीज भेज दिया करें... क्या देंगे?
अस्पताल संचालक : मरीज भेजना शुरू करो जो सबको देते हैं वही तुमको भी मिल जाएगा।
रिपोर्टर : डॉक्टर साहब 50 हजार रुपये काउंटर पर जमा करा देंगे, 20 हजार मुझे दिलवा दीजिएगा।
संचालक : अभी नया अस्पताल शुरू किया है। किसी तरह का कोई विवाद नहीं चाहते हैं। मरीजों से वसूली नहीं करते हैं। इलाज में जो मिलेगा उसका 30 प्रतिशत दे देंगे। बहुत ज्यादा हुआ तो 35 (प्रतिशत) तक देंगे।
यहां देखें- ऐसे होता है सौदा
रिपोर्टर : एंबुलेंस का नया सेटअप डाला है, ट्रॉमा से वापस किए गए मरीज चाहिए?
संचालक : हर रोज कितने मरीज दे पाओगे?
रिपोर्टर : एक या दो तो जरूर भेज देंगे।
संचालक : भेजना शुरू करो फिर देखते हैं।
रिपोर्टर : एक मरीज पर क्या मिलेगा ?
संचालक : मरीज लाने पर एडवांस 5 हजार तक दे देंगे, मरीज के डिस्चार्ज होने पर पूरा हिसाब कर दिया जाएगा। सारा खेल भरोसे का है...।
संचालक : यह जेब से पहले मोबाइल हटाओ?
रिपोर्टर : लो चेक कर लो साहब, मोबाइल में कुछ है ही नहीं, लो देख लो।
दुबग्गा चौराहा स्थित निजी हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर
रिपोर्टर : ट्रॉमा सेंटर से एंबुलेंस चलाने का नया काम शुरू किया है?
संचालक- किस तरह काम करते हो, क्या चाहिए एक मरीज का?
रिपोर्टर : सभी जगह पर तीस प्रतिशत खुला रेट चल रहा है, साहब हमको एडवांस चाहिए।
संचालक : मरीज तो लाओ पहले...। कुछ एडवांस मिल जाएगा, बाकी मरीज के डिस्चार्ज होने पर...। बचा हुआ पैसा सीधे तुम्हारे खाते में चला जाएगा। हम तुमको 35 प्रतिशत तक देंगे, जाओ खुश...।
संचालक : हम एंबुलेंस चालकों संग बेईमानी नहीं करते हैं, पूरा काम साफ होता है।
रिपोर्टर : ठीक है, फिर अपना विजटिंग कार्ड दीजिए मरीज भेजते हैं फिर आपको
...तो क्यों न हो सौदा
राजधानी के 90 फीसदी अस्पताल मानक पूरे नहीं करते। फायर का एनओसी तक नहीं है फिर भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। ज्यादातर में न तो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और न सुविधाएं। कमीशन देकर मरीज मंगाए जाते हैं और उनका इलाज भी ठेके पर बुलाए गए डॉक्टर करते हैं।
स्वास्थ्य महकमा कार्रवाई नहीं करता
मरीजों की सौदेबाजी को लेकर अक्सर खबरें आती हैं पर स्वास्थ्य महकमा फौरी तौर पर कुछ सक्रियता दिखाकर शांत बैठ जाता है। क्यों...? इस सवाल के जवाब तलाशने होंगे। बहरहाल अफसरों की रटी-रटाई दलील होती है कि शिकायत आने पर कार्रवाई होती है। पर हकीकत ये भी है कि शिकायत आने पर मनमाफि क रिपोर्ट लगाकर मामले को निपटा दिया जाता है।
जिम्मेदारों को ये क्यों नहीं दिखता...
केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में करीब 390 बेड हैं, जो हमेशा लगभग फुल रहते हैं। यहां रोजाना करीब 300-400 मरीज आते हैं, जिसमें 50-60 बमुश्किल भर्ती होते हैं। बाकी मरीजों को दूसरे संस्थान रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में ट्रॉमा सेंटर के बाहर लगा एंबुलेंस का जमावड़ा मरीजों को सरकारी अस्पताल ले जाने के बजाय निजी अस्पताल पहुंचाते हैं। इसे लेकर आए दिन विवाद भी होता है। यही हाल एसजीपीजीआई व लोहिया संस्थान का भी है। इन संस्थानों में जो मरीज भर्ती नहीं किए जाते उनमें से 90 फीसदी निजी अस्पताल पहुंच रहे हैं।
सीएमओ बोले-जांच कराकर कार्रवाई करेंगे
मरीजों की शिफ्टिंग का मामला बेहद गंभीर है। जो भी निजी अस्पताल इसमें लिप्त हैं, उनकी जांच कराई जाएगी। उन्हें बंद कराने की संस्तुति की जाएगी। - डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, सीएमओ