पंचायत चुनाव में भाजपा की राह रोकेंगे अपने ही 'कबीले'
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मिशन पंचायत चुनाव में फतह के लिए भाजपा के रणनीतिकारों को पहले अपने ही स्थानीय नेताओं के कबीलों से पार पाना होगा। बिना इसके मिशन की कामयाबी आसान नहीं दिख रही है।
भले ही इन नेताओं का समर्थन पार्टी उम्मीदवारों को बहुत लाभ न पहुंचा पाता हो, लेकिन इनकी बेरुखी उम्मीदवारों का नुकसान जरूर कर देगी।
पार्टी के रणनीतिकार और मौजूदा नेतृत्व भले ही यह तर्क दें कि लोकसभा चुनाव में तमाम लोगों के विरोध के बावजूद पार्टी को सूबे में अब तक की सबसे बड़ी जीत मिली। पर, राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो लोकसभा और पंचायत चुनाव में बहुत फर्क होता है।
लोकसभा चुनाव मुख्य रूप से पार्टी की धारा और केंद्र में सरकार बनवाने के लक्ष्य पर केंद्रित होते हैं। इसलिए किसी एक चेहरे के सहारे भी चुनाव लड़ा जा सकता है।
नये पुराने नेताओं के बीच शीतयुद्घ की स्थिति
पंचायत चुनाव के मद्देनजर भूमिका महत्वपूर्ण : पंचायत चुनाव में लोग स्थानीय मुद्दों और नेताओं की उपलब्धता को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं। इसलिए किसी भी पार्टी के स्थानीय नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां जिलों के स्तर पर नए बनाम पुराने भाजपाइयों के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति है। कई जगह सांसदों के अपने समर्थकों के समूहों के वर्चस्व से पार्टी के स्थानीय पुराने लोगों में नाराजगी की बात मुखर हो चुकी है।
पार्टी के साथ सक्रिय करने की चुनौती : जाहिर है पार्टी को पंचायत चुनाव के मद्देनजर इन स्थानीय नेताओं को चुनावी गतिविधियों में सक्रियता के साथ जोड़ना होगा। कारण, भले ही लोकसभा चुनाव में इनका बहुत प्रभाव न दिखा हो लेकिन स्थानीय स्तर पर इनकी प्रसन्नता, नाराजगी या उदासीनता पार्टी के परिणामों पर कहीं न कहीं प्रभाव जरूर डालेगी।
शायद यही वजह है कि पिछले दिनों पार्टी के प्रदेश प्रभारी ओम माथुर ने लखनऊ में पंचायतों के प्रतिनिधि रह चुके भाजपा के लोगों को बुलाकर लंबी बातचीत भी की।