सहारनपुर मंडल की रिपोर्ट: सभी सीटों पर तगड़ा मुकाबला, मुजफ्फरनगर व शामली में दिखेगा किसान आंदोलन का असर
यूपी चुनाव 2022 में सहारनपुर मंडल की सभी सीटों पर तगड़ा मुकाबला होगा। यह क्षेत्र चुनावी योद्धाओं की परीक्षा तो लेगा ही, जज्बातों और मुद्दों की तपिश की भी थाह लेगा। मुजफ्फरनगर व शामली में किसान आंदोलन का असर दिखेगा।
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विस्तार
सहारनपुर मंडल में जज्बातों का तूफान है। पलायन का मुद्दा भले ही नया न हो, पर इसकी तपिश बरकरार है। कृषि कानून भले ही वापस ले लिए गए हों, पर इनको लेकर यहां की फिजाओं में सवाल तो हैं ही। ...तो वहीं धर्म-सम्प्रदाय की लक्ष्मण रेखाएं भी हैं, जो बदस्तूर हर चुनाव में नजर आती हैं। बहरहाल, आंकड़े बताते हैं कि 16 विधानसभा सीटों वाले इस मंडल में भाजपा ने 2017 में 12 सीटें जीती थीं। कांग्रेस के लिए यहां का परिणाम थोड़ा ठीक रहा और दो सीटें जीतकर वह भी सपा के बराबर खड़ी हो गई थी। अलबत्ता बसपा यहां खाता नहीं खोल सकी थी। पर, अब हालात बदले हैं। 2022 के लिए सज रहा चुनावी मैदान सपाट कतई नहीं है। चुनावी योद्धाओं की परीक्षा तो यह मैदान लेगा ही, जज्बातों और मुद्दों की तपिश की भी थाह लेगा।
एक तरफ उत्तराखंड तो दूसरी तरफ हरियाणा को जोड़ने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश का अहम मंडल है सहारनपुर। बात यहां के विकास से शुरू करते हैं। थानाभवन निवासी राजपाल सिंह कहते हैं, मुजफ्फरनगर-सहारनपुर स्टेट हाईवे पर काम हुए। फ्लाईओवर बने तो जाम से निजात भी मिली। हरियाणा और उत्तराखंड को यूपी से जोड़ने वाला बाईपास बना। पानीपत से कैराना, शामली, मुजफ्फरनगर को पौड़ी तक जोड़ने वाले मार्ग पर काम शुरू होने जा रहा है। इस सबसे बदलाव तो आया है। इसका फायदा सत्तारूढ़ दल को मिलेगा। वहीं, चुनावी समर कैसा होगा
इस सवाल पर शुक्रताल निवासी किशोर कुमार विकास कार्यों की फेहरिस्त गिनाने लगते हैं। वह कहते हैं, सहारनुपर में मां शाकुंभरी देवी विश्वविद्यालय का शिलान्यास हुआ। रामपुर मनिहारन में राजकीय पॉलीक्लीनिक बन गया है। हां, आप यह जरूर मीन-मेख निकाल सकते हैं कि यह अभी चालू नहीं हो पाया है। दिल्ली-यमुनोत्री हाईवे पर दो फेज में काम चल रहा है। शामली तक तो यह पूरा भी हो चुका है। इसके आगे सहारनपुर में आरओबी का काम होना है। सड़क लगभग बनकर तैयार है। यह मार्ग बेहद खराब था। चलना मुश्किल था। पर, अब हालात बिल्कुल बदल गए हैं।
इस सबका फायदा चुनाव में भाजपा को मिलेगा। राजेश कुमार विकास कार्यों पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं, राजकीय मेडिकल कॉलेज पिलखनी में पीजी कोर्स शुरू तो हो गया, पर सुविधाओं का अभाव है। एमआरआई तक यहां नहीं हो पाती है।
उद्यमियों की समस्याएं बरकरार
चुनावों की बात छिड़ते ही उद्यमी खुलकर तो कुछ नहीं बोलते, पर अपनी समस्याएं और सवाल रख वे एक इशारा जरूर करते हैं। बात उस वुड कार्विंग उद्योग की जो सहारनपुर की पहचान देश भर में कराता है। पर, यह उद्योग कच्चे माल की किल्लत से जूझता रहता है। चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज एवं सविर्सेज के चेयरमैन रविंद्र मिगलानी कहते हैं, सरकार को वुडन हैंडीक्राफ्ट के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करना चाहिए।
वुड सिटी विकसित हो। क्योंकि यह उद्योग सालाना करीब एक हजार करोड़ का निर्यात करता है, जो पांच हजार करोड़ रुपये तक जा सकता है। इसमें लगभग दो लाख लोगों को काम मिलता है। यूएस मार्केट में हमारे उत्पादों की मांग बढ़ी है पर कच्चे माल के दाम भी बेतहाशा बढ़े हैं। पैकिंग मैटीरियल महंगा हो गया। कंटेनर लॉजिस्टिक के लिए 30 से 40 प्रतिशत ज्यादा चुकाना पड़ रहा है। इस पर भी ध्यान दिया जाए। सहारनपुर से रोजाना लगभग एक हजार ट्रॉली पॉपुलर की लकड़ी यमुनानगर जाती है। वहां के बजाय सहारनपुर को ही प्लाईवुड औद्योगिक क्षेत्र के रूप में क्यों नहीं विकसित किया जाता?
सरकारें सोच ही नहीं रहीं...
बेहट के रामवीर सिंह चुनावी चर्चा छिड़ते ही मायूस हो जाते हैं। वह कहते हैं, घाड़ क्षेत्र में जल संकट की बड़ी समस्या है। यमुना नदी जब उफान पर आती है तो कई गांवों के मार्ग बंद हो जाते हैं। इन समस्याओं से निजात दिलाने की कोई ठोस नीति नहीं है। बड़गांव निवासी प्रह्लाद कुमार कहते हैं, सरकारें सोच ही नहीं रही हैं। हिंडन और काली नदी के प्रदूषण से लोग परेशान हैं। खास तौर पर बड़गांव क्षेत्र में पानी इस कदर प्रदूषित है कि क्षेत्र में कई लोगों की मौत तक हो चुकी है। इस समस्या का कोई निदान नहीं ढूंढा गया है। जड़ौदा निवासी मोहम्मद सुलेमान भी ऐसा ही सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि इन समस्याओं का निदान होना ही चाहिए। तभी तो आमजन का भरोसा बढ़ेगा।
गन्ना बड़ा मुद्दा: छह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया, 90 प्रतिशत से ज्यादा भुगतान का दावा
सहारनपुर मंडल में गन्ना हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। यहां 17 चीनी मिलें हैं। इनमें सहारनपुर की देवबंद, गांगनौली, शेरमऊ, गागलहेड़ी, नानौता, सरसावा हैं। मुजफ्फरनगर की खतौली, तितावी, बुढ़ाना, मंसूरपुर, टिकौला, खाई खेरी, रोहाना, मोरना एवं शामली की थानाभवन, शामली, ऊन चीनी मिलों में किसान अपना गन्ना डालते हैं। गन्ने का समय से बकाया भुगतान न होने के कारण आंदोलन होते ही रहे हैं।
मंडल की सभी मिलों पर छह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया था। हालांकि, 90 प्रतिशत से ज्यादा भुगतान होने के दावे किए जा रहे हैं। शामली निवासी राजन जावला कहते हैं, यह इलाका गन्ना मंत्री सुरेश राणा का है। क्षेत्र होने के कारण यहां शत-प्रतिशत भुगतान पहले ही हो जाना चाहिए था। पर, आलम यह है कि उनके ही क्षेत्र की मिलों पर बकाया है।
सियासी प्रयोगशाला में कैराना फॉर्मूला
वर्ष 2017 के चुनाव से ऐन पहले कैराना का पलायन मुद्दा जोर-शोर से प्रदेश भर में गूंजा था। सियासी गलियारों में यह चर्चा आम रही कि इसी फॉर्मूले के दम पर भाजपा ने प्रदेश में सरकार बना ली। हालांकि, इस मुद्दे को उठाने वाले बाबू हुकुम सिंह 2014 में सांसद बन गए थे। वह कैराना से विधायक भी थे। उन्होंने सीट छोड़ी तो पहले उपचुनाव में और फिर 2017 के चुनाव में मृगांका सिंह भाजपा से चुनावी मैदान में उतरीं, पर सपा के नाहिद हसन चुनाव जीत गए।
स्थानीय निवासी अशफाक राणा कहते हैं, कैराना के मुद्दे को आज भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है। उनकी बात में दम भी लगता है। सीएम योगी आदित्यनाथ का वहां जाना और पलायन के बाद वापस लौटे लोगों से बात करना, उन्हें आश्वस्त करना, इन सबसे यह मुद्दा गरमा तो जरूर ही गया है।
जाटलैंड, सिसौली, भाकियू फैक्टर
सहारनपुर में वैसे तो पूरे मंडल में भाकियू का असर है पर मुजफ्फरनगर और शामली की नौ सीटों पर इसका बड़ा प्रभाव है। सिसौली से भाकियू की राजनीति का केंद्र है। वैसे भी भाकियू ने लगभग एक साल से आंदोलन का बिगुल बजा रखा है। कई जगह पर सत्ताधारियों का विरोध भी किया गया। इस इलाके में जाट वोटों की अहम भूमिका होती है। जाटों ने पिछले चुनाव में भाजपा को जमकर सपोर्ट किया था और पूरे मंडल में भाजपा की नैया पार लगा दी थी। इस बार सपा और रालोद का गठबंधन है। माना जा रहा है कि भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।
दलबदल का भी पड़ेगा असर
कांग्रेस के कद्दावर नेता और प्रियंका गांधी की सलाहकार समिति के सदस्य सहारनपुर के इमरान मसूद इस समय सुर्खियों में हैं। दरअसल उनके सपा में जाने की चर्चा तेज है। हालांकि इमरान कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है। पर, कहा जा रहा है कि वे कुछ सीटें मांग रहे हैं और सहमति होते ही सपा का दामन थाम सकते हैं।
इसके अलावा अन्य नेताओं का भी दूसरे दलों में शामिल होना यहां के चुनावी समीकरणों पर असर डाल सकता है। कांग्रेस के हरेंद्र मलिक एवं उनके बेटे पूर्व विधायक पंकज मलिक सपा का दामन थाम चुके हैं। कांग्रेस के पूर्व विधायक अब्दुल वारिस रालोद में जा चुके हैं। बसपा के पूर्व सांसद कादिर राणा भी सपा में जा चुके हैं।
खापों का महत्व व मायावती का फॉर्मूला
खासतौर पर सहारनपुर जिले की सात सीटों पर बसपा हमेशा प्रभाव डालती रही है। दरअसल, इन सीटों पर दलित वोटरों की खासी संख्या है। साथ ही मुस्लिमों की भी अच्छी तादाद है। दलित-मुस्लिम समीकरण यहां किसी की चुनावी नैया पार लगा सकती है। हालांकि इस चुनाव में यह समीकरण बनता नहीं दिख रहा है। दलित वोटर मायावती के साथ नजर आ रहे हैं, तो उतनी ही शिद्दत से मुस्लिम भी सपा के साथ दिख रहे हैं। बसपा प्रमुख मायावती यहां इस फॉर्मूले पर फिर से काम करना चाह रही हैं।
भाजपा ने ढहा दिया था देवबंद का दुर्ग
दीनी तालीम के बड़े इदारे दारुल उलूम से देवबंद की विश्व भर में पहचान है। एक दौर ऐसा भी था जब यहां से जारी किए गए फतवे सियासत का मुस्तकबिल तय कर देते थे। पिछले चुनाव में भाजपा ने देवबंद का दुर्ग ढहा दिया।
यहां 1952 में कांग्रेस के ठाकुर फूल सिंह, 1957 में निर्दलीय ठाकुर यशपाल सिंह जीते। फिर 1962, 1967 में कांग्रेस के फूल सिंह, 1969 और 1974 में कांग्रेस के महावीर राणा जीते। फिर 1977 में जेएनपी, जबकि 1980, 1985 और 1989 में कांग्रेस के महावीर राणा जीते। 1991 में जनता दल के विरेंद्र ठाकुर, 1993,1996 में भाजपा, 2002 व 2007 में बसपा और 2012 में सपा जीती। 2017 में भाजपा के कुंवर बृजेश सिंह यहां से चुनाव जीत गए।
देवबंद का यह महत्व है कि लोकसभा चुनाव 2019 में बसपा सुप्रीमो मायावती, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह एवं जयंत ने यहीं पर पहली बार मंच साझा किया था। मायावती ने तो मंच से ही मुस्लिमों को आगाह भी कर दिया था। मंशा पूरे पश्चिमी यूपी में संदेश देने की थी, पर बात नहीं बनी और भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की।
सीटों का गणित: सहारनपुर (7 सीटें)
गंगोह : भाजपा के कीरत सिंह विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब एक लाख, गुर्जर व अनुसूचित जातियां 45-45 हजार, सैनी 25 हजार, ब्राह्मण व जाट 15-15 हजार, कश्यप 12 हजार।
नकुड़ : आयुष राज्यमंत्री डॉ. धर्म सिंह सैनी यहां से विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.30 लाख, अनुसूचित जातियां 65 हजार, सैनी 40 हजार, गुर्जर 35 हजार, कश्यप 20 हजार, जाट 10 हजार।
रामपुर मनिहारान : भाजपा के देवेंद्र निम विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां करीब 80 हजार, मुस्लिम 70 हजार, गुर्जर 55 हजार, सैनी 20 हजार, कश्यप 18 हजार, जाट 12 हजार।
सहारनपुर नगर : सपा के संजय गर्ग विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.70 लाख, वैश्य 50 हजार, अनुसूचित जातियां 30 हजार। वहीं, पंजाबी 1.10 लाख हैं।
सहारनपुर देहात : कांग्रेस के मसूद अख्तर विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.30 लाख, अनुसूचित जातियां 80 हजार, क्षत्रिय 14 हजार, ब्राह्मण व कश्यप 10-10 हजार, यादव व सैनी 8-8 हजार।
देवबंद : भाजपा के बृजेश सिंह विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.05 लाख, अनुसूचित जातियां 75 हजार, गुर्जर व क्षत्रिय 35-35 हजार।
बेहट : कांग्रेस के नरेश सैनी विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.50 लाख, अनुसूचित जातियां 65 हजार, सैनी 35 हजार, ठाकुर 15 हजार, कश्यप 10 हजार।
मुजफ्फरनगर (6 सीटें)
बुढ़ाना : भाजपा के उमेश मलिक विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.45 लाख, जाट 75 हजार, अनुसूचित जातियां 40 हजार, क्षत्रिय 20 हजार, कश्यप, सैनी व त्यागी 15-15 हजार, वैश्य 5 हजार।
चरथावल : भाजपा से स्व. विजय कश्यप जीते थे।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.25 लाख, अनुसूचित जातियां 60 हजार, जाट 40 हजार, कश्यप 30 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, ब्राह्मण व त्यागी 12 हजार, सैनी 10 हजार।
पुरकाजी : भाजपा के प्रमोद ऊटवाल विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.10 लाख, अनुसूचित जातियां 85 हजार, जाट 30 हजार, ब्राह्मण व त्यागी 30 हजार, गुर्जर 20 हजार, वैश्य, सैनी, कश्यप 5-5 हजार।
मीरापुर : भाजपा के अवतार भड़ाना विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.10 लाख, अनुसूचित जातियां 60 हजार, जाट 35 हजार, गुर्जर 30 हजार, पाल 15 हजार, कश्यप 10 हजार, सैनी, ब्राह्मण-त्यागी 5-5 हजार।
खतौली : भाजपा के विक्रम सैनी विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 90 हजार, अनुसूचित जातियां 50 हजार, सैनी 35 हजार, जाट 30 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, गुर्जर 25 हजार, ब्राह्मण व त्यागी 8 हजार, कश्यप 8 हजार, वैश्य 5 हजार।
मुजफ्फरनगर : भाजपा के कपिल देव अग्रवाल विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.30 लाख, वैश्य 70 हजार, जाट, पाल व अनुसूचित जातियां 20-20 हजार, ब्राह्मण व त्यागी 20 हजार। इनके अलावा करीब 30 हजार पंजाबी भी हैं।
शामली (3 सीटें)
कैराना : सपा के नाहिद हसन विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.37 लाख, कश्यप 40 हजार, गुर्जर 26 हजार, जाट 19 हजार, सैनी 12 हजार, जाटव 10 हजार, नाई व बढई 10 हजार, ब्राह्मण 8 हजार।
शामली : भाजपा के तेजेंद्र निर्वाल विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 70 हजार, जाट 68 हजार, जाटव 44 हजार, वैश्य 38 हजार, कश्यप 25 हजार, ब्राह्मण 22 हजार, गुर्जर 21 हजार।
थानाभवन : कैबिनेट मंत्री सुरेश राणा यहां से विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.06 लाख, जाट 52 हजार, जाटव 45 हजार, कश्यप 35 हजार, सैनी 25 हजार, क्षत्रिय 18 हजार, ब्राह्मण 15 हजार, नाई, बढ़ई एवं जोगी 15 हजार।