राज्यपाल राम नाईक ने दो विधेयक राष्ट्रपति को भेजे
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राज्यपाल राम नाईक ने महापौरों और नगर निकायों के अध्यक्षों के अधिकारों पर अंकुश लगाने वाले राज्य सरकार के दो विधेयकों को संविधान और नैसर्गिक न्याय के खिलाफ बताते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पास भेज दिया है।
दोनों विधेयक लंबे समय से राजभवन में लंबित थे। इन्हीं विधेयकों को मंजूरी न देने से खफा कैबिनेट मंत्री आजम खां राजभवन व राज्यपाल पर निशाना साधते आ रहे थे। राज्यपाल ने इन विधेयकों को राष्ट्रपति को भेजने की जानकारी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी दे दी है।
राजभवन के अनुसार, राज्यपाल ने ‘उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक, 2015’ तथा ‘उत्तर प्रदेश नगरपालिका विधि (संधोधन) विधेयक, 2015’ को निर्णय के लिए राष्ट्रपति को संदर्भित कर दिया है।
राज्यपाल ने दोनों विधेयकों के परीक्षण में पाया कि इनके कुछ प्रावधान 1992 में संविधान के 74वें संशोधन द्वारा अध्याय 9-ए के अनुच्छेद 243-पी(म), 243-यू, 243-क्यू, 243-डब्ल्यू, 243-जेड.एफ. तथा अनुच्छेद 246(3) के विरुद्ध हैं। साथ ही विधेयकों के प्रावधान संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2 (राज्य सूची) के प्रविष्ट 5 के प्रावधानों का भी उल्लंघन करते हैं। ये स्थानीय स्वशासन की अवधारणा और लोकतंत्र की भावना के भी प्रतिकूल हैं।
राज्यपाल ने राष्ट्रपति को ये बातें पत्र में लिखीं
राज्यपाल ने राष्ट्रपति को विधेयकों को भेजते हुए लिखा है कि प्रदेश सरकार ने संशोधन विधेयक के जरिये उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 में नई धारा 16-ए जोड़ी है।
इसमें राज्य सरकार को अधिकार दिया गया है कि वह नगर निगमों के महापौरों और नगर पालिकाओं के अध्यक्षों के विरुद्ध भ्रष्टाचार, निष्क्रियता, अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायत पर महापौरों और अध्यक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगेगी।
जवाब से संतुष्ट न होने पर सरकार महापौरों और अध्यक्षों के सभी प्रशासनिक व वित्तीय अधिकारों पर रोक लगा देगी। साथ ही महापौरों और अध्यक्षों के काम और अधिकार नगर निगमों के नगर आयुक्तों और नगर पालिकाओं के अधिशासी अधिकारियों को सौंप देगी। साथ ही जांच भी बैठाएगी, पर जांच की प्रक्रिया क्या होगी, इसका विधेयक में कोई उल्लेख नहीं है।
ये आपत्तियां भी उठाईं
राज्यपाल का मानना है कि नई धारा 16-ए के माध्यम से राज्य सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह शिकायतों की जांच कराने से पहले ही महापौरों और अध्यक्षों को दोषी घोषित कर उन्हें अधिकारों व कर्तव्यों से वंचित कर दे। राज्यपाल ने इसे संविधान के 74वें संशोधन की भावना और सामान्य लोकतांत्रिक एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
इस पर भी एतराज
विधेयक में निगमों और पालिकाओं के कर्मचारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार राज्य सरकार को दे दिया गया है। दूसरे नगर निगमों और नगर पालिकाओं में स्थानांतरित करने का भी अधिकार दिया गया है। इससे भी नगर निगमों और नगर पालिकाओं की स्वायत्तता प्रभावित होती है।