राज्यपाल ने अखिलेश को लिखा पत्र, मांगी सफाई
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राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने संबंधी अध्यादेश पर स्पष्टीकरण मांगा है।
उन्होंने कहा है कि केंद्रीय अधिनियम में अल्पसंख्यक और दूसरे आयोगों के अध्यक्षों को लोक सेवक का दर्जा दिया गया है, मंत्री का नहीं।
मंत्री का दर्जा देने संबंधी व्यवस्था को हाईकोर्ट संविधान की भावना के विपरीत बताकर गलत ठहरा चुका है। उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा है कि इस अध्यादेश की अभी क्यों जरूरत पड़ी?
राज्यपाल ने कहा है कि राज्य मंत्रिपरिषद ने उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग (संशोधन) अध्यादेश-2014 के जरिये उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1994 में संशोधन प्रस्तावित करते हुए इसके अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने का प्रस्ताव किया है।
कैबिनेट मंत्री के दर्जे की जरूरत क्या है?
राज्यपाल ने कहा, 'संविधान के अनुच्छेद 213 (1) के तहत अध्यादेश जारी करने के लिए अन्य शर्तों के साथ-साथ मामले में तात्कालिकता (अर्जेंसी) का होना भी एक शर्त है।'
जब 1994 से बिना दर्जा के तो अभी जरूरत क्यों
राज्यपाल ने कहा है कि 1994 से अब तक अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बिना कैबिनेट मंत्री के दर्जे के कार्यरत हैं। लिहाजा प्रस्तावित अध्यादेश के जरिये अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का स्टेटस दिए जाने के बारे में अर्जेंसी का प्रश्न विचारणीय है।
राज्यपाल ने कहा कि उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1994 के समान ही राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग अधिनियम 2004 (केंद्रीय अधिनियम संख्या 2, वर्ष 2005) लागू हैं।
लेकिन इस केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत अध्यक्ष को केवल लोक सेवक का दर्जा दिया गया है न कि कैबिनेट मंत्री का।
राज्पाल ने लिखा, ऐसा दर्जा देने की नहीं व्यवस्था
राज्यपाल ने कहा कि राज्य के अन्य अधिनियमों में भी आयोगों के अध्यक्षों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं दिया गया है। राज्य आयोग के अध्यक्ष भारत के संविधान के अंतर्गत नियुक्त मंत्री अथवा अन्य संवैधानिक प्राधिकारी की श्रेणी में नहीं आते हैं।
कोर्ट के फैसलों का हवाला भी दिया
राज्यपाल ने कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 18 दिसंबर 2013 को एक जनहित याचिका पर किसी सामान्य विधान अथवा अधिनियम के तहत नियुक्त किसी विधिक प्राधिकारी को संविधान के तहत नियुक्त मंत्रियों की बराबरी का स्टेटस दिए जाने संबंधी सरकार की अधिसूचनाओं को संविधान की भावना के विपरीत मानते हुए निरस्त कर दिया था।
इसलिए प्रस्तावित अध्यादेश के जरिये राज्य अधिनियम के अध्यक्ष को राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री का स्टेटस दिए जाने का प्रस्ताव विचारणीय हो जाता है।