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लखनऊ के सरकारी अस्पतालों में क्या है लिफ्ट का हाल, जानिए...

Fri, 14 Aug 2015 04:01 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ Updated Fri, 14 Aug 2015 04:01 PM IST
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Goverment hospital's lift are not up to the mark

यूपी की राजधानी लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर की लिफ्ट में फंसने से मरीज की मौत और डॉक्टरों के बेहोश होने के बाद सरकारी अस्पतालों में लगी लिफ्ट पर सवाल उठने लगे हैं।

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अस्पतालों की लिफ्ट के मेंटेनेंस के नाम पर लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद आए दिन लिफ्ट फंसने की घटनाएं होती रहती हैं। अस्पतालों में लिफ्ट चलाने के लिए लिफ्टमैन तो तैनात हैं, लेकिन वे ड्यूटी पर कभी कभार ही नजर आते हैं।
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एक अनुमान के मुताबिक,राजधानी के अस्पतालों में लगी कुल लिफ्टों में मेंटेनेंस के अभाव में 40 फीसदी बदहाल हैं। एक ब्रांडेड लिफ्ट कंपनी के अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर यह भी दावा किया कि सरकारी अस्पतलों में लगीं करीब 50 फीसदी लिफ्ट का मेंटेनेंस साल में एक बार भी नहीं होता है।
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बावजूद जिम्मेदारों को लोगों की जान की परवाह नहीं है। पेश है सरकारी अस्पतालों में लिफ्ट मेंटेनेंस के नाम पर हो रहे खेल पर एक रिपोर्ट....

सालाना खर्च तीन लाख,पर लिफ्टमैन नहीं

Goverment hospital's lift are not up to the mark

पार्क रोड स्थित डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल में पांच लिफ्ट है। इन्हें ऑपरेट करने के लिए सात लिफ्टमैन तैनात हैं। मेंटेनेंस पर सालाना तीन लाख रुपये खर्च हेते हैं। इसके लिए अस्पताल प्रशासन ने एनुअल मेंटेनेंस कांट्रैक्ट कर रखा है। इसके तहत लिफ्ट खराब होने पर इंजीनियर पहुंचते हैं । हालांकि खराब पार्ट्स बदलने पर खर्च अस्पताल प्रशासन करता है।

अस्पताल की लिफ्ट का नियमित मेंटेनेंस के लिए एएमसी है। कभी किसी तरह की दुर्घटना न हो इसके लिए लिफ्टमैन को रेगुलर लिफ्ट की जांच को निर्देश दिया गया है।
डॉ.आरके ओझा,सीएमएस,सिविल अस्पताल

हकीकत :अस्पताल सूत्रों की मानें तो कंपनी के इंजीनियर और मेंटेनेंस का काम देखने वाले कर्मचारियों की मिलीभगत से लिफ्ट की मरम्मत के नाम पर मनमाना बिल बनाया जाता है।

लिफ्ट में कभी कोई लिफ्ट मैन नजर नहीं आता। ओटी ब्लॉक में लगी दो में लिफ्ट अधिकतर बंद रहती है। यही हाल बाल रोग वार्ड का है। दोपहर दो बजे ओपीडी खत्म होते ही उसे बंद कर दिया जाता है।

सीढ़ियों से विभाग तक पहुंचना मजबूरी

Goverment hospital's lift are not up to the mark

गोमतीनगर के डॉ.राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों को लिफ्ट के साथ सीढ़ियों का भी सहारा लेना पड़ता है। अस्पताल में कुल चार लिफ्ट लगी हैं और पांच लिफ्टमैन हैं। लिफ्ट के मेंटेनेंस पर सालाना साढ़े तीन लाख रुपये खर्च हो रहे हैं।

कोई लापरवाही नहीं

लिफ्ट मेंटेनेंस में कोई लापरवाही नहीं बरती जाती है। मरीज की शिफ्टिंग के वक्त डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ को साथ रहने का निर्देश है।
डॉ.आरसी अग्रवाल,सीएमएस,लोहिया अस्पताल

हकीकत:
कई लिफ्ट को बिजली बचाने के लिए बंद रखा जाता है तो कई में फैन और लाइट भी खराब हैं। वहीं मेंटेनेंस में जमकर लापरवाही बरती जाती है।

एक कर्मचारी की मानें तो कंपनी और अस्पताल के बाबुओं की मिलीभगत से खेल होता है। समय पूरा होते ही मेंटेनेंस का स्टीकर चस्पा कर दिया जाता है और कुछ गड़बड़ी होने पर टेक्निकल फॉल्ट का बहाना बनाकर मामला दबा दिया जाता है।

सालाना खर्च 7.5 लाख और लिफ्ट सालों पुरानी

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650 बेड के बलरामपुर अस्पताल में सात लिफ्ट हैं। इसके मेंटेनेंस सालाना 7.5 लाख खर्च होते हैं। सात लिफ्टमैन हैं। अस्पताल के न्यू बिल्डिंग और न्यू प्राइवेट वार्ड की लिफ्ट 35 साल पुरानी हैं। वार्ड में थ्राइसन कंपनी की लिफ्ट लगी हैं और इनके मेंटेनेंस पर सालाना खर्च तीन लाख रुपये है।

क्लर्क को किया गया है अलर्ट

अलग-अलग कंपनियों की लिफ्ट लगी है। सबका मेंटेनेंस नियमित समय पर हो इसके लिए क्लर्क को अलर्ट किया जाता रहा है। नियमित जांच कराई जाती है।
डॉ. राजीव लोचन, सीएमएस,बलरामपुर अस्पताल

हकीकत :इमरजेंसी वार्ड में ओटिस कंपनी की लिफ्ट लगी है। इसके मेंटेनेंस का अंदाजा उसके खुलने-बंद होने से ही लगाया जा सकता है। इमरजेंसी स्टाफ के मुताबिक कई बार लिफ्ट फंस चुकी है।

कंपनी मेंटेनेंस के नाम पर सालाना 1.25 लाख रुपये लेती है। नए बने सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक में भी इसी कंपनी की दो लिफ्ट लगी हैं। इनमें से एक बंद रहती है। मेंटेनेंस के नाम पर 80 हजार का बजट खर्च होता है। अस्पताल की इमरजेंसी में लगी लिफ्ट का कॉप्रीहेंसिव मेंटेनेंस कांट्रैक्ट है जिसके तहत कंपनी की पूरी जिम्मेदारी है।

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