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अधूरे जीआईएस सर्वे से बढ़ी मुसीबत, गृहकर सत्यापन का काम भी फंसा
Wed, 30 Dec 2020 02:02 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
प्रवेंद्र गुप्ता, लखनऊ
प्रवेंद्र गुप्ता, लखनऊ
Published by: लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 30 Dec 2020 02:02 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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बीते वर्ष नवंबर में शुरू हुआ गृहकर के जीआईएस सर्वे का काम इस साल दिसंबर तक पूरा होना था। हालांकि, अब तक 25 प्रतिशत ही काम हो पाया है, जिससे गृहकर सत्यापन भी फंस गया है। इसके साथ ही गृहकर से छूटे भवनों की जानकारी भी नगर निगम को नहीं मिल पाई है। अब कंपनी तीन महीने का समय और मांग रही है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि तीन माह में 75 फीसदी काम कैसे हो पाएगा। सर्वे के इस काम पर करीब दो करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
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गृहकर से छूटी आवासीय, अनावासीय संपत्तियों को इसके दायरे में लाने और संपत्तियों के गृहकर की जांच को लेकर बीते साल नवंबर से जीआईएस सर्वे शुरू हुआ था। यह काम निजी कंपनी जियो इंफोसिस टेक्नालॉजी को दिया गया था। कंपनी को यह काम इस महीने तक पूरा करना है, लेकिन अब तक वह छह लाख में से सिर्फ 1.50 लाख संपत्तियों का ही जीआईएस सर्वे कर पाई है। अब कंपनी मार्च तक और समय मांग रही है।
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रोजाना सात हजार सर्वे तो मार्च तक हो काम
जीआईएस सर्वे के लिए बनी रिपोर्ट बताती है कि यदि कंपनी को मार्च तक समय दे दिया जाए तो उसे करीब 70 कार्य दिवस ही मिलेंगे। ऐसे में 4.50 लाख संपत्तियों का सर्वे करने के लिए उसे रोजाना करीब 7000 का सर्वे करना होगा। ऐसा में कंपनी मार्च तक काम पूरा करेगी, निगम प्रशासन को इसकी संभावना नहीं दिख रही है। सर्वे न पूरा होने से गृहकर के सत्यापन का काम भी फंसा है।
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डाटा मिलान का काम भी अधूरा
कंपनी ने जोन चार, सात व आठ में जिन 1.50 लाख संपत्तियों का जीआईएस सर्वे किया है, उनका डाटा नगर निगम से नहीं मिलाया गया। अभी तक 52 हजार संपत्तियों का ही डाटा मिल पाया है। ऐसे में यह काम भी एक तिहाई हो पाया है।
कंपनी के सॉफ्टवेयर में भी गड़बड़ी
कंपनी जिस सॉफ्टवेयर पर डाटा फीड कर रही है उसमें भी गड़बड़ी है। मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारी ने बताया कि सॉफ्टवेयर में मकान के हर कमरे की अलग-अलग नाप के आधार पर गृहकर गणना का विकल्प ही नहीं है। इसमें सिर्फ कारपेट एरिया के 80 प्रतिशत पर कर निर्धारण का विकल्प है, जिससे समस्या हो रही है। जो सर्वे हुआ है उसकी मैचिंग में गड़बड़ियां मिली हैं, जिसमें प्लॉट को भी मकान दिखाया गया है। स्थलीय सत्यापन में भवनस्वामी के नाम में भी गड़बड़ी आ रही है। इससे सर्वे और सत्यापन के बाद गृहकर अपडेट नहीं हो पा रहा है और शिकायत पर भी निजी कंपनी इसे ठीक नहीं कर रही है।
डाटा की सुरक्षा पर उठ रहा सवाल
नगर निगम के गृहकर का डाटा अभी सरकारी सर्वर एनआईसी पर है और इसके द्वारा बनाए सॉफ्टवेयर से गृहकर जमा करने का काम हो रहा है। जानकार बताते हैं कि एनआईसी सरकारी संस्था है और उसकी सुरक्षा भी पुख्ता है। सरकारी होने के नाते उस पर विश्वास भी है। एक निजी कंपनी के सॉफ्टवेयर पर डाटा जाने के बाद कितना सुरक्षित होगा, यह बड़ी चिंता है।
नगर आयुक्त प्रभारी अमित कुमार ने कहा कि कंपनी को तीन महीने का समय देने पर विचार हो रहा है। इसके बाद भी वह काम पूरा नहीं कर पाई तो कठोर कार्रवाई के लिए रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। यह भी जानकारी में आया है कि कंपनी सॉफ्टवेयर की कमियां भी दूर नहीं कर पा रही है। इसे लेकर भी निर्देश दिए गए हैं।