फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Girish karnaad connection with lucknow

पूरी लगन से कला की सेवा करने वाले गिरीश कारनाड का लखनऊ से था खास रिश्ता

Tue, 11 Jun 2019 11:02 AM IST
sahaj sahaj न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ Published by: sahaj sahaj Updated Tue, 11 Jun 2019 11:02 AM IST
विज्ञापन
Girish karnaad connection with lucknow
गिरीश कारनाड - फोटो : अमर उजाला
मशहूर अभिनेता गिरीश कारनाड का निधन कला के क्षेत्र की अपूर्णनीय क्षति है। कारनाड का लखनऊ रंगमंच से गहरा नाता रहा है। वे यहां आयोजनों में शामिल होते रहे। रंगमंच की मशहूर हस्ती पद्मश्री राज बिसारिया ने कहा कि कोई शोहरत के लिए थिएटर छोड़कर फिल्मों में चला जाता है तो कोई  पैसों की खातिर। लेकिन गिरीश कारनाड ऐसी शख्सियत थे जो पूरी लगन के साथ कला से जुड़े हुए थे।
विज्ञापन


मेरी उनसे कई बार मुलाकात हुई, कभी फिल्म फेस्टिवल के दौरान तो कभी दिल्ली में और एक बार जर्मनी में। 1986 में उनका जब लखनऊ आना हुआ तो घर पर मुलाकात के दौरान मुझे उन्हें बेहतर तरीके से जानने का मौका मिला। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वो एक पढ़े-लिखे कलाकार थे।
विज्ञापन


कारनाड के निधन पर शोक जताते हुए राज बिसारिया ने कहा कि वो ऐसी शख्सियत थे जो अपने लेखन में विधा और स्ट्रक्चर का विशेष ध्यान रखते थे। उनका स्वभाव सामाजिक, मिलनसार और सुलझा हुआ था। जब से वो मुंबई से बेंगलूरू शिफ्ट हुए थे, उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। सोमवार को उनके निधन की जानकारी के बाद राजधानी में भी शोक की लहर थी। राजधानी में फिल्म और थिएटर से जुड़ी अहम हस्तियों ने अमर उजाला से अपनी यादें साझा कीं।
विज्ञापन
विज्ञापन

बतौर लेखक देश के अनमोल रत्न थे गिरीश

वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ कहते हैं कि लेखक के तौर पर वो देश के अनमोल रत्न थे। उन्होंने अपने प्लेराइट से भारतीय ड्रामा इंडस्ट्री को बदल कर रख दिया। लोक कथाओं व आदर्शवाद को समाज के मौजूदा हालातों से जोड़कर प्रस्तुत करना ही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी।

इसकी झलक उनके द्वारा लिखित नाटक तुगलक, हयवदन, नागमंडल सभी में देखने को मिलता है। मैंने भी 1982 में उनके द्वारा लिखित नाटक तुगलक को निर्देशित किया था। उनके लेखन में ऐतिहासिक और पौराणिक कथाआें को ह्युमन साइकोलॉजी को समझते हुए समाज की वर्तमान आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक परिस्थितियां भी साफ नजर आती थीं।

लोक नाटक को आधुनिक बनाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। मेरी उनसे मुलाकात बहुत ज्यादा तो नहीं हुई लेकिन उनका स्वभाव बेहद नरम था। वो स्पष्टवादी विचारधारा के थे, सामाजिक मुद्दे हों निजी या कला से संबंधित मुुद्दे, वो अपने विचारों पर स्टैंड लेने वाले व्यक्ति थे। कोई क्या कहेगा इसकी चिंता नहीं करते थे।

...जब रविंद्रालय में देखी कारनाड की सादगी
निर्देशक पुनीत अस्थाना ने बताया कि कारनाड जी से मेरी मुलाकात 1980 में रविंद्रालय में आयोजित एक पुरस्कार वितरण कार्यक्रम में हुई थी। उस समय वो संगीत नाटक एकेडमी के अध्यक्ष थे और मैं भारतेंदु नाट्य एकेडमी में प्रशिक्षक था। उस कार्यक्रम में मुझे स्टेज व लाइट अरेंजमेंट का जिम्मा मुझे सौंपा गया था।

उस समय मैं नया-नया था और वो नामचीन हस्ती हुआ करते थे। लेकिन उनकी सादगी और अपने काम के प्रति समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है उस कार्यक्रम में भी उन्होंने मेरी काफी सहायता की।

खुद पहल कर उन्होंने मुझे लाइट अरेंजमेंट से लेकर स्टेज सजाने तक रचनात्मक सुझाव दिए, वो सच में असल थिएटर वर्कर थे। कन्नड़ के अलावा हिंदी नाट्य जगत के लिए वो अनमोल तोहफा थे। उन्होंने लोक गाथाओं को भी स्टेजवादी बनाकर प्रस्तुत किया, यह केवल एक जीनियस आदमी ही कर सकता है।

इतिहास को भी नए कलेवर में करते थे बयां

उर्मिल थपलियाल ने बताया कि गिरीश कारनाड जी ने हिंदी थिएटर को बहुत प्रभावित किया। हिंदी थिएटर को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका रही है। मैनें उनके कई नाटकों का निर्देशन कि या और दिल्ली में कई बार उनसे मुलाकात का भी मौका मिला। वो सरल और गंभीर स्वभाव के व्यक्ति थे, लिखने पढ़ने में खास रुचि के साथ उन्हें इतिहास की अच्छी समझ भी थी।

यही वजह है कि वो इतिहास को समकालीन मुद्दों से जोड़ते हुए उसे नए कलेवर में प्रस्तुत करने में कामयाब थे। वो लिखते कन्नड़ में थे लेकिन उनकी खासियत यह थी कि वे अच्छी रचनाओं का अनुवाद विभिन्न भाषाओं में स्वयं ही किया करते थे। इतिहास की लोक कथाओं को आज के कलेवर और दृष्टिकोण से बयां करना ही उन्हें सबसे ज्यादा बतौर लेखक प्रतिष्ठा दिलाने का प्रमुख कारण रहा। उन्हें रंगमंच के दार्शनिक के तौर पर जाना जाता है।

कन्नड़ ही नहीं, हिंदी थिएटर के लिए भी बड़ा झटका
मशहूर नृत्यांगना कुमकुम धर बताती हैं कि मैंने बतौर अभिनेत्री उनके नाटक हयवदन में काम किया था। एक दो बार सेमिनार के दौरान उन्हें सुनने और मुलाकात का मौका भी मिला। लंबा कद, गोरा रंग बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के थे, उतना ही खूबसूरत उनका स्वभाव था, बेहद विनम्र और सरल।

वो एक विद्वान और पढ़े-लिखे थिएटर आर्टिस्ट, राइटर और डायरेक्टर थे जो उनकी रचनाओं से साफ नजर आता है। उनकी हर रचना के पीछे दर्शन छुपा होता है। उनका जाना सिर्फ कन्नड़ ही नहीं हिंदी थिएटर के लिए भी बड़ा झटका है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed