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'घूसखोर पंडित' फिल्म विवाद: अखिलेश यादव बोले- यह एक जाति के लिए अपमानजनक, भाजपा पर भी साधा निशाना

Sat, 07 Feb 2026 10:35 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Sat, 07 Feb 2026 10:35 PM IST
सार

Ghooskhor Pandat Controversy: घूसखोर पंडित फिल्म के शीर्षक पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बिना फिल्म का नाम लिए इसे अपमानजक कहा। इस पर उन्होंने भाजपा पर भी निशाना साधा। 

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Ghooskhor Pandat Controversy: Akhilesh says it dergatory to a caste, drags BJP into it
घूसखोर पंडित फिल्म पर विवाद। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

 फिल्म के नाम पर उठे राजनीतिक विवादों पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि समाज के कुछ लोगों का दुरुपयोग, उसी समाज के खिलाफ करती है। किसी समाज विशेष को लक्षित, चिन्हित, टारगेट करके ‘अपमानित-आरोपित’ करती है। उन्होंने फिल्म का नाम लिए बगैर कहा कि फिल्म का शीर्षक केवल आपत्तिजनक नहीं, बेहद अपमानजनक भी है। 

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उस फिल्म का नाम लिखने से भाजपा का उस समाज का तिरस्कार करने का उद्देश्य और भी अधिक पूरा होगा। ऐसा सिनेमा नाम बदलकर भी रिलीज नहीं होना चाहिए। जब निर्माताओं को आर्थिक हानि होगी, तभी ऐसी फ़िल्में बनना बंद होंगी क्योंकि पैसे के लालच में भाजपा का एजेंडा चलाने वाले भी भाजपाइयों की तरह पैसे को छोड़कर किसी और के सगे नहीं हैं।
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अखिलेश ने कहा कि ये ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ या ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के हनन की बात नहीं है, ये ‘रचनात्मक समझ’ या कहिए ‘क्रिएटिव प्रुडेंस’ की बात है कि पूर्वाग्रह से ग्रसित जो फिल्म किसी एक पक्ष की भावनाओं को, एक सोची-समझी साजिश के तहत आहत करे वो मनोरंजन कैसे हो सकती है। 
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अगर उद्देश्य मनोरंजन नहीं है तो किसी एक समाज को बदनाम करने के एजेंडे के पीछे के एजेंडे का खुलासा भी होना ही चाहिए। इसका भी भंडाफोड़ होना चाहिए कि इसके पीछे कौन है और कोई क्यों अपना पैसा और दिमाग़ ऐसे सामाजिक एकता विरोधी-विध्वंसकारी काम में लगा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी तक स्वीकार्य होती है जब तक वो किसी अन्य की गरिमा-प्रतिष्ठा का हनन नहीं करती है। उन्होंने कहा कि सिनेमा को समाज का दर्पण समझा जाता है लेकिन ये दर्पण मैला और मलिन नहीं होना चाहिए।

किसी भी जाति का अपमान अनुचित : दीपक मिश्र

समाजवादी चिंतक दीपक मिश्र ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्वनी वैष्णव और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को पत्र लिखकर घूसघोर पंडत शीर्षक निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रणाली सुनिश्चित करने की आवश्यकता है जिससे भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न हो। फिल्म का शीर्षक आपत्तिजनक और अपमानकारी है। किसी भी समूची जाति को इस तरह सार्वजनिक रूप से घूसघोर कहना दुराग्रहपूर्ण - दुर्भाग्यशाली दुर्भावना है, इससे समाज में जातिगत विभेद व विषैला वैमनस्य फैलेगा।

उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा का आदर्श हमेशा से सद्भाव और आपसी समरसता को बढ़ाना रहा है । किसी को भी अपने आर्थिक हितों और स्वार्थ सिद्धि के लिए समाज में अपसंस्कृति फैलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि पंडित की जगह यदि यादव, मुसलमान,दलित,पाल,पासी, लोधी, धोबी आदि संजाति सूचक शब्द भी होते, तब भी वे और समाजवादी बौद्धिक सभा इतना ही प्रखर और प्रबल विरोध करती।

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