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Lucknow News: पहले हालात को हराएंगे, फिर जीतेंगे ओलंपिक का पदक

Wed, 22 Jul 2026 02:15 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 22 Jul 2026 02:15 AM IST
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First, we will overcome the odds; then, we will win an Olympic medal.
प्रगति केसरवानी
किसी ने पिता का भरोसा जीतने के लिए पहले खुद को साबित किया तो कोई आर्थिक तंगी के बावजूद अभ्यास नहीं छोड़ रहा। कोई दृष्टिबाधित होने के बावजूद पदक जीतने का सपना देख रहा है तो किसी की आंखों में ओलंपिक में तिरंगा लहराने के ख्वाब पल रहे हैं। राजधानी लखनऊ के हजरतगंज स्थित इंडियन पैरा जूडो अकादमी में ऐसे कई जूडोका हैं जो हर रोज हालात से लड़ते हैं और फिर हौसला बुलंद कर मैट पर उतरते हैं। इन जूडोकाओं की कहानी बताती है कि मैट पर जीत दर्ज करने के लिए रह रोज मुश्किलों को पटखनी देनी पड़ती है।
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मैं ही मम्मी-पापा का बेटा बनूंगी-
हजरतगंज की 15 वर्षीय सोनाली का सपना ओलंपिक में स्वर्ण जीतना है। पिता राजपाल कृषि भवन में कपड़ों की इस्त्री करते हैं और मां गीता घरों में खाना बनाकर चार बेटियों का पालन-पोषण करती हैं। सोनाली कहती हैं, “मेरा कोई भाई नहीं है, मैं ही अपने मम्मी-पापा का बेटा बनूंगी।” शुरुआत में पिता उन्हें प्रतियोगिताओं में नहीं भेजते थे। कई बार रोकर अनुमति लेनी पड़ी, लेकिन जिला स्तर पर पहला स्वर्ण जीतने के बाद पिता का डर गर्व में बदल गया। इसके बाद सोनाली ने कई पदक जीते। एनआईएस कोच प्रीति ने उनकी प्रतिभा पहचानकर उन्हें कोच मुनव्वर अंजार तक पहुंचाया। यहां सोनाली निःशुल्क जूडो प्रशिक्षण और जरूरी खेल उपकरण प्राप्त कर रही हैं।
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आर्थिक तंगी को हराकर जीतना है ओलंपिक पदक
राजेंद्र नगर के 14 वर्षीय हरिओम अवस्थी के पिता विजय अवस्थी पानी-पूरी का ठेला लगाते हैं। हालात ऐसे हैं कि कई बार जूडोकाओं जैसी डाइट तक नहीं मिल पाती हालांकि इसके बावजूद उनके हौसला बुलंद है। कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हरिओम भी देश के लिए ओलंपिक में पदक जीतना चाहते हैं।
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डेफ ओलंपिक में किया भारत का प्रतिनिधित्व
प्रयागराज की प्रगति केसरवानी 2025 के डेफ ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। डेफ ओलंपिक में गोल्ड जीतना लक्ष्य है। उनका कहना है कि डेफ खिलाड़ियों को आर्थिक सहायता और विशेष प्रशिक्षण मिलना चाहिए। डेफ ओलंपिक में प्रतिभागियों को पैसा कम मिलता है।


बच्चों को आत्मरक्षा के गुर सिखा रहे प्रशांत
राजाजीपुरम के 25 वर्षीय सुशांत राय ने 2010 में पिता के निधन के बाद भी खेल नहीं छोड़ा। कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं खेल चुके सुशांत आज छात्रों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। अब इनकी निगाहें सिर्फ अगले पदक पर नहीं, बल्कि ओलंपिक में तिरंगा लहराने पर टिकी हैं।

प्रगति केसरवानी

प्रगति केसरवानी

प्रगति केसरवानी

प्रगति केसरवानी

प्रगति केसरवानी

प्रगति केसरवानी

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