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Lucknow News: मुहब्बत, इंसानियत और रिश्तों के शायर थे डॉ. बशीर बद्र

Sat, 30 May 2026 02:38 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 30 May 2026 02:38 AM IST
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Dr. Bashir Badr was a poet of love, humanity, and relationships.
लखनऊ। उर्दू अदब की दुनिया में अपनी सादगी, गहराई और दिल को छू लेने वाले अशआर से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 साल की उम्र में भोपाल में बृहस्पतिवार को उनका निधन हो गया। उनके जाने से लखनऊ की साहित्यिक और मुशायरों की दुनिया गहरे गम में डूब गई है।
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डॉ. बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि मोहब्बत, इंसानियत, रिश्तों और इंसानी जज्बात की ऐसी आवाज थे, जिसने पीढ़ियों को अल्फाजों की नर्मी और अहसास की गर्माहट दी। उनकी शायरी की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने कठिन अहसासों को बेहद आसान और आम हिंदुस्तानी भाषा में लोगों तक पहुंचाया। यही वजह रही कि उनके शेर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि लोगों की जिंदगी और जुबान का हिस्सा बन गए।
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आने वाली पीढ़ियों की जुबान पर रहेंगे उनके शेर
शायर अभिषेक शुक्ला के अनुसार मेरे लिए बशीर साहब शायरी की दुनिया के मार्गदर्शक रहे। वह मुहब्बत, इंसानियत और रिश्तों के शायर थे। उनसे पहली दफा साल 2010 में फोन पर बात हुई थी। बड़े लिहाज और झिझक के साथ मैंने उन्हें कॉल किया था, लेकिन उन्होंने बेहद खुलूस और तफसील से बात की। बाद के दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। उनके जाने का बेहद अफसोस है। जाने कितने उनके शेर अब कल्ट बन चुके हैं। उजाले अपनी यादों के... और लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में... जैसे उनके अशआर आने वाली पीढ़ियों तक लोगों की जुबान पर जिंदा रहेंगे।
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शायर मनीष शुक्ल बताते हैं कि डॉ. बशीर बद्र का लखनऊ से रिश्ता बेहद खास रहा। हमारी पीढ़ी ने उनकी शायरी के सबब ही मुहब्बत करना सीखा। उस आवाज के खामोश हो जाने से लखनऊ के हजारों चाहने वालों की आंखें नम और दिल गमगीन हैं। उन्होंने मोहब्बत, रिश्तों, तन्हाई और इंसानी जज्बात को बेहद सरल हिंदुस्तानी भाषा में पेश किया। लखनऊ विश्वविद्यालय, अमीनाबाद और शहर की कई साहित्यिक महफिलों में उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे। बशीर बद्र केवल शायर नहीं, बल्कि लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब की जीवित पहचान थे।


लविवि के उर्दू विभाग के प्रो. अब्बास रजा नय्यर बताते हैं कि मैं जब एमए प्रथम वर्ष में था, तब बेगम हजरत महल पार्क में जश्न-ए-मुशायरा हुआ था, जिसकी अध्यक्षता बशीर बद्र साहब कर रहे थे। मैंने कुछ शेर पढ़े, जो उन्हें बेहद पसंद आए। उसी दौरान उन्होंने मेरे लिए कहा था लहजा वो जैसे सुबह की खुशबू अजान दे, जी चाहता है मैं तेरी आवाज चूम लूं...। वह बड़े दिल के इंसान थे। उनकी शायरियां कैफियत, अहसास और जज्बों से बनती थीं। यही वजह रही कि उनके चाहने वाले हर तबके में मौजूद थे।
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