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केजीएमयू के डॉक्टरों की बड़ी कामयाबी, पेट के बल लिटाकर युवती को दी ऑक्सीजन, बचाई जान
Sat, 01 Aug 2020 10:46 AM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Sat, 01 Aug 2020 10:46 AM IST
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मरीज के साथ डॉक्टर विपिन
- फोटो : amar ujala
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फेफड़ों के जवाब देने के बाद गंभीर हालत में पहुंची युवती की जान बचाने में केजीएमयू के डॉक्टरों ने बड़ी कामयाबी हासिल की। संस्थान में भर्ती मरीज का हीमोग्लोबिन भी 2 के आसपास पहुंच गया था और वेंटिलेटर पर रखने के बावजूद हवा फेफड़े तक नहीं पहुंच पा रही थी।
ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विपिन कुमार सिंह ने मरीज को प्रोन वेंटिलेशन (पेट के बल लिटाकर ऑक्सीजन देना) देना तय किया। मरीज की हालत देख उनकी टीम भी हैरान थी। करीब 18 दिन की मेहनत के बाद सफलता मिली। पूरी टीम खुश है। मरीज को दो दिन बाद डिस्चार्ज करने की तैयारी है।
इस टीम ने किया इलाज
मरीज के इलाज में लगी टीम में डॉ. विपिन कुमार सिंह के साथ टीवीयू प्रभारी प्रो. जीपी सिंह, डॉ. जिया, डॉ. राहुल, डॉ. प्रशस्ति, डॉ. प्रतिश्रुति, डॉ. अस्मिता, डॉ. प्रज्ञा, स्टाफ नर्स, अमरेंद्र, अनुपम, अभिषेक, दीपू शामिल हैं।
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ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विपिन कुमार सिंह ने मरीज को प्रोन वेंटिलेशन (पेट के बल लिटाकर ऑक्सीजन देना) देना तय किया। मरीज की हालत देख उनकी टीम भी हैरान थी। करीब 18 दिन की मेहनत के बाद सफलता मिली। पूरी टीम खुश है। मरीज को दो दिन बाद डिस्चार्ज करने की तैयारी है।
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इस टीम ने किया इलाज
मरीज के इलाज में लगी टीम में डॉ. विपिन कुमार सिंह के साथ टीवीयू प्रभारी प्रो. जीपी सिंह, डॉ. जिया, डॉ. राहुल, डॉ. प्रशस्ति, डॉ. प्रतिश्रुति, डॉ. अस्मिता, डॉ. प्रज्ञा, स्टाफ नर्स, अमरेंद्र, अनुपम, अभिषेक, दीपू शामिल हैं।
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वेंटिलेटर से भी फेफड़े तक नहीं पहुंच रही थी हवा
बहराइच की सोनी गुप्ता (25) को जिला अस्पताल से क्वीन मेरी अस्पताल रेफर किया गया था। 11 जुलाई को सर्जरी के बाद प्रसव हुआ। 24 घंटे बाद बच्चे की मौत हो गई। हीमोग्लोबिन 2 के आसपास था। कोरोना रिपोर्ट निगेटिव होने पर मरीज को क्वीन मेरी से ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट भेजा गया। मरीज को हाई ग्रेड बुखार था।
मरीज को सेप्टिक शॉक, एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (एआरडीएस) हो चुका है। ऐसे में शरीर में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है, वेंटिलेटर पर होने के बाद भी फेफड़े बिल्कुल कड़े हो जाते हैं, जिससे वेंटिलेटर से हवा फेफड़े तक नहीं पहुंच पाती है। डॉ. विपिन ने बताया कि एआरडीएस में मरीज का बचना मुश्किल होता है। प्रोन वेंटिलेशन की प्रक्रिया शुरू की गई। गले में कट लगाकर (इमरजेंसी टाकियोस्टोमी) वेंटिलेटर के जरिये ऑक्सीजन देना शुरू किया गया। चार दिन बाद हालत में सुधार शुरू हुआ, लेकिन वेंटिलेटर निकालते ही सांस फूलने लगती। ऐसे में हाई फ्लो नेजल कैनूला का इस्तेमाल किया गया। इससे धीरे-धीरे मरीज को राहत मिलने लगी।
मरीज को सेप्टिक शॉक, एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (एआरडीएस) हो चुका है। ऐसे में शरीर में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है, वेंटिलेटर पर होने के बाद भी फेफड़े बिल्कुल कड़े हो जाते हैं, जिससे वेंटिलेटर से हवा फेफड़े तक नहीं पहुंच पाती है। डॉ. विपिन ने बताया कि एआरडीएस में मरीज का बचना मुश्किल होता है। प्रोन वेंटिलेशन की प्रक्रिया शुरू की गई। गले में कट लगाकर (इमरजेंसी टाकियोस्टोमी) वेंटिलेटर के जरिये ऑक्सीजन देना शुरू किया गया। चार दिन बाद हालत में सुधार शुरू हुआ, लेकिन वेंटिलेटर निकालते ही सांस फूलने लगती। ऐसे में हाई फ्लो नेजल कैनूला का इस्तेमाल किया गया। इससे धीरे-धीरे मरीज को राहत मिलने लगी।