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UP News: पान के बरेजों के खात्मे से बिगड़ा बुंदेलखंड का पर्यावरण संतुलन, अब गर्म हवाओं को नहीं मिल पा रही नमी
Sun, 24 May 2026 08:39 AM IST
Bhupendra Singh
चंद्रभान यादव, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
चंद्रभान यादव, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: Bhupendra Singh
Updated Sun, 24 May 2026 08:39 AM IST
सार
पान के बरेजों के खात्मे से बुंदेलखंड का पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया है। पहाड़ों से टकराकर नीचे आने वाली गर्म हवाओं को अब नमी नहीं मिल पाती है। पान के बरेजे तापमान घटाने में अहम भूमिका निभाते थे। रखरखाव का अभाव और उचित मूल्य नहीं मिलने से बरेजे खत्म हो गए। आगे पढ़ें पूरी खबर...
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पान के बरेजे।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
यूपी के महोबा में देशी-देशावरी पान के बरेजे तेजी से खत्म हो रहे हैं। तालाबों और बरेजों की कमी बुंदेलखंड के पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ रही है। वनस्पति वैज्ञानिकों का तर्क है कि हरियाली कम होने से तापमान में लगातार वृद्धि होगी। यह स्थिति किसानों और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक है।
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महोबा में कभी 550 एकड़ में पान की खेती होती थी। अब यह घटकर केवल 17 से 20 एकड़ में सिमट गई है। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राम सेवक चौरसिया ने इसे अनदेखी का परिणाम बताया।
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उन्होंने कहा कि पान की खेती खत्म होने से पर्यावरण को भी नुकसान हुआ है। पान के बरेजे स्थानीय स्तर पर तापमान को नियंत्रित करते थे। वे लू के थपेड़ों को शांत करने में बड़ी भूमिका निभाते थे। बरेजों पर निरंतर पानी का छिड़काव होता था। इससे गुजरने वाली गर्म हवाएं ठंडी हो जाती थीं।
शीतलता के द्वीप और पर्यावरणीय लाभ
डॉ. राम सेवक चौरसिया के अनुसार, पान के बरेजों को शीतलता का द्वीप कहा जाता था। उनसे वाष्पीकरण से पैदा होने वाली ठंडक आगे बढ़ती थी, जिससे ग्रामीण इलाकों का तापमान स्थिर रहता था। अब बरेजे नहीं होने से बुंदेलखंड की धूप लू के असर को कई गुना बढ़ा देती है। यही वजह है कि यहां का तापमान 40 से 45 डिग्री तक पहुंच गया है।पान की लताएं हवा को सर्द बनाती हैं
वीर भूमि राजकीय महाविद्यालय के वनस्पति विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनुराग सिंह कहते हैं कि हरियाली कम होने से तापमान में वृद्धि होगी। पान के बरेजे का सिमटना केवल खेती का संकट नहीं, बल्कि गंभीर पर्यावरणीय नुकसान भी है। पान की लताएं नाजुक होती है। वे धूप बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं, लेकिन हवा को सर्द बनाती हैं। तापमान को संतुलित करती हैं। हवा में मौजूद प्रदूषण को सोख कर खत्म करती हैं।जीआई टैगिंग के बाद भी नहीं मिला पान शोध अधिकारी
महोबा के पान को 2022 में जीआई टैग मिला है। हालांकि, यहां के पान शोध केंद्र में सात साल से कोई शोध अधिकारी नहीं है। विभागीय रिपोर्ट बताती है कि 1970 में 200 एकड़ पान की खेती थी, जो 1975-80 तक 55 एकड़ रह गई। 1995 में यह 550 एकड़ तक पहुंची, पर 2002 के बाद इसमें गिरावट आई। अब यह 17 से 20 एकड़ में सिमट गई है। रखरखाव का अभाव और उचित मूल्य न मिलना इसकी मुख्य वजहें हैं।किसानों की मांग और समस्याएं
पान किसान राजित राम बताते हैं कि बांस की लागत 200 रुपये से बढ़कर छह हजार रुपये सैकड़ा हो गई है। वहीं, उपज की कीमत घट गई है। पहले महोबा का पान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और विदेश तक जाता था। अब चंद खरीदार मनचाहे दाम पर पान खरीदते हैं।डॉ. राम सेवक चौरसिया ने पान कलस्टर में अस्थायी बिजली कनेक्शन और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में शामिल करने की मांग की है। किसान दयाशंकर चौरसिया के अनुसार, एक बरेजे में करीब डेढ़ लाख रुपये लगते हैं। बरेजे कम होने से बाजार नहीं मिल पा रहा है।
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