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नहीं रहे मायावती के खास पूर्व विधायक जलील खां, गोंडा से लेकर लखनऊ तक शोक
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Fri, 15 Jun 2018 01:51 AM IST
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बसपा के पूर्व विधायक मोहम्मद जलील खां (फाइल फोटो)
- फोटो : amar ujala
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बसपा सुप्रीमो मायावती के बहुत ही खास माने जाने वाले गोंडा के पूर्व विधायक मोहम्मद जलील खां का गुरुवार तड़के दिल का दौरा पड़ने से इंतकाल हो गया। वे 62 वर्ष के थे। रमज़ान के दौरान सहरी के वक्त उन्हें तेज सांस फूलने और सीने में दर्द की शिकायत हुई। परिवारीजन तत्काल उन्हें जिला अस्पताल लेकर पहुंचे जहां डॉक्टरों ने उन्हें निजी अस्पताल रेफर कर दिया गया। वहां इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
बसपा नेता मोहम्मद जकी ने बताया कि मायावती के बेहद करीबी रहे जलील खां ने वर्ष 2002 में अपना राजनीतिक सफर शुरू करते हुये गोण्डा विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन मामूली अंतराल से हार गए। इसके बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती ने भरोसा जताते हुए उन्हें दोबारा 2007 में बसपा के टिकट पर भाग्य आजमाने का मौका दिया और जलील ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी विनोद कुमार सिंह को हराकर शानदार जीत हासिल की। लेकिन, 2012 के विधानसभा चुनाव में गुटबाजी का शिकार हुए जलील खान को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा।
जलील की सादगी, मिलनसार स्वभाव और गंगा जमुनी तहजीब के कारण वे सबके प्रिय थे। बिना जलील बसपा का जनाधार तेजी से खिसकता देख मायावती ने 2017 के चुनाव में उन्हें फिर से बसपा का टिकट देकर मैदान में उतारा लेकिन मोदी लहर के कारण बसपा को करारी शिकस्त मिली।
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बसपा के कद्दावर नेताओं में उनकी गिनती होती रही। उनके निधन की खबर मिलते ही गोंडा के बसपा कार्यकर्ताओं समेत लखनऊ में भी शोक छा गया। बेहद मिलनसार और ईमानदार छवि वाले पूर्व विधायक के निधन से गोंडा निवासियों में भी शोक है। उनके अंतिम दर्शन के लिए गोंडा स्थित पैतृक आवास पर लोगों का तांता लगा है। जलील अपने पीछे चार बेटे और एक बेटी से भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।
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बसपा नेता मोहम्मद जकी ने बताया कि मायावती के बेहद करीबी रहे जलील खां ने वर्ष 2002 में अपना राजनीतिक सफर शुरू करते हुये गोण्डा विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन मामूली अंतराल से हार गए। इसके बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती ने भरोसा जताते हुए उन्हें दोबारा 2007 में बसपा के टिकट पर भाग्य आजमाने का मौका दिया और जलील ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी विनोद कुमार सिंह को हराकर शानदार जीत हासिल की। लेकिन, 2012 के विधानसभा चुनाव में गुटबाजी का शिकार हुए जलील खान को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा।
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जलील की सादगी, मिलनसार स्वभाव और गंगा जमुनी तहजीब के कारण वे सबके प्रिय थे। बिना जलील बसपा का जनाधार तेजी से खिसकता देख मायावती ने 2017 के चुनाव में उन्हें फिर से बसपा का टिकट देकर मैदान में उतारा लेकिन मोदी लहर के कारण बसपा को करारी शिकस्त मिली।
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बसपा के कद्दावर नेताओं में उनकी गिनती होती रही। उनके निधन की खबर मिलते ही गोंडा के बसपा कार्यकर्ताओं समेत लखनऊ में भी शोक छा गया। बेहद मिलनसार और ईमानदार छवि वाले पूर्व विधायक के निधन से गोंडा निवासियों में भी शोक है। उनके अंतिम दर्शन के लिए गोंडा स्थित पैतृक आवास पर लोगों का तांता लगा है। जलील अपने पीछे चार बेटे और एक बेटी से भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।