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जमा किए 50,000, पांच साल बाद लौटाए सिर्फ 248
टीम डिजिटल/लखनऊ
Updated Sat, 28 Sep 2013 10:18 AM IST
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निजी क्षेत्र की एक बीमा कंपनी के कथित फ्रॉड के आरोप का मामला शुक्रवार को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के सामने आया।
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इसमें राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के रिटायर्ड वैज्ञानिक डॉ. वीरेन्द्र पाल कपूर (70) ने आरोप लगाया कि कंपनी ने उनसे 50,000 रुपये जमा करवाकर 5 साल बाद मात्र 248 रुपये लौटाए व परिपक्वता राशि में कटौती का ब्योरा भी नहीं दिया।
न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह व न्यायमूर्ति अशोक पाल सिंह की खंडपीठ ने रिटायर्ड वैज्ञानिक की रिट पर एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को नोटिस भेजकर 4 हफ्ते में जवाब तलब किया है।
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साथ ही रिट विचारार्थ मंजूर कर ली है। याचिका में पक्षकार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को यह निर्देश दिए जाने का आग्रह किया है कि एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस को अपना लोगो व शाखा आदि का नाम इस्तेमाल करने की इजाजत न दी जाए।
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याची का कहना था कि वर्ष 2007 में उसने प्रतिष्ठित बैंक के नाम से जुड़ी एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की यूलिप योजना में 50,000 रुपये इस भरोसा के साथ जमा किए थे कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया व एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी एक ही निकाय है।
याची के वकील ध्रुव कुमार के मुताबिक, वर्ष 2012 में आरटीआई के जरिए पता चला कि एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस लि. प्राइवेट कंपनी है। आरोप लगाया कि कि इस झांसे में आकर याची ने 50,000 रुपये जमा किए थे।
19 जनवरी 2012 को पॉलिसी मेच्योर होने पर याची को सिर्फ 248 रुपये की रकम लौटाई गई।
पता करने पर एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस ने याची को बताया कि उसकी रकम पर कई चार्जेस लगाए गए हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि इन शुल्कों में कितनी रकम की कटौती की गई है। आखिर में बुजुर्ग वैज्ञानिक ने थकहार कर हाईकोर्ट की शरण ली।
याचिका में केंद्र सरकार, बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण के चेयरमैन, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन समेत एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि. को मुख्य कार्यपाल अफसर (सीईओ) के जरिए पक्षकार बनाया गया है। मामले की अगली सुनवाई 6 हफ्ते बाद होगी।