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शिल्प कारीगरों को मिले पहचान, खुलें विश्वविद्यालय : अनारबेन पटेल

Thu, 14 Nov 2024 03:46 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ Updated Thu, 14 Nov 2024 03:46 AM IST
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Craft artisans should get recognition, universities should open: Anarben Patel
अनारबेन पटेल
गौरी त्रिवेदी
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लखनऊ। शिल्प कारीगरों को सम्मान व पहचान मिले, उन्हें बेचारा न समझा जाए। क्राफ्ट (हाथ के बने उत्पाद) हमारी विरासत हैं। विदेशों में क्राफ्ट के उत्पादों से हमारी पहचान है। यदि आज हम क्राफ्ट में पीएचडी खोजें तो मुश्किल से एक या दो ही मिलेंगी। यदि हम विश्वविद्यालय खोजें तो भी नहीं मिलेंगे। ये बातें ग्राम्यश्री व क्राफ्ट रूट्स की संस्थापक, समाजसेविका व उद्यमी अनारबेन पटेल ने राजभवन में अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहीं।

उन्होंने बताया कि 15 से 19 नवंबर तक कैसरबाग के सफेद बारादरी में लगने वाली प्रदर्शनी के बारे में बताया कि यहां देशभर से 20 कारीगर आ रहे हैं। प्रवेश निशुल्क है। हाथ के बने रोजमर्रा के विभिन्न उत्पादों के साथ यहां बहुत कुछ खास मिलेगा। प्रदर्शनी में 100 रुपये से लेकर अधिक दामों की वस्तुएं भी मौजूद रहेंगी।
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25 वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहीं अनारबेन पटेल बताती हैं कि उन्होंने अब तक करीब 35 हजार से अधिक महिलाओं को उद्यम प्रदान करवाया। क्राफ्ट रूट्स के जरिये 45 से अधिक शिल्पकलाओं को पहचान दिलाई है। उन्होंने बताया कि भारतीय कला परंपराओं को पुनर्जीवित करना और स्थायी कारीगरों को पहचान दिलाने के लिए वे भविष्य में विश्वविद्यालय भी खोलना चाहती हैं। बताती हैं कि मैं जब छोटी थी तो स्लम क्षेत्रों के छोटे बच्चों को पढ़ाने जाया करती थी। मैंने सोचा कि यदि मैं इनकी मां को काबिल बना दूं तो आधी समस्या हल हो जाएगी। तब से मैंने महिलाओं के समूह बनाकर उन्हें प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। फिर यह कारवां बनता गया। संवाद
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लोगों का भरोसा जीतना रहा चुनौती
अनारबेन पटेल ने बताया कि इस यात्रा में लोगों का भरोसा जीतना चुनौती रही। अभी हाल ही में हमारी क्राफ्ट रूट्स के जरिये कानपुर आईआईटी से संपर्क हुआ है। ताकि युवाओं का हाथ से बने उत्पादों की ओर रुझान हो। कई साल काम करने के बाद भी हमारे क्राफ्ट के कारीगरों को डिग्री या उतनी मान्यता नहीं मिलती हैं जितनी कि पांच साल या छह साल पढ़ने के बाद इंजीनियर या डाॅक्टर को मिल जाती है।
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