गुर्दों पर भी गंभीर हमला कर रहा कोरोना वायरस
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कोरोना वायरस की चपेट में आ रहे लोगों में गुर्दे से संबंधित विषमताएं देखने को मिल रही हैं। कुछ मरीजों में तो एक्यूट किडनी इंजरी (एकेआई) भी पाई गई है। इससे मरीजों की जान को खतरा रहता है।
इसलिए कोरोना के मरीजों के गुर्दे प्रभावित होने से बचाने की दिशा में नेफ्रोलाजिस्ट जुट गए हैं। इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी (आईएसएन) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना से संक्रमित करीब 25 से 50 फीसदी मरीजों में गुर्दे से संबंधित विषमताएं देखी गई हैं।
ये पेशाब में प्रोटीन और रक्त के पर्याप्त रिसाव के रूप में सामने आई हैं। इसकी वजह से भविष्य में करीब 15 प्रतिशत मरीजों में एक्यूट किडनी इंजरी की समस्या होने की आशंका रहती है।
सार्स और मर्स कोविड वाले मरीजों की रिपोर्ट के मूल्यांकन के दौरान भी यह बात सामने आई है कि करीब 15 फीसदी मरीजों में एक्यूट किडनी इंजरी हो जाती है। इसमें करीब 60 फीसदी को बचाना मुश्किल होता है।
इलाज में सीआरआरटी है महत्वपूर्ण
इसी तरह कोविड-19 से प्रभावित मरीजों पर किए अध्ययन में शुरुआती दौर में करीब तीन से नौ फीसदी मरीज ही एकेआई से प्रभावित थे, लेकिन अप्रैल की रिपोर्ट में पाया गया कि इनकी संख्या तेजी से बढ़ी है।
एसोसिएशन की ओर से कोविड-19 के 59 रोगियों के अध्ययन में पाया गया कि लगभग 46 मरीजों में अस्पताल में रहने के दौरान ही पेशाब में प्रोटीन का रिसाव पाया गया। यानी करीब दो-तिहाई मरीजों में यह समस्या पाई गई। ऐसे में अब प्रोटीन की जांच अनिवार्य कर दी गई है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन मरीजों में एकेआई के लक्षण दिखते हैं, उनका तत्काल उपचार शुरू कर दिया जा रहा है। इन मरीजों को दवाओं के साथ ही किडनी रिप्लेसमेंट थेरेपी, एंटीवायरल थेरेपी की अनुपस्थिति में कुछ मामलों में डायलिसिस, रीनल रिप्लेसमेंट थेरेपी (सीआरआरटी) की आवश्यकता पड़ती है।
भविष्य के लिए बड़ी चुनौती
एसजीपीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अमित गुप्ता ने बताया कि आम धारणा है कि कोविड सिर्फ श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है, लेकिन इसका असर अन्य तंत्रों पर भी दिख रहा है।
विभिन्न शोध रिपोर्ट में गुर्दे पर इसका असर पड़ने की बात सामने आई है, जो भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि तात्कालिक तौर पर उपलब्ध संसाधनों के जरिये मरीजों का इलाज किया जा रहा है।
अब तक ऐसे होता था एकेआई
एसजीपीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. नारायण प्रसाद ने बताया कि अभी तक मलेरिया या अन्य मच्छरजनित बीमारियों, सर्पदंश या जहरीला पदार्थ के खाने, प्रसव के दौरान अधिक दबाव, दर्द निवारक दवाओं के सेवन, पथरी सहित अन्य कारणों से मूत्रमार्ग में संक्रमण आदि की वजह से एकेआई होता है।
अभी तक 90 फीसदी मामले में इलाज के बाद दोबारा किडनी काम करने लगती है। 10 फीसदी में ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। इसी तरह कई बार करीब 40 फीसदी मरीजों को सपोर्टिंग ट्रीटमेट देकर किडनी की हालत सुधारी जा सकती है।