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चिकन उद्योग के 2000 करोड़ डूबे, इस साल की उम्मीदें टूटीं, कारीगर भूखमरी की कगार पर
Sun, 19 Apr 2020 10:16 AM IST
शाहरुख खान
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 19 Apr 2020 10:16 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : सोशल मीडिया
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राजधानी की पहचान चिकनकारी उद्योग पर भी कोरोना की लंबी मार पड़ी है। पीक सीजन में ही कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन से कारोबारियों को करीब-करीब 2000 करोड़ रुपये की चपत लग चुकी है। कुछ माल कारीगरों के पास डंप पड़ा है तो कुछ कारोबारियों के यहां पर।
भुगतान के संकट के चलते वे भुखमरी की कगार पर हैं। वहीं, कारोबारियों का कहना है कि तैयार माल को लॉकडाउन के बाद सैनिटाइज कर लोगों को उसे खरीदने के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती होगी। राजधानी के चिकन कारोबार पर एक रिपोर्ट...
इसी सीजन में बूम करता था कारोबार
कारोबारियों का कहना है कि मार्च से मई तक सीजन पीक पर रहता है। मार्च में हमें घरेलू ग्राहक मिलते हैं। यहां से माल देश भर में जाता है। अप्रैल और मई में माल की डिलीवरी विदेशों में होती है। खासकर यूरोप के देशों में इस मौसम में चिकन की बहुत मांग रहती है। पूरा सीजन तो लॉकडाउन में ही निकल गया। आगे भी कोई उम्मीद नहीं है।
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इस वर्ष तो कारोबार शून्य ही मानिए...
80 से 90 फीसदी आमदनी होती है पर्यटकों से
चिकन कारोबार में 80 से 90 फीसदी खरीदार तो पर्यटक होते हैं। जब यात्रा ही नहीं तो पर्यटक कहां से मिलेंगे। कारोबारी कहते हैं कि देश-दुनिया में जो हालात हैं, उससे लगता है इस वर्ष पर्यटक मिलेंगे ही नहीं। चिकन कारोबार को शून्य ही मान लेना चाहिए।
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भुगतान के संकट के चलते वे भुखमरी की कगार पर हैं। वहीं, कारोबारियों का कहना है कि तैयार माल को लॉकडाउन के बाद सैनिटाइज कर लोगों को उसे खरीदने के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती होगी। राजधानी के चिकन कारोबार पर एक रिपोर्ट...
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इसी सीजन में बूम करता था कारोबार
कारोबारियों का कहना है कि मार्च से मई तक सीजन पीक पर रहता है। मार्च में हमें घरेलू ग्राहक मिलते हैं। यहां से माल देश भर में जाता है। अप्रैल और मई में माल की डिलीवरी विदेशों में होती है। खासकर यूरोप के देशों में इस मौसम में चिकन की बहुत मांग रहती है। पूरा सीजन तो लॉकडाउन में ही निकल गया। आगे भी कोई उम्मीद नहीं है।
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इस वर्ष तो कारोबार शून्य ही मानिए...
80 से 90 फीसदी आमदनी होती है पर्यटकों से
चिकन कारोबार में 80 से 90 फीसदी खरीदार तो पर्यटक होते हैं। जब यात्रा ही नहीं तो पर्यटक कहां से मिलेंगे। कारोबारी कहते हैं कि देश-दुनिया में जो हालात हैं, उससे लगता है इस वर्ष पर्यटक मिलेंगे ही नहीं। चिकन कारोबार को शून्य ही मान लेना चाहिए।
कारीगर भुखमरी की कगार पर
चिकन कारोबारी संजीव अग्रवाल कहते हैं कि 90 से 100 के बीच बड़े जबकि 4000 से 5000 के बीच छोटे उद्यमी हैं। एक बड़े कारोबी के स्टाफ व कारीगारों की संख्या 4 हजार के करीब है। सभी भुखमरी की कगार पर हैं। माल इनके पास तैयार है, पर लाएं कैसें। कारीगर बार-बार एडवांस मांग रहे हैं। कई लोगों को दिया भी गया है।
बुक ऑर्डर भी रद्द ही मानें
चिकन कारोबारी संजीव झिंगरन कहते हैं कि स्पेन, बांग्लादेश, अमेरिका, दुबई, श्रीलंका, यूरोप समेत दुनिया भर में चिकन लखनऊ से ही जाता है। बड़ी संख्या में आर्डर तैयार किए गए थे। सब डंप हो गया। लोग इसे लेंगे, इसमें भी संदेह है। लॉकडाउन खुलते ही ऑर्डर कैंसिल होने तय हैं। कुछ तो ऑनलाइन होने भी लगे हैं।
माल सैनिटाइज करना बड़ी चुनौती
कारोबारी दिलीप खैराजानी कहते हैं कि कारीगर माल बना रहे हैं, न जाने कितने हाथों से होकर वह गुजर रहा है। लॉकडाउन के बाद माल को सैनिटाइज करना बड़ी चुनौती होगी। चिकन वैसे ही लोगों की प्राथमिकता में नहीं है। संकट के इस दौर के बाद लोग अन्य जरूरतें पूरी करेंगे। चिकन खरीदने कौन आएगा?
बड़ा सवाल : कारीगरों को भुगतान कहां से करें
चिकन कारोबारी शैलेंद्र व सुरेश का कहना है कि हमें कारीगरों को भुगतान करना होगा, नहीं तो हमारा माल असुरक्षित हो जाएगा। हम सब अनिश्चितता में हैं। सवाल यह भी है कि इतना फंड कहां है जो हम दें। कमाई तो इस साल शून्य मान लीजिए। कारीगर ही नहीं रहेगा तो उद्योग किसके भरोसे करेंगे।
बुक ऑर्डर भी रद्द ही मानें
चिकन कारोबारी संजीव झिंगरन कहते हैं कि स्पेन, बांग्लादेश, अमेरिका, दुबई, श्रीलंका, यूरोप समेत दुनिया भर में चिकन लखनऊ से ही जाता है। बड़ी संख्या में आर्डर तैयार किए गए थे। सब डंप हो गया। लोग इसे लेंगे, इसमें भी संदेह है। लॉकडाउन खुलते ही ऑर्डर कैंसिल होने तय हैं। कुछ तो ऑनलाइन होने भी लगे हैं।
माल सैनिटाइज करना बड़ी चुनौती
कारोबारी दिलीप खैराजानी कहते हैं कि कारीगर माल बना रहे हैं, न जाने कितने हाथों से होकर वह गुजर रहा है। लॉकडाउन के बाद माल को सैनिटाइज करना बड़ी चुनौती होगी। चिकन वैसे ही लोगों की प्राथमिकता में नहीं है। संकट के इस दौर के बाद लोग अन्य जरूरतें पूरी करेंगे। चिकन खरीदने कौन आएगा?
बड़ा सवाल : कारीगरों को भुगतान कहां से करें
चिकन कारोबारी शैलेंद्र व सुरेश का कहना है कि हमें कारीगरों को भुगतान करना होगा, नहीं तो हमारा माल असुरक्षित हो जाएगा। हम सब अनिश्चितता में हैं। सवाल यह भी है कि इतना फंड कहां है जो हम दें। कमाई तो इस साल शून्य मान लीजिए। कारीगर ही नहीं रहेगा तो उद्योग किसके भरोसे करेंगे।