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महामारी ने क्या-क्या छीना, इन गांवों की गलियों से पूछो...

Tue, 08 Jun 2021 01:16 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 08 Jun 2021 01:16 AM IST
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corona
लखनऊ। महामारी की जंग हम और आप आज नहीं तो कल जीत ही लेंगे, लेकिन जो कुछ भी ये बीमारी छीन कर ले गई है, उसे खोने का गम ताउम्र सालता रहेगा। जब तक सांसें हैं, जिंदगी तो लोग जिएंगे, लेकिन जिस दिन कोई बेटा अपने पिता के सपनों को पूरा कर काबिल बनेगा, उस दिन उसकी आंखें पिता को याद कर खूब बरसेंगी। जिस दिन किसी बेटी के हाथ में मेहंदी रचेगी, उस दिन उसकी आंखें विदाई से कम, बल्कि उसकी शादी का सपना आंखों में लिए चले गए पिता की कमी से ज्यादा रोएंगी। जिन्दगी के अलग-अलग रंग हैं, मौत के बाद ये फिर अपनी रफ्तार पकड़ लेती है। जिन गांवों की गलियों में कोविड से हुई मौत का मातम है, वहां भी धीरे-धीरे ही सही जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ने लगी है। सुखद ये कि दुख में कोई अकेला नहीं, आसपास बड़े-बुजुर्ग साथ खड़े हैं। पढ़िए एक रिपोर्ट...।
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बीकेटी : परिवार ने खो दिया कमाऊ पूत
बख्शी का तालाब के इंदारा में 30 वर्षीय अनिल कुमार की महामारी काल में असमय मौत से पूरा परिवार टूट गया। अनिल घर के कमाऊ पूत थे। पिता की मौत के बाद वही मिठाई की दुकान चलाकर परिवार का भरण पोषण करते थे। पत्नी प्रीति और 10 वर्षीय बेटा ही नहीं मां शशि देवी की भी उम्मीदें अनिल पर टिकी थीं। एक बहन राखी भी परिवार में है। छोटे भाई सुनील ने बताया कि उनके पास सिर्फ 10 बिस्वा जमीन है। दुकान से ही खर्च चलता था। अनिल के जाने से घर का खर्च चलना भी दूभर हो रहा है। मां शशि कहती हैं कि मदद के लिए अधिकारियों से गुहार लगाई है।
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संकट की घड़ी में गांव वाले एक साथ
कोरोना त्रासदी में इंदारा गांव में एक के बाद एक 15 मौतें हुईं। इससे गांव में मातम सा छा गया था। गांव के ही अमरेंद्र भदौरिया ने बताया कि फिर धीरे-धीरे स्वास्थ्य टीमें पहुंचीं। जांचें हुईं और सभी ने सतर्कता बरती। मुश्किल घड़ी में गांव वाले एक साथ खड़े रहे। अब यहां कोई संक्रमण से बीमार नहीं है।
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गोसाईंगंज : बच्चों को काबिल बनाने का सपना लिए चले गए सिराज
गोसाईंगंज के रहमतनगर निवासी सिराज अहमद सिलाई का काम करते थे। उनका सपना बच्चों को अच्छी तालीम देकर काबिल बनाना था। इसीलिए उन्होंने बेटे को सिलाई के काम से दूर रखा था। हालांकि, 20 अप्रैल को असमय मौत के साथ सिराज के सपने भी अधूरे रह गए। सिराज के परिवार में पत्नी शम्मो जहां व तीन बच्चे हैं। बेटा अमेठी स्थित निजी स्कूल में हाईस्कूल का छात्र है। उसने बताया कि वह विज्ञान वर्ग में प्रवेश लेना चाहता था, लेकिन अचानक अब्बू की मौत हो गई। उसकी बहन व पांच साल का भाई भी है, जिसे इस बार स्कूल भेजने की तैयारी थी। शम्मो रुंधे गले से कहती हैं कि पढ़ाई तो दूर अब तो पेट पालने के लाले हैं। बचत की रकम पति के इलाज में लग गई। फिलहाल रिश्तेदारों से उधार लेकर काम चला रहे हैं। मेहनत मजदूरी करके पैसा वापस करेंगे।
गांव में था डर का माहौल
रहमतनगर में एक नहीं कई मौतें होने और कई लोगों के बीमार होने से डर का माहौल था। इस पर स्वास्थ्य विभाग की टीम, युवा प्रधान मनीष रावत, किसान नेता गोपी कृष्ण व अन्य जागरूक लोगों ने ग्रामीणों की काउंसिलिंग कर सबकी जांच कराई और गांव में सैनिटाइजेशन कराया। मेडिकल टीम ने 300 जांच और डोर टू डोर जाकर लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण किया। यह मेहनत रंग लाई और गांव का माहौल सामान्य हो गया।
माल : बेटियों के हाथ पीले नहीं कर सके गुड्डू शुक्ला
माल कस्बा निवासी मनोज कुमार शुक्ला उर्फ गुड्डू की कोरोना के लक्षणों के बाद मौत हो गई। पत्नी, दो बेटियां व दो बेटों की जिम्मेदारी संभाल रहे गुड्डू शुक्ला की मौत के बाद परिवार के सामने विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। इस समय परिवार आर्थिक तंगी के साथ अनेकों समस्याओं से जूझ रहा है। गुड्डू अपनी बेटियों अर्चना शुक्ला व वर्तिका शुक्ला के हाथ भी पीले नहीं कर सके। उनके दो बेटे दिव्यांश शुक्ला व कुशाग्र शुक्ला हैं। दोनों अभी पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन पिता की मौत से दोनों पर अचानक जिम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा है। फिलहाल पति की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी सुमन के कंधों पर है। गांव की कुछ जमीन पर होने वाली खेती से वह परिवार का भरण पोषण कर रही हैं। शिकायत है कि अभी तक सरकार की ओर से परिवार को कोई सुविधा नहीं मिली है।

गांव में प्रबुद्ध वर्ग ने संभाली कमान
माल कस्बा वासी कुछ समय पहले अपने यहां हुईं मौतों से दहशत में आ गए थे। बीमारी व मौतों का सिलसिला रोकने के लिए स्वास्थ्य जांच व दवा वितरण हुआ। साथ ही कुछ प्रबुद्ध समाज सेवियों ने गांव में सैनिटाइजेशन कराने की शुरुआत कराई। लोगों ने हौसला दिखाते हुए दवा छिड़काव कराने में साथ दिया। बिना मास्क तथा उचित दूरी का मखौल उड़ाने वाले भी कोविड प्रोटोकाल का पालन करने लगे। अब हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं।
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