सियासत को कितना बदलेगा मोदी और टीपू का 'दोस्ताना'?
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लोकसभा चुनाव में 56 इंच के सीने से शुरू हुई मोदी और मुलायम के बीच तकरार सांड़ और शेर तक जा पहुंची थी लेकिन चुनाव नतीजों के बाद मोदी के शपथ ग्रहण में सपा मुखिया का पहुंचना एक सकारात्मक सियासी संकेत था। कुछ इसी तरह का सियासी शिष्टाचार वाराणसी में देखने को मिला जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगवानी के लिए वहां पहुंचे।
सपा मुखिया मुलायम सिंह की भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने की मुहिम और काबीना मंत्री आजम खां की मोदी के खिलाफ बयानबाजियों के बीच सीएम की यह पहल काफी सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। इससे पहले सपा के यूपीए की सहयोगी होते हुए भी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगवानी के लिए वरिष्ठ मंत्रियों को भेजा जाता था।
वहीं, मोदी ने भी केंद्र की विकास परियोजनाओं के लिए जमीन न देने पर यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा किया तो अपनी महत्वाकांक्षी मुहिम ‘स्वच्छ भारत’ के लिए सीएम अखिलेश को अपने नवरत्नों में शामिल कर बड़ा संदेश देने की कोशिश भी की। उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि विकास के मसले पर सियासत को दूर ही रखना होगा।
सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है तकरार
सवाल यही है कि आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह शिष्टाचार दोनों सरकारों को कितना आगे तक ले जाएगा? प्रदेश को इसका कितना फायदा मिलेगा? राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि प्रदेश का अगला चुनाव विकास के साथ बिजली पर लड़ा जाना है।
बिजली को लेकर केंद्र व प्रदेश के बीच आरोप-प्रत्यारोप मीडिया से सोशल मीडिया तक जा पहुंचे हैं। बिजली मंत्री पीयूष गोयल की मुख्यमंत्री से पहले से तय मुलाकात टल चुकी है। ऐसे में केंद्र व प्रदेश के रिश्ते में बिजली व कोयला एक बड़ा मुद्दा होगा।
प्रदेश के किसान इस बार बाढ़ और सूखे के अलावा हुदहुद जैसे चक्रवातीय तूफान से हजारों करोड़ का नुकसान झेल चुके हैं। केंद्र ने अपने विशेषज्ञों की टीम से नुकसान का आकलन कराने के बावजूद अब तक कोई मदद प्रदेश को नहीं दी। इसके लिए राज्य सरकार के अफसर लगातार केंद्र से पैरवी कर रहे हैं। केंद्रीय योजनाओं के बजट को लेकर भी लिखा-पढ़ी जारी है।
दिखेंगे इस शिष्टाचार के नतीजे
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि तकरार सियासी मजबूरी है लेकिन विकास पर पीएम और सीएम की सोच एक जैसी है। सूबे में जिस तरह बड़ी-बड़ी विकास योजनाएं राज्य सरकार ने शुरू की हैं, उससे केंद्र के अफसर भी प्रभावित हैं। एक्सप्रेस वे, आईटी सिटी, मेट्रो रेल, सड़कों के विस्तार जैसी परियोजनाएं शुरू कर सीएम ने विकास का माहौल बनाया है।
ऐसे माहौल में मुख्यमंत्री ने आगे बढ़ सियासी शिष्टाचार निभाकर बड़ी पहल कर दी है। दूसरा, मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के जमीन न देने से जुड़े सवाल पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने साफ-साफ कहा कि पीएम जिस योजना के लिए जहां चाहेंगे, सरकार वहां जमीन देने को तैयार है।
पिछली बसपा सरकार के दौरान यह शिष्टाचार न जाने कहां छूट गया था। तीसरी बात, जब सीएम खुद आगे बढ़कर पीएम की अगवानी के लिए जा सकते हैं तो किसी मसले पर पीएम को सीधे फोन कर बात भी कर सकते हैं। शिष्टाचार भूलने पर ऐसे अवसर बन ही नहीं पाते।
यहां दिखी दूरी पर नजर आयी कदमताल
मुख्यमंत्री को इस बात का तो रंज है कि उनके द्वारा जमीन देने के बावजूद रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री के उद्घाटन मौके पर यूपीए शासनकाल में उन्हें आमंत्रित तक नहीं किया था, मगर वे यह भूल जाते हैं कि सीजी सिटी के विकास के लिए केंद्र ने आईटी सिटी को सेज का दर्जा दिया है।
इसके बावजूद उन्होंने शिलान्यास समारोह में मौजूदा सरकार के विभागीय मंत्री तक को नहीं बुलाया। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र राजधानी लखनऊ में मेट्रो लाने में केंद्र की हिस्सेदारी है, मगर शिलान्यास पट पर उनका नाम तक गायब होना भाजपाइयों को अखर गया। परियोजना राज्य की हो या केंद्र की, सभी क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को उससे जोड़ने की परंपरा रही है।
यहां दिखा कदमताल
मुख्यमंत्री ने पीएम की हर पहल को राज्य में अपनाने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री जापान गए तो मुख्यमंत्री ने वहां से आने वाले निवेश को सूबे में लाने के लिहाज से जापान डेस्क बना दिया। प्रधानमंत्री को काशी को क्योटो की तरह विकसित करने के प्रस्ताव पर पूरी मदद का भरोसा दिया।
पीएम ने केंद्रीय सेवा में राजपत्रित अधिकारियों से अटेस्ट करने की व्यवस्था खत्म करने का सुझाव दिया तो सीएम ने तत्काल आदेश जारी कर दिया। पीएम ने पेपरलेस सेक्रेट्रिएट की दिल्ली में बात की तो सीएम ने सूबे के आईटी डिपार्टमेंट से इसकी शुरुआत कर दी।
इन मामलों पर प्रदेश को है केंद्र से उम्मीद
- केंद्र सरकार बिजली और कोयले को लेकर राज्य की मुश्किल समझे और पूरी मदद दे।
- प्रदेश में सूखे से करीब 60 जिले प्रभावित हैं। अभी तक कोई मदद नहीं मिली है। केंद्र इन्हें ज्यादा से ज्यादा मदद दे।
- बाढ़ से करीब 22 जिले बहुत ज्यादा प्रभावित हुए। करीब 5000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। राहत के लिए केंद्र ने कोई मदद नहीं भेजी। हुदहुद तूफान से एक दर्जन जिले प्रभावित हुए। इनके लिए भी मदद की दरकार है।
- प्रदेश में चलने वाली केंद्रीय योजनाओं के लिए समय से बजट दिया जाए ताकि तेजी से विकास हो सके।
केंद्र की प्रदेश से अपेक्षा
- केंद्र के मंत्रालयों से जुड़ी योजनाओं के लिए प्रदेश पूरा सहयोग करे। जमीन दे।
- केंद्र जो अभियान शुरू करे, राज्य उसे पूरी ताकत से आगे बढ़ाए। स्वच्छता अभियान इसका पैमाना बनेगा।
- गंगा व अन्य नदियों की सफाई जैसी मुहिम में राज्य पूरी मदद दे। सक्रिय सहयोगी की भूमिका निभाए।
- जिस तरह केंद्र ने आदर्श सांसद ग्राम योजना शुरू की, यूपी भी गुजरात सरकार की तर्ज पर आदर्श विधायक ग्राम योजना शुरू कर विकास की नई लकीर को आगे बढ़ाए।
-केंद्र की मदद से लागू होने वाली योजनाओं में राज्य सरकार के साथ केंद्र को पूरा श्रेय दिया जाए।