फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   challenges for rahul gandhi in uttar pradesh.

यूपी के चक्रव्यूह को तोड़ना राहुल के लिए बड़ी चुनौती, आपातकाल के बाद भी कांग्रेस नहीं थी इतनी बदहाल

Mon, 18 Dec 2017 10:51 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 18 Dec 2017 10:51 AM IST
विज्ञापन
challenges for rahul gandhi in uttar pradesh.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

राहुल गांधी के औपचारिक रूप से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालने के साथ एक बार फिर यह सवाल प्रासंगिक हो गया है कि उनके अपने घर उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी का भविष्य क्या होगा। पिछले तीन दशक से एक के बाद एक मुश्किलों में घिरी कांग्रेस राहुल के युवा नेतृत्व में प्रदेश में युवाओं जैसा जोश हासिल कर अपनी जडे़ं दोबारा जमा पाएगी या उसका हाल यूं ही बना रहेगा।

विज्ञापन


यह सवाल इसलिए और ज्यादा मौजूं हो गया है क्योंकि राहुल के हाथ में उस समय पार्टी की कमान आई है जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक बुरे दिनों से गुजर रही है। जिस तरह की स्थितियां और समीकरण दिखाई दे रहे हैं, उनको देखते हुए राहुल के लिए यूपी में कांग्रेस का पुनरुद्धार किसी कठिन परीक्षा से कम नजर नहीं आता। इसमें पास होने के लिए उनके पास लंबा वक्त भी नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उत्तर प्रदेश में उन्हें पहली और बड़ी परीक्षा लगभग एक साल बाद ही 2019 में लोकसभा चुनाव में देनी है।
विज्ञापन


जिस कांग्रेस को पराजित करना कभी विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती हुआ करता था। जिसे हराने के लिए कई बार घोर विरोधी भाजपा और सोशलिस्ट पार्टी के लोगों को एक-दूसरे से हाथ मिलना पड़ता था। उसी कांग्रेस के उत्तर प्रदेश की विधानसभा में आज सिर्फ सात विधायक हैं। आपातकाल के दौरान भी इतने कम विधायक यहां नहीं थे। तब भी कांग्रेस के 47 विधायक जीत गए थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


लोकसभा में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के इस समय सिर्फ दो सांसद हैं-राहुल खुद और उनकी मां सोनिया गांधी। हाल ही हुए निकाय चुनाव में भी कांग्रेस का बुरा हाल रहा है। महापौर की तो कोई सीट कांग्रेस जीती ही नहीं, नगर पालिका परिषद अध्यक्ष पद की 198 सीटों में मात्र नौ और नगर पंचायतों के अध्यक्ष के 438 पदों में सिर्फ 17 ही वह जीत पाई है।

राहुल के नेतृत्व व संगठन क्षमता की कसौटी

challenges for rahul gandhi in uttar pradesh.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मां सोनिया गांधी के साथ

बतौर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए यूपी में अपनी पार्टी को मजबूती से खड़ा करना और उसका विस्तार करना उनके नेतृत्व और संगठन क्षमता की प्रमुख कसौटी होगा। वह भी इसलिए क्योंकि कांग्रेस यूपी में सर्वाधिक बुरे वक्त से ही नहीं गुजर रही, बल्कि पार्टी के स्थानीय नेताओं का रवैया भी यथास्थितिवादी जैसा दिख रहा है।

राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो ऐसी स्थिति में हताशा इस कदर भर जाती है कि इच्छाशक्ति ही मर जाती है। लगने लगता है कि फिलहाल कुछ नहीं हो सकता। कम से कम यूपी में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ऐसा ही हाल दिखता है।

कांग्रेस के किसी आम कार्यकर्ता से बात करें तो उसके मुंह से नाउम्मीदी की बात ही निकलती है। यह भी पीड़ा फूट पड़ती है कि ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स और सिर्फ मीडिया की डिबेट की मेजों तक सिमटे नेताओं से छुटकारा और जमीनी लोगों को आगे बढ़ाए बिना कुछ नहीं होने वाला, जो आसान नहीं है।

यह है वजह
एक तो लंबे समय से घूम-फिरकर उन्हीं चेहरों के शीर्ष पर रहने और गणेश परिक्रमा करके पद पाने की परंपरा ने कांग्रेस के सामने जनाधार वाले नेताओं का अकाल पैदा कर दिया है। रही-सही कसर पूरी कर दी कांग्रेस की तरफ से दूसरे दल की बैसाखी के सहारे अपने पुनरुद्धार की चाहत के प्रयोग ने। कभी बसपा तो कभी सपा जैसे दलों की सरकारों को समर्थन और कभी गठबंधन ने कांग्रेस को कितना लाभ पहुंचाया, इसका आकलन तो कांग्रेस के ही नेताओं को होगा। पर, नतीजों से कांग्रेस के पुराने वैभव वाले दिन लौटते हुए नहीं दिखे। हां, पार्टी में नए लोगों के उभरने की प्रक्रिया जरूर दम तोड़ गई।

राहुल के लिए दूसरा रास्ता नहीं

challenges for rahul gandhi in uttar pradesh.

राहुल के लिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पुनरुद्धार जरूरी भी है, क्योंकि इसके बिना उनके लिए देश में पहले जैसी मजबूती के साथ पार्टी को खड़ा कर पाना और खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना मुश्किल होगा। कारण, लोगों के जेहन में यह सवाल बार-बार कौंधेगा कि जहां से वह सांसद हैं, अगर उस प्रदेश में कांग्रेस के आगे बढ़ने का रास्ता नहीं निकल रहा तो फिर दूसरी जगह कैसे निकलेगा।

इसलिए राहुल को गुजरात चुनाव के बाद दूसरे राज्यों के एजेंडे पर जुटने के साथ उत्तर प्रदेश में 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की वापसी के मिशन को विशेष तौर से हाथ में लेना होगा। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल भी कहते हैं कि राहुल को 2019 की परीक्षा में पास होने के लिए कांग्रेस को अपने दम पर खड़े होने की कोशिश करनी होगी।

सपा या बसपा के सहारे अपने विस्तार या भाजपा को हराने का सपना देखने के बजाय यूपी में नाउम्मीदी का कारण बन चुके नेताओं से कांग्रेस को मुक्त कराकर कार्यकर्ताओं को हताशा से उबारना पड़ेगा। गणेश परिक्रमा के सहारे कांग्रेस पर कब्जा किए जनाधार विहीन नेताओं के चक्रव्यूह को तोड़कर सामाजिक समीकरण में फिट बैठने वाले संघर्षशील लोगों की टीम बनानी होगी जो अपने दम पर सत्ता के विरुद्ध आंदोलन कर सके, कार्यकर्ताओं में जोश भर सके।

राहुल अगर इसमें सफल हो गए तो बाकी इम्तिहान में पास होना आसान हो जाएगा। पर, टीम अगर वैसी ही बनी जैसी अभी तक अपने-अपने लोगों को समायोजित करने के लिए बनती रही है तो फिर कांग्रेस का हाल बदलने वाला नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed