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कैग की रिपोर्ट : कछुए जैसी चाल तो कैसे बदले सूरत ए हाल, सालों साल बाद पेश हो रही है कैग की रिपोर्ट
Thu, 22 Sep 2022 09:26 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Thu, 22 Sep 2022 09:26 PM IST
सार
कैग संबंधित विभाग का गहनता से ऑडिट करता है। फिर अपनी ऑडिट आपत्तियां लगाता है जिस पर संबंधित विभाग को जवाब देना पड़ता है। जवाब के साथ इस रिपोर्ट को शासन को भेजकर टिप्पणी मांगी जाती है। फिर विश्लेषण के बाद निष्कर्ष के साथ यही रिपोर्ट राज्यपाल को भेज दी जाती है।
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cag
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) के अधिकतर ऑडिट में सरकारी सिस्टम में हुए गड़बड़झालों का खुलासा तो हो जाता है पर इस ऑडिट की गति बेहद धीमी होती है। इसकी रिपोर्ट सालों साल बाद सदन में रखी जाती है जिसका परिणाम यह रहता है कि आरोपियों पर अपेक्षित कार्रवाई की उम्मीद कम रह जाती है। उप्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके और वित्त की बारीकियों को महीन ढंग से समझने वाले सेवानिवृत अधिकारी भी कहते हैं कि यह ऑडिट तेजी से होना चाहिए और इसकी रिपोर्ट भी समय रहते ही सदन में पेश होनी चाहिए।
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31 मार्च 2020 को समाप्त हुए वर्ष के लिए गत दिवस सदन में कैग की रिपोर्ट पेश की गई। अहम बात यह है कि इसमें जहां किसानों को मुफ्त बिजली देने केलिए वर्ष 2017 से 2019 तक की रिपोर्ट पेश की गई तो वहीं यूपीएसआरटीसी के इंटेलिजेंट ट्रासंपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम का वर्ष 2013 से 2015 तक की सर्वे रिपोर्ट रखी गई। वन विभाग में जेसीबी की जगह मोपेड से गड्ढे खोदने में हुए भुगतान संबंधी रिपोर्ट वर्ष 2016 से 2019 तक रही। इससे पूर्व सदन में रखी गई रिपोर्ट भी सालों पुरानी थी। अहम यह है कि इतनी पुरानी रिपोर्ट पर कार्रवाई भी कम ही हो पाती है। कई बार जांच के घेरे में आए अधिकारी रिटायर हो चुके होते हैं वे योजनाएं ही दम तोड़ रही होती हैं जिनका ऑडिट किया गया था।
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पोस्टमार्टम जैसी हो गई हैं कैग की रिपोर्ट : आलोक रंजन
उप्र सरकार के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन कहते हैं कि ऑडिट जल्दी होना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा एक साल बाद रिपोर्ट दे दी जाए। सालों साल बाद रिपोर्ट आती है जिसका कोई औचित्य नहीं रह जाता। यह एक पोस्टमार्टम सरीखी रिपोर्ट होती है जो बाद में होती है। लोक लेखा समिति के समक्ष यदि समय मामले पेश किए जाए तो वहां भी जल्दी ही इस पर निर्णय लिए जा सकते हैं। लेकिन वहां देरी होने से विभिन्न मामलों में आश्वासन, चेतावनी आदि देकर ही मुद्दे को ड्रॉप कर दिया जाता है।
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टीमों की जिम्मेदारी तय कर एक्शन हो : मुकेश मित्तल
लंबे समय तक सरकार में वित्त सचिव के पद पर रहे रिटायर्ड आईएएस मुकेश मित्तल कहते हैं कि वास्तव में यह परेशानी है कि यह ऑडिट रिपोर्ट काफी देर से पेश होती हैं। ऐसे में इन पर सार्थक एक्शन नहीं हो पाता। कुछ मामले लोक लेखा समिति के समक्ष जाते हैं। वहां से निर्णय होता है। वास्तव में हर ऑडिट का एक शेड्यल जारी होता है। इसके बावजूद जो भी अधिकारी देर से काम करते हैं, या सर्वे करने में ज्यादा समय लगाते हैं उसकी जिम्मेदारी तय कर उसके खिलाफ एक्शन होना चाहिए। संबंधित मंत्रालय को इस पर गंभीरता दिखानी चाहिए।
यह है कैग की प्रक्रिया
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक भारतीय संविधान के अध्याय 5 (4) द्वारा स्थापित एक प्राधिकारी है जो भारत सरकार अलावा सभी प्रदेश की सरकारों के सभी तरह के लेखों का अंकेक्षण, परीक्षण करता है। वह ऐसी कंपनियों का भी अंकेक्षण करता है जो वह सरकार के स्वामित्व वाली हैं । सार्वजनिक लेखा समितियाँ इस रिपोर्ट पर ध्यान देती है। यह एक स्वतंत्र संस्था के रूप में कार्य करते हैं और इस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता।
कैग संबंधित विभाग का गहनता से ऑडिट करता है। फिर अपनी ऑडिट आपत्तियां लगाता है जिस पर संबंधित विभाग को जवाब देना पड़ता है। जवाब के साथ इस रिपोर्ट को शासन को भेजकर टिप्पणी मांगी जाती है। फिर विश्लेषण के बाद निष्कर्ष के साथ यही रिपोर्ट राज्यपाल को भेज दी जाती है।