मुलायम के एक अहम प्रस्ताव पर अखिलेश करेंगे फैसला
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सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में उद्यमियों को 100 करोड़ रुपये से अधिक निवेश पर दी जाने वाली सहूलियतों से जुड़े मामले में दूसरे मंत्रिसमूह की रिपोर्ट को कैबिनेट में पेश करने की तैयारी है। शासन ने विभिन्न विभागों से इस पर मत लेने की कार्यवाही पूरी कर ली है।
मौजूदा सरकार ने सत्ता संभालने के बाद इस मामले में निर्णय के लिए एक मंत्रिमंडलीय उपसमिति गठित की थी। तत्कालीन कृषि मंत्री आनंद सिंह की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय मंत्रिसमूह ने 14 अप्रैल 2013 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को रिपोर्ट सौंपी। बाद में रिपोर्ट कैबिनेट में रखी गई तो वह इसकी सिफारिशों से संतुष्ट नहीं हुई।
कैबिनेट ने नए सिरे से विचार के लिए एक पांच सदस्यीय नया मंत्रिसमूह बना दिया था। पांच जून 2013 को नया मंत्रिसमूह बना। इसमें कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री अहमद हसन, तत्कालीन मंत्री आनंद सिंह, राजेंद्र चौधरी, शिव कुमार बेरिया, बलराम यादव शामिल किए गए।
सूत्रों का कहना है कि बाद में आनंद सिंह को सरकार ने कैबिनेट से हटाया तो कैलाश यादव को मंत्रिसमूह में शामिल किया। इस मंत्रिसमूह ने पिछले दिनों अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी थी। बताते हैं कि इस रिपोर्ट पर प्रकरण से जुड़े विभागों की भी राय ली गई।
न्याय विभाग से राय लेने की दी सलाह
विभागों ने रिपोर्ट पर कोई स्पष्ट राय देने के बजाय प्रकरण न्यायालय से जुड़ा होने की वजह से इस पर निर्णय के पूर्व न्याय विभाग से राय लेने की सलाह दी। इस पर कार्यवाही चल रही है।
प्रमुख सचिव अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास संजीव सरन ने बताया कि रिपोर्ट विभाग को मिल चुकी है। इस पर निर्णय के लिए कैबिनेट को भेजा जाना है। रिपोर्ट को कैबिनेट भेजने से पूर्व की कार्यवाही चल रही है। कार्यवाही पूरी हो गई तो इसे कैबिनेट की आगामी बैठक में विचार के लिए रख दिया जाएगा।
ये था मामला
पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में 100 करोड़ और 200 करोड़ रुपये से अधिक निवेश पर कई तरह की रियायतों का फैसला हुआ था। वर्ष 2006 की इस स्कीम के आने के बाद 11 उद्यमियों ने निवेश किए।
बसपा सरकार आई तो उसने यादव के कार्यकाल में घोषित रियायतों पर रोक लगा दी। उन्हीं कंपनियों को इस शर्त के साथ सुविधाएं देने की बात कही जिन्होंने तब तक यूनिट लगाने का काम शुरू कर दिया था या जिन्हें लेटर आफ कम्फर्ट जारी हो गया था। नवंबर 2011 में इस शर्त को भी समाप्त कर पूरी तरह रोक लगा दी।
जो सात कंपनियां कोर्ट गई थीं उनमें से पांच को पात्र घोषित करते हुए अनुदान भी जारी कर दिया गया था। मामला हाईकोर्ट गया तो वहां से निर्णय के लिए सरकार को निर्देशित किया गया।
सात साल से इंतजार कर रहे उद्यमी
प्रकरण सपा मुखिया के कार्यकाल से जुड़ा होने की वजह से उद्यमियों को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार कम से कम इसमें ज्यादा वक्त नहीं लगाएगी।
बसपा शासनकाल में मुश्किलें झेलने वाले उद्यमियों को देखते-देखते इस सरकार में भी ढाई साल बीत गए।
सरकार इस मामले में एक मंत्रिसमूह की रिपोर्ट को अस्वीकार कर चुकी है और दूसरे की रिपोर्ट अभी तक कैबिनेट तक नहीं पहुंच पाई है। इससे उद्यमियों में निराशा बढ़ती जा रही है।