'साहित्यकारों ने सालों तक मौज उड़ाई, अब लौटा रहे अवॉर्ड'
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केंद्रीय विदेश और कार्यक्रम क्रियान्वयन राज्यमंत्री वीके सिंह ने तमाम लेखकों के साहित्य अकादमी अवार्ड वापस करने के सवाल पर पलटकर सवाल पूछा- क्या इससे पहले लेखकों पर हमले नहीं हुए? क्या इससे पहले नृशंस घटनाएं नहीं हुईं? तब इन लेखकों ने अवार्ड वापस क्यों नहीं किए?
वीके सिंह ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये साहित्यकार उस वक्त कहां थे, जब सिखों का नरसंहार हुआ। हादसे तो पिछले 25 वर्षों में बहुतेरे हुए हैं, तब साहित्यकारों ने विरोध का यह तरीका क्यों नहीं अपनाया? बेशक विरोध लोकतंत्र में जरूरी है, पर इसे राजनीतिक रूप नहीं देना चाहिए, जोकि अब हो रहा है। इन साहित्यकारों ने 20 वर्षों तक तो पुरस्कारों का फायदा उठाया और अब अवार्ड लौटा रहे हैं।
वीके सिंह लखनऊ के हजरतगंज स्थित यूनिवर्सल बुक स्टोर पर शनिवार को अपनी आत्मकथा ‘करेज एंड कनविक्शन’ के हिंदी अनुवाद ‘साहस और संकल्प : एक आत्मकथा’ के विमोचन समारोह में पहुंचे थे।
उन्होंने कहा, उन्होंने कहा कि मीडिया की ओर से जिस तरह से चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया या किया जा रहा है, वह ठीक नहीं है।
धार्मिक असहिष्णुता की घटनाएं पहले भी हुई हैं। मीडिया को लोगों के सामने खबरें सोच-समझकर परोसनी चाहिए। वहीं, दालों के बढ़ते दाम पर वीके सिंह ने कहा कि पहले भी दालें महंगी बिक चुकी है।
'चेहरे पर कालिख पोतने की घटना को सरकार से जोड़ना सही नहीं'
मुंबई में सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोतने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कालिख पोतने की घटनाएं पहले भी हुई हैं, इसे किसी भी तरह से मौजूदा सरकार से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
दादरी संबंधी एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि स्थानीय घटना को मीडिया ने बहुत ज्यादा दिखाया, जिससे ऐसा लगने लगा कि देश में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ी है, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है।
वीके सिंह ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री महेश शर्मा के हाल ही में आए विवादित बयान पर कहा, उनके या मेरे विचार केंद्र सरकार का आधिकारिक पक्ष नहीं हैं।
नेपाल के चीन की ओर ज्यादा झुकाव संबंधी चर्चाओं को भी उन्होंने गलत ठहराया। कहा, एकाध घटना से किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल दौरे के बाद से स्थितियां काफी बदली हैं। उन्होंने कहा कि उनकी किताब ‘साहस और संकल्प’ में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे गोपनीयता भंग होती हो।
‘अपने जवानों की लाशें देखकर आता है गुस्सा’
वीके सिंह ने अपनी पुस्तक में लिखे पूर्वोत्तर भारत से जुड़े एक वाकये पर पूछे गए प्रश्न कि 1971 की लड़ाई में पूर्वोत्तर में आपको एक ऐसे कमरे में सोना पड़ा, जिसके पास का रूम जवानों की लाशों से भरा पड़ा था।
पर कहा, ...गर, आप दो-तीन दिनों से सोए नहीं हैं और आपको कुछ घंटे सोने के लिए मिल जाएं तो आप यह नहीं देखते कि कहां सो रहे हैं। फिर चाहे श्मशानघाट हो या फिर गंदगी से पटी जगह। आप सो जाएंगे। हां, जब अपनों की जान जाती है तो बहुत गुस्सा आता है। लेकिन इस गुस्से को सही दिशा देना होता है।
लिट्टे से जुड़ी लड़ाई के बारे में पूछे गए सवाल पर जनरल सिंह ने बताया कि पहले शहीद हुए सैनिकों को उनके घर भेजने का रिवाज नहीं था। इसलिए उनका अंतिम संस्कार वहीं करना पड़ता था। संस्कार के दौरान दुश्मनों को नहीं छोड़ने की कसमें खाते थे और उसी रंज में लिट्टे के छह आतंकियों को मार गिराया।
पॉलिटिकल लाइफ और आर्मीमेन की लाइफ पर उन्होंने कहा कि राजनीतिक जीवन में आपका दायरा बढ़ जाता है। इस मौके पर इतिहासकार रवि भट्ट, शिक्षाविद जगदीश गांधी, सेवानिवृत्त मेजर एके सिंह, चंद्रप्रकाश उपस्थित रहे।