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सुअर पर खूनी सियायत, 20 साल में 36 मर्डर!

Mon, 04 Aug 2014 06:09 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 04 Aug 2014 06:09 PM IST
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bloodshed during village head election in aligarh

पिछले दो दशक में अलीगढ़ का एक गांव 36 बाशिंदे गवां चुका है। वजह है जाट-ब्राह्मण फैमिली वॉर। अलीगढ़ के चकथल गांव में इस खूनी रंजिश की शुरुआत 1990 में हुए पंचायत चुनावों के बाद हुई थी।

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प्रधानी के चुनाव में जाट डांगर सिंह और ब्राह्मण रामपाल सिंह के बीच कांटे की टक्कर थी। डांगर सिंह ने 25 वोटों से चुनाव जीत लिया और गांव की एक परंपरा भी तोड़ दी।
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जानवरों को बीमारी से दूर रखने के लिए जिंदा सुअर को गांव की सरहद पर जलाने की परंपरा के खिलाफ जाते हुए डांगर ने सुअर को एक मंदिर के पास जलाने का हुक्म दे दिया।
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और खिलाफत की सजा थी मौत

bloodshed during village head election in aligarh

रामपाल के एक रिश्तेदार प्रमोद शर्मा बताते हैं, 'डांगर सिंह की उस हरकत से गांव को शाप लग गया। डांगर के हुक्म की खिलाफत का नतीजा यह हुआ कि गांव के लोगों को धमकाया गया और जाटों ने हिंसा भी शुरू कर दी।'

रामपाल के एक रिश्तेदार यह भी बताते हैं कि गांव के कुछ लोगों को रात में एक सुअर के रोने की आवाज भी सताती है।

एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक, ब्राह्मणों का विरोध थमा नहीं और शुरू हो गया हत्या का सि‌लसिला, जो हर साल खूनी रंजिश में बदलता गया। गांव के लोग बताते हैं कि अक्सर उनकी सुबह बगल में पड़ी एक लाश के साथ होती थी।

क्या कहते हैं दोनों परिवार

bloodshed during village head election in aligarh

हालांकि, दोनों ही परिवार इस रंजिश की वजह अलग-अलग बताते हैं। ब्राह्मण कहते हैं कि सिंह की उस हरकत की वजह से खूनी रंजिश शुरू हुई, जबकि जाट कहते हैं कि ये सब राजनीति है और इसकी वजह 1990 में हुए पंचायत चुनाव हैं।

सिंह के ‌रिश्तेदार मुकेश कुमार बताते हैं कि ये पॉवर की लड़ाई है। उन्होंने पहली ‌हत्या करके इस रंजिश को जन्म दिया था।

जाट बिरादरी के लोग शर्मा बिरादरी पर यह भी इल्जाम लगाते हैं कि उन्होंने हत्याओं का सिलसिला थामने के लिए ली गई तुलसी सौगंध भी तोड़ी। जाट बताते हैं कि जब ‌हालात बेकाबू हो गए तो पुलिस ने समझौता करवाने की कोशिश शुरू की।

नई पीढ़ी भी झेल रही पुरानी रंजिश

bloodshed during village head election in aligarh

नई पीढ़ी भी इससे अछूती नहीं है। नीरजा शर्मा उन्हीं में से एक हैं जिन्होंने इस लड़ाई अपने पति देवेंद्र शर्मा को खो दिया।

वह कहती हैं, पति के अलावा मेरे सारे पैसे खर्च हो गए। मेरे बेटों ने अच्छी जिंदगी की ‌उम्मीद छोड़ दी है। मैं उनके लिए बहुत चिंतित हूं इसलिए पढ़ाई के लिए उन्हें खुद से दूर नहीं कर सकती हूं। मैं उन्हें खोना नहीं चाहती हूं।

नीरजा का बेटा धीरज शर्मा तब दो साल के थे, जब इस ‌रंजिश की शुरुआत हुई थी। वह कहते हैं कि वह हिंसा के बीच पले-बढ़े हैं और हमेशा खुद को मौत से बचाने की कोशिश करते हैं।

वह कहते हैं कि यहां परिवार बच्चों के पढ़ाई-लिखाई पर नहीं खुद को मौत से बचाने के लिए तैयार की गई ढाल पर ध्यान देती है। जब इस ‌रंजिश में हत्या हुई थी तब दोनों ही परिवारों ने एफआईआर दर्ज कराया था।

कोर्ट के अलावा पिछले पांस सालों में कम से कम पांच बार मामला रफा-दफा करने की भी पहल की गई लेकिन सब बेकार रहा। इस ममाले से जुड़े कुछ केस इलाहबाद हाईकोर्ट भी चल रहे हैं।

फिर ‌सताने लगा है खौफ

bloodshed during village head election in aligarh

अब एक बार फिर इस गांव में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर लोगों में डर घर कर रहा है।

2010 में हुए ग्राम प्रधानी चुनाव में जाट महावीर सिंह की जीत हुई थी। इस बार शर्मा परिवार का कहना है कि वह अगले साल होने वाले चुनाव में निष्पक्षता के लिए कोर्ट में याचिका दायर करेगा। माना जा रहा है कि दोनों ही परिवार इसे लेकर सतर्क है।

प्रमोद का कहना है, दोनों ही परिवार अपनी-अपनी होशियारी से काम कर रहे हैं। मैं हमेशा अपने साथ राइफल लेकर चलता हूं। में खेत भी अकेले नहीं जाता हूं।

यहां तक कि मैं जब गांव से बाहर भी जाता हूं तो मेरे साथ पांच लोग जाते हैं। मैं बाथरूम तक में अपने हथियार लेकर जाता हूं।

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