यूपी के पंचायत चुनाव में एक-दूसरे से ही लोहा लेंगे मोदी-मुलायम
पंचायत चुनाव के जरिये भाजपा और सपा की कोशिश विधानसभा चुनाव का रिहर्सल पूरा कर लेने की है। दोनों दलों की तैयारियों से लग रहा है कि इनकी नजर पंचायत चुनाव पर कम और विधानसभा चुनाव पर ज्यादा है।
शायद इसी नाते भगवा रणनीतिकारों की अब तक की कोशिश रही है कि अघोषित तौर पर ही सही, पंचायत चुनाव में उसका चुनावी समर सपा के साथ ही सजे।
इसीलिए पार्टी के रणनीतिकार पिछड़ों की लामबंदी के मोर्चे पर मुलायम सिंह की पार्टी से दो-दो हाथ करने की तैयारी में जुटे हैं। सपा भी पीछे नहीं है। उसके नेतृत्व की कोशिश भी यही है कि मुकाबला भाजपा से रहे।
राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि दोनों तरफ से यह कोशिश अनायास नहीं है। दरअसल, इसी में दोनों दलों को चुनावी फायदा लग रहा है। सपा नेताओं को यह भलीभांति पता है कि अगर वे भाजपा से लड़ते दिखेंगे तो स्वाभाविक रूप से उन्हें अपने परंपरागत मतदाताओं के साथ मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन भी प्राप्त करने में आसानी रहेगी।
भाजपा के रणनीतिकारों को भी इस तथ्य का अच्छी तरह अनुभव हो चुका है कि मुलायम से लड़ने पर उनका परंपरागत मतदाता उनकी तमाम गलतियों को भूलकर कमल खिलाने के लिए जुट जाता है। साथ ही पिछड़ों में भी सेंधमारी करने में सुविधा रहती है। इसीलिए कोशिश उसी दिशा में शुरू हुई है।
पंचायत चुनाव में भी पिछड़ों पर दांव
सपा की कोशिश भाजपा को निशाने पर रखकर ध्रुवीकरण के सहारे मतदाताओं को रिझाने की है। जबकि भाजपा की कोशिश पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में सेंधमारी की दिख रही है। प्रदेश में पिछड़ों की लगभग 55 प्रतिशत आबादी है।
इनमें लगभग 20 प्रतिशत यादव मतदाताओं को छोड़कर शेष अति पिछड़े हैं। भाजपा की बहुत पहले से कोशिश इन्हीं मतदाताओं को लामबंद करने की रही है।
उधर, सपा इन अति पिछड़ी जातियों में से 17 को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मुहिम चलाकर इन जातियों के लगभग 15 प्रतिशत मतदाताओं को अपने पाले में खींचने में जुटी है।
ध्यान में है लोकसभा चुनाव का परिणाम
लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत में इन अति पिछड़ी जातियों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। पार्टी रणनीतिकारों की कोशिश है कि इस वर्ग के लोगों को विधानसभा चुनाव तक लामबंद रखा जाए। सके लिए पंचायत चुनाव से ज्यादा बेहतर मौका दूसरा नहीं हो सकता।
वजह, इनमें से ज्यादातर आबादी गांवों में रहती है। स्वाभाविक रूप से पंचायत चुनाव में इनकी लामबंदी विधानसभा चुनाव में भाजपा को न सिर्फ लाभ पहुंचाएगी बल्कि चुनावी समर लड़ने वाले सिपाही मुहैया कराने में भी मददगार होगी। इसके लिए पार्टी ने एक पर्चा छपवाने की तैयारी की है।
इसमें पिछड़ों के लिए किस सरकार ने कितने काम किए, इसका उल्लेख रहेगा। सपा भी भाजपा को यह चुनौती देकर कि वह पिछड़ों की हितैषी है तो 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा दे, पिछड़ों को भाजपा के पक्ष में जाने से रोकने की कोशिश कर रही है।
यह संदेश देने की कोशिश
भले ही पंचायत चुनाव में उम्मीदवारों को पार्टियों के सिंबल न मिल रहे हों लेकिन उन्हें पता है कि इस चुनाव के समीकरण विधानसभा चुनाव तक के लिए काम करेंगे। कारण, यह संदेश तो साफ हो ही जाएगा कि सूबे में सपा और भाजपा ही मुकाबले में है। यह संदेश विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को इन दोनों पार्टियों के बीच बांटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यदि ऐसा हुआ तो इसका लाभ दोनों ही पार्टियों को मिलेगा।