यूपी भाजपा का ये रोग जान मोदी-शाह को भी होगी टेंशन
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दावे बड़े-बड़े और नतीजा ढाक के तीन पात। यही हाल इस बार हुआ। भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने उपचुनाव को लेकर दावे तो बड़े-बड़े कर डाले, पर वैसा नतीजा नहीं आया।
लोकसभा की मैनपुरी सीट से भी सपा का सूपड़ा साफ कर देने का दावा तो हकीकत में तब्दील हुआ नहीं, उल्टे भाजपा का अपने कब्जे वाली आठ विधानसभा सीटों से भी सफाया हो गया।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने इन नतीजों से सबक लेते हुए भविष्य में कार्यप्रणाली सुधारने की बात कही है। कार्यप्रणाली में कितना सुधार होगा, यह तो भविष्य बताएगा लेकिन अतीत पर नजर डालें तो भाजपा नतीजों से सबक लेती या सुधार करती दिखी नहीं है।
उल्टे उत्तर प्रदेश में पार्टी को रास्ते पर लाने की जितनी कोशिशें की गईं, उनसे पार्टी का रोग दूर होने के बजाय और बढ़ता गया है।
केंद्रीय नेतृत्व को नहीं मिली पूरी जानकारी
भाजपा के एक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय पदाधिकारी कहते हैं कि प्रदेश में भाजपा का पिछले एक दशक से जो हाल है, उसमें यही होना था जो उपचुनाव में हुआ है। हर हार के बाद नेतृत्व तो बदला लेकिन उसका रंग-ढंग नहीं बदला। भाजपा ने न तो पराजय से सबक लिया और न जीत के संदेशों को स्वीकार किया।
वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की दुर्दशा का शुरू हुआ सिलसिला अब भी कायम है। तब पार्टी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र ने कहा था कि न सुधरे तो हाल बुरा ही होता चला जाएगा, पर कोई असर नहीं हुआ। भाजपा लगातार संकटों का सामना कर रही है, पर रोग के कारण तलाशकर उन्हें दूर करने की कोशिश नहीं होती।
ये पदाधिकारी तर्क देते हैं कि पराजय पर आत्ममंथन करने की बात कहने वाले वाजपेयी ने लोकसभा चुनाव में जीत से सबक लिया होता तो शायद आज यह नौबत नहीं आती। बात सही भी है। मोदी को लेकर लोगों में आकांक्षाओं और उम्मीदों के चलते मिली सफलता को प्रदेश नेतृत्व ने अपने रणनीतिक कौशल की जीत मान लिया। यहीं से गड़बड़ हुई।
प्रदेश नेतृत्व ने जमीनी काम की फिक्र छोड़कर केंद्रीय नेतृत्व को यह जताने में पूरी ताकत लगा दी कि वह संगठन के विस्तार और उसे मजबूती देने के लिए बहुत सारे काम कर रहा है।
कागजों तक ही सीमित रहे प्लान
एक के बाद एक कार्यक्रम घोषित तो किए गए, लेकिन उन पर अमल की चिंता नहीं की गई। युवा मोर्चा के विधानभवन पर प्रदर्शन को छोड़ दें तो पार्टी के विधान भवन के घेराव के अन्य कार्यक्रमों की चर्चा तक नहीं हुई।
युवा मोर्चा के आंदोलन की चर्चा भी उसमें जुटी संख्या को लेकर नहीं, बल्कि इसमें जुटे लोगों द्वारा अराजकता फैलाने के लिए ज्यादा हुई।
बिजली, बकाया गन्ना मूल्य जैसे मुद्दों पर भाजपा के आंदोलन प्रतीकात्मक बनकर रह गए। पार्टी ने नव मतदाता संपर्क अभियान चलाने का ऐलान किया, लेकिन यह एक-दो जगह कार्यक्रम करने तक ही सीमित रहा।
पिछड़ी व दलित जातियों को जोड़ने के लिए अभियान चलाने का फैसला भी बयानों तक सीमित रहा। विशेष सदस्यता अभियान भी कागजों पर ही चल रहा है।
लगातार दूर होते गए कार्यकर्ता
नए लोगों को जोड़ने के प्रयास तो हुए नहीं, उल्टे पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ताओं को प्रदेश अध्यक्ष से मिलने के लिए पहले समय लेने की परंपरा शुरू कर दी गई। इस नई परिपाटी ने कार्यकर्ताओं को और दूर कर दिया। भाजपा की पहचान सामूहिक निर्णय करने वाले दल के रूप में थी, पर पर्दे के पीछे फैसले लेने शुरू हो गए। विज्ञप्तियों द्वारा पदाधिकारी बनाए जाने लगे।
बरेली के रहने वाले विक्रम सिंह को सपा से भाजपा में आए दो महीने भी नहीं बीते हैं और उन्हें प्रदेश प्रवक्ता पद की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। इसे लेकर पार्टी के भीतर काफी आक्रोश है।
इससे पहले प्रकोष्ठों में नियुक्तियों को लेकर भी विवाद हुआ था। यही नहीं, प्रदेश नेतृत्व ने पार्टी संविधान की भी अनदेखी की। पार्टी संविधान के मुताबिक न तो पदाधिकारियों की बैठकें हुईं और न प्रदेश कार्यसमिति की बैठक बुलाने की चिंता की गई।
नतीजतन पार्टी के फैसलों में सभी की भागीदारी की परंपरा का कोई मतलब ही नहीं रहा। कार्यसमिति में मनमाने तरीके से सदस्य बनाए गए।
बूथ प्रबंधन न डैमेज कंट्रोल
पार्टी नेतृत्व ने बूथ प्रबंधन और डैमेज कंट्रोल के दावे तो खूब किए, पर इस बात की चिंता नहीं रही कि ये काम जमीन पर भी दिखने चाहिए। प्रदेश नेतृत्व उपचुनाव वाली सीटों पर प्रभारियों की फौज तैनात करने के बाद निश्चिंग हो गया। ज्यादातर सीटों पर उन पदाधिकारियों को ही प्रभारी बना दिया गया जो विधानसभा सीटों के उपचुनाव के लिए वहीं से टिकट मांग रहे थे। इससे भी खींचतान बढ़ी और अंतत: खामियाजा भुगतना पड़ा।
वैसे यह पहला मौका नहीं है। वर्ष 2002 से अब तक सिर्फ लोकसभा का पिछला चुनाव ही अपवाद है जब पार्टी की जीत हुई, वरना बाकी सभी चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत भी घटा और सीटें भी।
पार्टी के नेतृत्व ने हर बार गलतियों से सबक लेने की कसम खाई। दलबदलुओं को गले न लगाने का ऐलान किया। कार्यकर्ताओं की सहमति से प्रत्याशी चुनने का वादा किया। गणेश परिक्रमा से तौबा करने के ऐलान हुए, लेकिन कुछ दिनों बाद पार्टी का प्रदेश नेतृत्व फिर उसी ढर्रे पर चल पड़ा।