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प्रेमचंद्र का लखनऊ या लखनऊ के प्रेमचंद्र

Tue, 30 Jul 2013 01:23 PM IST
लखनऊ/आरिफ
लखनऊ/आरिफ Updated Tue, 30 Jul 2013 01:23 PM IST
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birth anniversary of munshi premchandra

यूं तो जाने कितने ही रचनाकार हुए लेकिन 'कलम का सिपाही' लिखने वाला स्मृतियों में सबसे ऊपर रहा है।

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समाज की विसंगतियों पर चोट करती, आदर्श जिंदगी जीने का मशवरा देतीं, हिंदी कहानी विधा के मुंशी प्रेमचंद्र की लेखनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने समय में थी। प्रेमचंद्र जयंती (31 जुलाई) के मौके पर पेश है उनकी यादों का गुलदस्ता...

मुंशी प्रेमचंद्र की शख्सियत को किसी शहर, सूबे या फिर मुल्क की सरहद में बांधना उनके साथ नाइंसाफी होगी।

इसके बावजूद हम लखनऊवाले फख्र से कह सकते है कि मुंशी जी ने अपनी जिंदगी का एक लंबा और यादगार अरसा लखनऊ में भी बिताया है।

चाहे लखनऊ की मारवाड़ी गली हो लाटूश रोड पर डॉक्टर पाठक या डॉ. कृपा शंकर निगम का मकान कई ऐसे ठिकाने हैं जहां उन्होंने प्रवास किया।

इस शहर से उनकी मोहब्बत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर इलाज कराने भी वे यहीं आए थे।

लखनऊ का सफरनामा

प्रेमचंद्र जी की जिंदगी और उनके साहित्य पर पिछले 28-30 वर्षों से शोध कर रहे डॉक्टर प्रदीप जैन बताते हैं कि यूं तो प्रेमचंद्र जी कई शहरों में रहे पर लखनऊ से उन्हें खास लगाव रहा।
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वे दलील देते हैं कि जिंदगी के आखिरी दौर में अखबार निकालने की योजना हो या फिर इलाज कराने की, उन्हें लखनऊ पर ही यकीन था।

उनकी जिंदगी के बारे में डॉ. जैन बताते हैं कि प्रेमचंद्र ने1921 में सरकारी नौकरी को अलविदा किया। उसके बाद वे लखनऊ आ गए। जहां उन्होंने दो बार नौकरी की।

पहली बार ‘गंगा पुस्तक माला’ में 100 रुपये महीने की तनख्वाह परबतौर साहित्यिक सलाहकार का पद संभाला। उस दौर में गंगा पुस्तक माला के दुलारे लाल भार्गव उन्हें बहुत मानते थे।
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उन्हीं के आग्रह पर ‘रंगभूमि’ का प्रकाशन इसी प्रेस में करवाया। रायल्टी के तौर पर प्रेमचंद्र को 1,800 रुपए मिले। उनकी शोहरत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहला प्रिंट आर्डर ही 5000 कॉपी का था।

मनभेद हुआ तो दिया इस्तीफा
इसी दौरान सितंबर 1924 में वे लाटूश रोड़ पर किराए का मकान ले कर रहते थे। नवंबर में वहीं नाटक ‘करबला’ लिखा जिसने उस वक्त खूब ख्याति कमाई। अगस्त 25 में उनका दुलारे राम से कुछ मनभेद हुआ। नतीजन उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

एक बार फिर लखनऊ की मोहब्बत उन्हें यहां खींच लाई। फरवरी 1927 में वे यहां आए। मुंशी नवल किशोर प्रेस उस दौर में शोहरत की बुलंदियों पर था। उनकी मैगजीन ‘माधुरी’ के संपादक के तौर पर नौकरी कर ली।

प्रिंट लाइन का नाम कृष्ण्ा बिहारी था
डॉ. जैन बताते हैं प्रिंट लाइन में उनका नाम पंडित कृष्ण बिहारी के साथ संयुक्त रूप से जाता था। इस दौरान वे अमीनाबाद के झंडे वाला पार्क के पास व गनेशगंज में रहा करते थे।

दर्ज हो गया केस
जनवरी 28 में एक बेहद दिलचस्प वाकया हुआ। दरअसल हुआ कुछ यूं कि प्रेमचंद्र जी ने एक ‘मोटे राम शास्त्री’ नाम की एक कहानी लिख कर माधुरी में छाप दी। एक साहब, सालिग राम शास्त्री ने अदालत में केस दर्ज कर दिया।

उनका कहना था कि कहानी का मुख्य पात्र उनसे प्रेरित है। प्रेमचंद्र जी की ओर से लखनऊ के बैरिस्टर लक्ष्मीशंकर मिश्र व देहरादून के बाबू राम प्रसाद व ठाकुर सीपी सिंह ने केस लड़ा। अंत में सलिग राम शास्त्री का केस खारिज हो गया।

पत्नी हुईं गिरफ्तार

मुंशी जी ने एक बार फिर से यही कहानी माधुरी में छापी। मार्च 1930, में उन्होंने वाराणसी से एक पत्रिका ‘अंश’ की शुरुआत की, उसके संपादन के काम के लिए वे वहां नहीं गए बल्कि यहीं से पत्रिका का कामकाज अंजाम देते रहे। उसी वर्ष उनकी पत्नी शिवरानी देवी अंग्रेजों की खिलाफत करते हुए यहीं गिरफ्तार हुईं।

फरवरी 1931 में ‘माधुरी’ के संपादन को उन्होंने छोड़ दिया। इसके बावजूद वे लखनऊ में ही बने रहे।
उस वक्त वाराणसी से एक साप्ताहिक अखबार ‘जागरण’ निकलता था। वे उसे लखनऊ से रोजाना निकालने की योजना बनाने में लग गए। हालांकि गिरते स्वास्थ्य के कारण उनकी योजना साकार नहीं हो पाई।

10 अप्रैल 1936 को लखनऊ के रफे आम क्लब में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता भी उन्होंने की। दो दिन पहले ही इसके लिए वे यहां आ गए। सज्जाद जहीर के मकान ‘वजीर मंजिल’ पर वे जैनेंद्र कुमार के साथ रुके।

अधिवेशन में उनके साथ ही मंच पर मौलाना हजरत मोहानी, चौधरी मोहम्मद अली रुदौलवी व डॉ अब्दुल अलीम भी मौजूद थे। करीब 40-45 मिनट का उनका संबोधन उस वक्त खूब चर्चा में रहा।
दरअसल वे मंच से लिखा हुआ संबोधन ही पढ़ते थे।

25 जून 1935 को उन्हें खून की पहली उल्टी हुई, उसके ठीक एक महीने बाद 25 जुलाई को दूसरी। जिससे बाद से वे काफी बीमार रहने लगे। इलाज की खातिर लखनऊ आ गए।

शुरुआती दो महीने लाटूश रोड पर कृपा शंकर निगम के मकान और फिर अमीनाबाद के सूर्य होटल में वे ठहरे। इस दौर में उनके मित्र और कहानीकार गंगा प्रसाद मिश्रा और कलाकार अब्दुल हफीज ने उनकी बहुत खिदमत की।

डॉक्टर हर गोविंद सहाय और बलरामपुर अस्पताल में उनका इलाज बाद में वे बनारस लौट गए। 8 अक्टूबर सन 1936 को 56 वर्ष की उम्र में निष्ठुर संसार को हमेशा के लिए छोड़ कर स्वर्ग सिधार गए।

‘रंगभूमि’ की कर्मभूमि रहा लखनऊ
वरिष्ठ साहित्यकार व लेखक रामकृष्ण जी लिखते हैं ‘ आज भी वर्ष 1927 की एक डायरी के 29 नवंबर के पृष्ठ पर अंकित मिलता है कि, बच्चे के पैदा ( खुद रामकृष्ण जी अपनी पैदाइश की बात कर रहे हैं) होने पर बाबू प्रेमचंद्र ने दस रुपये उस पर न्यौछावर किये।

प्रेमचंद्र जी उन दिनों लखनऊ में ही रहते थे। हमारे अपने घर के बाहरी हिस्से में एक किराएदार के रूप में। तब वे मुंशी नवल किशोर प्रेस द्वारा प्रकाशित होने वाली माधुरी नामक उस मासिक पत्रिका का संपादन कर रहे थे।


जिसने कालांतर में साहित्यिक पत्रिका के तौर पर खूब ख्याति अर्जित की। अपने उपन्यास रंगभूमि का लेखन उन्होंने हमारे घर में रहते हुए ही किया था।’

जाने कितनों को बताई कलम की ताकत

उनके स्पर्श से मिली प्रेरणा से ही मैं अपने हाथों में कलम पकड़ने की हिम्मत कर पाया। सरसों के तेल के चिराग से निकलती हुई लौ के सहारे रंगभूमि को एक ही बैठक में पढ़ गया।

उसके पात्र आज भी मन मस्तिष्क में उसी तरह से जीवित व जीवांत हैं जैसे आज से सात दशक पूर्व रहे होंगे।

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