UP BJP: इन सांसदों पर नहीं दिख रहा 'मोदी इफेक्ट'
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चिराग तले अंधेरा वाली कहावत भाजपा में एक बार फिर चरितार्थ हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी तक दौड़े। भाजपा से इतर कई सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भी सरदार वल्लभ भाई पटेल की राह पर चलकर देश की एकता का संकल्प लेने के लिए दौड़ लगाई। कस्बों तक में ‘रन फॉर यूनिटी’ चर्चा में रही। खुद प्रधानमंत्री मोदी को दौड़ने में शर्म नहीं आई।
उनके मंत्रिपरिषद के उम्रदराज सदस्य कलराज मिश्र तक ने दौड़ने में कोताही नहीं की, पर कुछ चेहरे ऐसे थे जिन पर मोदी के आह्वान का भी कोई असर नहीं पड़ा। यह पहली बार नहीं है कि मेनका व वरुण गांधी पार्टी के किसी कार्यक्रम में न दिखे हों।
यूपी से सांसद होने के बावजूद प्रदेश में होने वाले पार्टी कार्यक्रमों में इन दोनों की भागीदारी शायद ही कभी दिखती हो, लेकिन इस बार तो कुछ अन्य भी इसी राह पर चलते दिखे। इनमें कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जो जब कुछ हासिल करने की बात होती है तो यूपी वाले हो जाते हैं और हासिल होने के बाद यूपी को भूल जाते हैं।
डॉ. मुरली मनोहर जोशी सांसद चुने जाने के बाद वैसे तो अपने संसदीय क्षेत्र कानपुर कई बार आ चुके हैं, पर जब एकता के लिए दौड़ने की बारी आई तो वे भी कानपुर को भूल गए।
दो सांसद, लेकिन कोई नहीं दिखा
सिर्फ प्रमुख चेहरे ही नहीं बल्कि कुछ अन्य नेता भी गायब रहे। एकता के लिए दौड़ में खींचतान भी खूब दिखी। खेमेबाजी के चलते कई जगह दौड़ के नाम पर सिर्फ रस्म अदायगी ही हो पाई।
बिजनौर से दो सांसद हैं लेकिन दौड़ में कोई नहीं दिखा। बताया जाता है कि बिजनौर में जिलों के पदाधिकारियों की संख्या 250 से भी अधिक है, पर दौड़ में सिर्फ 21 लोग शामिल थे।
हेमा मालिनी भी रहीं गायब: मथुरा में बमुश्किल दो-तीन दर्जन लोगों ने ही दौड़ की रस्म अदायगी की। यहां से हेमा मालिनी सांसद हैं। लोगों को उम्मीद थी कि मोदी की बात है तो शायद हेमा भी अपने संसदीय क्षेत्र में होने वाली दौड़ में आ जाएं मगर वे नहीं आईं।
हेमा ही नहीं, मथुरा के रहने वाले और भाजपा में राष्ट्रीय मंत्री पद की जिम्मेदारी निभा रहे श्रीकांत शर्मा को एकता की दौड़ में अपने घर की याद नहीं रही। साध्वी निरंजन ज्योति ने विधायक बनने के लिए हमीरपुर में दावेदारी की थी तो सांसद बनने के लिए वह फतेहपुर आ गईं, पर दौड़ में वे भी फतेहपुर में नहीं दिखीं।
ये भी नहीं हुए 'रन फार यूनिटी' में शामिल
पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह गाजियाबाद से सांसद हैं। लोगों को उम्मीद थी कि देश की एकता के लिए दौड़ में दूसरे भले ही सुस्ती बरतें लेकिन जनरल तो सक्रिय दिखेंगे ही लेकिन वे भी नहीं आए। सेना की ही तरह पुलिस की पहचान भी अनुशासन है।
मुंबई के पूर्व पुलिस प्रमुख और बागपत से सांसद सत्यपाल सिंह भी इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे। भाजपाई उनके बिना ही दौड़े। यही नहीं, कैसरगंज से बृजभूषण शरण सिंह, गोंडा से कीर्तिवर्धन सिंह, सीतापुर से राजेश वर्मा हों या मुरादाबाद से सर्वेश कुमार सिंह, इन सांसदों की भागीदारी भी दौड़ में नहीं दिखी।
हालांकि, भाजपा के प्रवक्ता डॉ. मनोज मिश्र का तर्क है कि सभी लोग संगठन के काम में ही कहीं न कहीं व्यस्त थे। कुछ सांसदों व नेताओं ने पूर्व निधारित कार्यक्रमों और निजी व्यस्तताओं के चलते दौड़ में शामिल होने से पहले ही पार्टी नेतृत्व से छूट ले रखी थी।