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रुक सकती थी आजम के खिलाफ बगावत

Mon, 11 Nov 2013 02:00 PM IST
महेंद्र तिवारी/लखनऊ
महेंद्र तिवारी/लखनऊ Updated Mon, 11 Nov 2013 02:00 PM IST
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azam staff controversy could be stopped

नगर विकास मंत्री आजम खां के बागी स्टाफ के मामले में जिम्मेदार अधिकारियों ने अगर समय से जरूरी कदम उठाए होते तो शायद यह नौबत नहीं आती।

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माना जा रहा है कि यह मामला जितना लंबा खिंच रहा है, सरकार की छवि पर इसका उतना ही असर बढ़ता जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि 30 अक्तूबर को मामला मीडिया में आने के पहले 28 अक्तूबर को मंत्री के निजी सचिव जीवन सिंह नेगी व विजय बहादुर सिंह तथा अपर निजी सचिव अवधेश कुमार तिवारी, मुक्ति नाथ झा व सर्वेश कुमार मिश्र ने एक पत्र नगर विकास मंत्री को दिया था।
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इसमें नाम अपर निजी सचिव संतोष कुमार प्रजापति व मुहम्मद नईम सिद्दीकी का भी था लेकिन उनके हस्ताक्षर नहीं थे।

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इसी पत्र में मंत्री पर अशोभनीय व्यवहार और असंसदीय भाषा का प्रयोग करने के आरोप लगाए गए थे। साथ ही उनसे अपने को सचिवालय प्रशासन में वापस करने की प्रार्थना की गई थी।

स्टाफ ने यह भी कहा था कि वे लोग बेहद मानसिक तनाव का अनुभव कर रहे हैं।

स्टाफ ने इस पत्र को मंत्री को देने के अलावा इसकी कॉपी मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री, सचिव सचिवालय प्रशासन, विशेष सचिव मुख्यमंत्री, अध्यक्ष सचिवालय संघ व अध्यक्ष निजी सचिव/अपर निजी सचिव संघ को भी दिया था।

बाद में 30 अक्तूबर को सेंट्रल पूल में तैनाती देने वाले पत्र में सभी सातों निजी सचिवों व अपर निजी सचिवों के हस्ताक्षर थे।

चौंकाने वाली बात ये है कि  एक वरिष्ठ मंत्री के खिलाफ उनके ही स्टाफ द्वारा इतना बड़ा कदम उठाने के बावजूद शासन के वरिष्ठ अधिकारी चुप्पी साधे रहे।

वे तब हरकत में आए जब 30 अक्तूबर को स्टाफ ने खुद-ब-खुद मंत्री के कार्यालय का काम छोड़कर सामूहिक रूप से सेंट्रल पूल में आकर तैनाती दे दी और मामला मीडिया तक पहुंच गया।

ऐसा कर सकते थे अफसर
माना जा रहा है कि यदि अफसरों ने 28 अक्तूबर को ही मंत्री के स्टाफ के पत्र पर फौरी कदम उठाया होता तो यह समस्या सामने नहीं आती।

एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बताते हैं कि स्टाफ को यह समझाया जा सकता था कि उन्हें एक-एक, दो-दो की संख्या में एक सप्ताह या 15 दिन में वहां से ट्रांसफर कर दिया जाएगा।


यह बात उन्हें समझाने में ज्यादा मुश्किल नहीं आती। उन्हें एक साथ हटाने का नफा-नुकसान बताया जा सकता था। सरकारी मुलाजिम होने के नाते वे आसानी से समझ जाते।

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बाकी बात मंत्री से भी की जा सकती थी। मंत्री को यदि यह बताया जाता कि इन स्टाफ का हटना ही ठीक है तो वह भी राजी हो जाते।

यह भी पता चल जाता कि स्टाफ की बात में कितना दम है और क्या मंत्री भी वास्तव में उनके साथ काम करने के इच्छुक नहीं हैं।

यदि इतना काम उस दिन कर लिया गया होता तो यह मामला वहीं ठंडा पड़ सकता था। बाकी बात तो इसके बाद बढ़ी।

कर्मचारियों में पनप रहा आक्रोश
कर्मचारियों में आक्रोश है कि मामला नगर विकास मंत्री का होने की वजह से अफसरों ने पहले तो चुप्पी साध ली और जब वे वहां से चले आए तो फिर से वापस होने का दबाव बढ़ाया।

जब वे नहीं माने तो आरोप पत्र थमाकर एकतरफा कार्रवाई शुरू कर दी।बागी स्टाफ को आरोप पत्र देने के बाद जहां कर्मचारी संगठनों ने चुप्पी साध ली है।

वहीं अन्य कर्मचारियों में आक्रोश उभर रहा है। आम कर्मचारियों की नजर बागी स्टाफ द्वारा आरोपपत्र पर दिए जाने वाले जवाब और उस पर होने वाली कार्रवाई पर है।

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