हर बार महाबली आजम के आगे झुकी 'सरकार'
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प्रदेश के संसदीय कार्यमंत्री आजम खां विधानसभा में अक्सर विपक्षी हमले के लिए सपा सरकार की ढाल बन जाते हैं। वे सरकार विरोधियों को करारा जवाब देते हैं। लेकिन सदन के बाहर ऐसा हमेशा नहीं होता। आजम अकेले ऐसे मंत्री हैं जिनपर सरकार का जोर कमजोर दिखाई देने लगता है।
बात ज्यादा पुरानी नहीं है राज्यपाल के प्रति उनके तेवर तीखे हुए तो पूरे प्रकरण पर पार्टी सुप्रीमो और प्रदेश सरकार के मुखिया ने चुप्पी ओढ़ ली। उनके कई बयान को लेकर सरकार को सफाई देनी पड़ी। कभी मुख्यमंत्री को तो कभी किसी और को। पर, किसी ने आजम से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं की।
सूबे में कहने को तो अखिलेश यादव की सरकार है। पर, सरकार के तीन सालों पर नजर डालें तो मो. आजम खां ने अखिलेश की नहीं ‘अपनी’ सरकार चलाई है। आजम ने जो चाहा वह किया। कभी रूठे तो कभी शब्दों के बाणों से पूरी सरकार को बेधकर अपने मन की कराई। गुस्साए तो पूरी सरकार के कामकाज पर अंगुली उठा दी। रूठे तो घर बैठ गए। जरूरत पड़ी तो अपने अंदाज में ‘अपनी राह’ चलने का संदेश दे डाला।
नेताजी अर्थात मुलायम सिंह यादव को भी चेताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि उनकी न मानी गई तो अलग राह चुनने में भी उन्हें देर नहीं लगेगी। आजम के निशाने से न तो राज्यपाल बचे और न मीडिया। अधिकारी व कर्मचारी तो बचे ही नहीं। मंत्रिपरिषद में शामिल अपने साथियों को भी उन्होंने नहीं बख्शा। सरकार की किरकिरी हो तो हो लेकिन आजम तो ‘अपनी’ चलाने पर अडिग दिखे।
किसी और के रहनुमा बनने पर जताया ऐतराज
मार्च 2012 में सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद मुख्यमंत्री आवास पर रोजा इफ्तार का आयोजन हुआ। आजम लखनऊ में मौजूद होते हुए भी उस कार्यक्रम में नहीं गए। मीडिया ने कारण पूछा तो बोले, इबादत अकेले में होती है। पर, न जाने का कारण था इस कार्यक्रम की मेजबानी स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन को सौंपने से नाराजगी।
इसके कुछ दिन बाद जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी सपा मुखिया से मिले तो आजम ने उस पर यह टिप्पणी करके कि दाढ़ी रखने से कोई सच्चा मुसलमान नहीं होता, साफ कर दिया कि उन्हें यह कुबूल नहीं कि उनके रहते नेताजी किसी और को मुसलमानों का रहनुमा मानें।
हर मौके पर अलग राह : वर्ष 2013 में तो शायद ही कोई महीना बीता हो जब आजम अपनी अलग राह चलते न दिखे हों। जिस कुंभ मेले की अच्छी व्यवस्थाओं के प्रमाण के रूप में वे अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा व्याख्यान के आमंत्रण का उदाहरण देते थे, अमेरिका में जब उन्हें जांच के लिए रोका गया तो ऐसा गुस्सा आया कि वह अपनी ही पुरानी बातें भूलकर हमलावर हो उठे।
ऐसा रूठे कि पूरा कार्यक्रम ही उनकी मान-मनौव्वल की भेंट चढ़ गया। उन्होंने इसकी भी चिंता नहीं की कि उनके इस रवैये से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की काफी किरकिरी होगी।
सरकार ने उनसे मेरठ का प्रभार लेकर दूसरे मंत्री को सौंप दिया तो आजम ने नाराज होने में एक क्षण भी नहीं लगाया। उन्होंने मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी भेजकर अपने त्यागपत्र की पेशकश कर दी। सरकार ने उन्हें मनाकर जैसे-तैसे मुसीबत से पीछा छुड़ाया।
पूरी सरकार को हिला कर रख दिया
अगस्त में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 84 कोसी परिक्रमा के सिलसिले में विहिप के संरक्षक अशोक सिंहल से मुलाकात कर ली तो आजम ऐसा भड़के कि उन्होंने यह संकोच भी नहीं किया कि निशाने पर उनके नेताजी हैं।
कहा, ‘जो लोग बाबरी मस्जिद की शहादत के दोषी हैं, उनसे मुलाकात करने का क्या औचित्य।’ नवंबर में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव फिर उनके निशाने पर आने से न बचे। आजम के ड्रीम प्रोजेक्ट गाजियाबाद में हज हाउस के लिए धन देने से पहले वित्त विभाग ने कुछ जानकारियां मांग लीं तो आजम ऐसा रूठे कि सरकार ही हिल गई।
उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी को पत्र लिख दिया कि हज कमेटी अब हज हाउस बनाने की इच्छुक नहीं है। अच्छा होगा कि सरकार हज हाउस की इमारत को जमीन सहित किसी अन्य काम में ले ले। जाहिर है कि आजम की मान मनौव्वल होनी ही थी।
साथी व स्टाफ भी रहे निशाने पर : आजम के हमले से उन्हीं के मंत्रिपरिषद के दूसरे वरिष्ठ अहमद हसन भी नहीं बचे। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव पर आरोप लगा दिया कि वे मजहब के आधार पर काम करते हैं। यह प्रमुख सचिव वही थे जिन्हें आजम ने इसी तरह के आरोप लगाकर अपने यहां नगर विकास विभाग से हटने पर मजबूर कर दिया। अपने स्टाफ से भी उनकी ठनी।
स्टाफ में तैनात सात कर्मचारियों ने आजम के व्यवहार पर अंगुली उठाते हुए उनके साथ काम करने से मना कर दिया। पर, क्या मजाल जो सरकार उनसे कुछ पूछ ले। हाल यह है कि आजम के अंदाज के चलते नगर विकास विभाग में कोई प्रमुख सचिव अब तक टिक नहीं पाया।
अपनी ही सरकार पर लगाया लूटने का आरोप
वजह चाहे नरेश अग्रवाल को पार्टी में तवज्जो मिलना हो या कुछ और। आजम ने मुलायम सिंह यादव सहित पूरी सपा को अपने अंदाज में चुनौती पेश करते रहते हैं। वे कैबिनेट की लगातार आठ बैठकों में नहीं गए। यहां तक संसदीय कार्यमंत्री होने के बावजूद उन्होंने कार्यमंत्रणा समिति की बैठक को भी त्याग दिया।
विधानपरिषद चुनाव में सपा ने बुखारी के दामाद उमर को उम्मीदवार बना दिया तो बेबाक टिप्पणी की, ‘जो व्यक्ति 80 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सका उसको परिषद का प्रत्याशी बनाने का क्या औचित्य। प्रत्याशी तय करने में हमारी सलाह नहीं ली गई।’
आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन प्रकरण में आजम सरकार से अलग खड़े नजर आए। सरकार कहती रही कि नागपाल को एक धर्मस्थल की दीवार गिरने के कारण निलंबित किया गया है। पर, पत्रकारों ने जब आजम से सच्चाई पूछी तो उन्होंने यह कहते हुए ‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट’ अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया।
सरकार को फंसाया: सरकार मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में शिया व सुन्नी किसी को नाराज नहीं करना चाहती थी। पर, आजम तो आजम। उन्होंने अपना प्रभाव दिखाने के लिए शिया वक्फ बोर्ड के झगड़े में भी सरकार को ऐसा फंसाया कि मुख्यमंत्री व सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से कुछ करते ही नहीं बना।
आजम ने शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद को भगवा मौलाना, केसरिया धर्मगुरु व भाजपा का एजेंट बताते हुए जेल भिजवाने की धमकी तक दे डाली। जव्वाद ने भी जवाबी हमला किया। सरकार ऐसी मुसीबत में फंसी कि उससे कुछ करते ही नहीं बना।