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विहिप के केंद्रीय मंत्री बोले - जहां रामलला विराजमान वही जन्मभूमि, तो मध्यस्थता क्यों

Thu, 14 Mar 2019 07:52 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला अयोध्या
न्यूज डेस्क, अमर उजाला अयोध्या Published by: Amulya Rastogi Updated Thu, 14 Mar 2019 07:52 PM IST
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ayodhaya is lord ram birth place there is no need for mediation saya vhp leader
विहिप के केंद्रीय मंत्री राजेंद्र सिंह पंकज - फोटो : amar ujala
विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मंत्री राजेंद्र सिंह पंकज ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बुधवार से शुरू कराई गई मध्यस्थता बैठक पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जब यह सिद्ध हो चुका है कि जहां रामलला विराजमान हैं वहीं उनकी जन्मभूमि है तो फिर मध्यस्थता किस लिए? सर्वोच्च न्यायालय आगे आकर इस बात की घोषणा करे कि जो विभाजन हुआ वह गलत था और जहां रामलला विराजमान हैं वही उनकी जन्मभूमि है। मध्यस्थता तो लेनदेन के लिए होती है। 
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हिंदू समाज 500 वर्षों से अपने प्रभु की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर देखने के लिए तरस रहा है। उन्होंने दोहराया कि अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा में किसी भी नई मस्जिद का निर्माण नहीं होगा।
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उन्होंने कहा अब सर्वोच्च न्यायालय को एक ही बात का निर्णय घोषित करना था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने जो परिसर का विभाजन किया है, वह मुकदमे की मूल प्रार्थनापत्र के विरुद्ध है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता की बात कह कर तीन लोगों की टीम घोषित की है कि जो संबंधित पक्षों के साथ बैठकर मध्यस्थता कर किसी निर्णय पर पहुंच सके। 
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कहा कि 70 वर्षों से उलझी इस न्यायिक प्रक्रिया से हिंदू समाज को मुक्ति मिलनी ही चाहिए। विदेशी आक्रांता बाबर के नाम पर मस्जिद या किसी भी प्रकार के भवन का निर्माण इस देश की सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन मूल्यों पर हमले की भांति होगा। जिसे किसी कीमत पर वर्तमान पीढ़ी स्वीकार नहीं करेगी।

पूर्व राष्ट्रपति ने पूछा था, 1528 से पूर्व यहां हिंदुओं का कोई धार्मिक स्थान था ?

विहिप के केंद्रीय मंत्री ने स्मरण कराते हुए कहा कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट से यह प्रश्न पूछा था कि क्या 1528 से पूर्व इस स्थान पर हिंदुओं का कोई धार्मिक स्थान था? सुप्रीम कोर्ट ने उनका प्रश्न ज्यों का त्यों वापस कर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को निर्देशित किया की रामजन्मभूमि से संबंधित सभी मुकदमों को एक साथ करके विचार किया जाए और विचार में इस प्रश्न का भी उत्तर ढूंढा जाए कि 1528 से पूर्व इस स्थान पर हिंदुओं का कोई धार्मिक स्थान था।

सभी पक्षों की सहमति बनने के बाद उच्च न्यायालय ने सुनवाई शुरू की और सितंबर 2010 में निर्णय दिया कि जहां रामलला विराजमान हैं वहीं उनकी जन्मभूमि है, परंतु इस निर्णय के साथ ही उन्होंने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड एवं निर्मोही अखाड़ा के वाद को खारिज करने के बाद भी विवादित परिसर को तीन हिस्सों में विभाजित करके एक हिस्सा निर्मोही अखाड़ा और एक हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और मध्य का भाग रामलला को देने का निर्णय सुनाया।
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