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अयोध्या में ढांचा गिरने से पहले इतिहास बन गया अटल का भाषण, ऐसे बदला घटनाक्रम

Mon, 11 Nov 2019 03:56 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Mon, 11 Nov 2019 03:56 PM IST
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Atal Bihari speech before Babri demolition in Ayodhya.
5 दिसंबर 1992 को लखनऊ के झंडे वाला पार्क की सभा। - फोटो : amar ujala

अटल बिहारी वाजपेयी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार का उदारवादी चेहरा माना जाता था। पर, ढांचा गिरने से एक दिन पहले उन्होंने जो भाषण दिया उसने बिना कहे बहुत कुछ कह दिया। अमीनाबाद के झंडे वाले पार्क में 5 दिसंबर 1992 की वह शाम अयोध्या आंदोलन का इतिहास बन गई। शाम का वक्त कोई 7.30 बजे का होगा।

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अटल जी उसी मंच पर थे जिस पर वह किशोरावस्था में भी हिंदुत्व की अलख जगाने के लिए बोला करते थे और जिस पार्क में वह अपने मित्रों के साथ अक्सर घूमने भी आ जाया करते थे। इतंजार हो रहा था लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरलीमनोहर जोशी का जो रथयात्रा से जनजागरण करते हुए अयोध्या जा रहे थे। इन्हें अयोध्या अगले दिन पहुंचना था। जहां पर प्रतीकात्मक कारसेवा की घोषणा की गई थी। उससे पहले यहां सभा संबोधित करनी थी।
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बहरहाल दिसंबर की ठंड के बावजूद लोग इस पार्क में अटल, आडवाणी और जोशी को सुनने के लिए काफी बड़ी संख्या में मौजूद थे। मौजूद भी इसलिए क्योंकि यह बात चारों तरफ फैल चुकी थी कि उदारवादी अटल भी इस बार अयोध्या जा रहे हैं। कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री के नाते चूंकि न्यायालय में ढांचा की सुरक्षा करने का हलफनामा दे रखा था। इस नाते लोगों की जिज्ञासा और बढ़ी थी कि भाजपा सरकार और साख के बीच किसे बचाने को प्राथमिकता देगी।
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घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी, लेकिन आडवाणी और जोशी के रथ लेट हो रहे थे। हर सभाओं में सबसे अंत में बोलने वाले अटल को यहां भी सबसे आखिर में संबोधित करना था, लेकिन विलंब जब ज्यादा हो गया और लगा कि अब आडवाणी और जोशी नहीं आ पाएंगे तो उन्होंने बोलना शुरू किया।

उनके हाथ में एक पर्ची आई और...

उन्होंने कहा कि लखनऊ से सांसद होने के नाते आडवाणी और जोशी का स्वागत करना उनकी जिम्मेदारी है। इसी बीच, उनके हाथ में एक पर्ची आई। जिस पर नजर डाली तो उनके चेहरे के भाव बदले से दिखे। पर, आगे बोले तो यह साफ होने लगा कि हालात किधर जा रहे हैं। यह तो कहना मुश्किल है कि उन्होंने इन शब्दों का प्रयोग क्यों और कैसे किया था, लेकिन उस भाषण ने बिना कहे बहुत कुछ कह दिया था।

झाड़-झंखाड़ हटाएं और पत्थर व ईंट के टुकड़े भी
बोले, ‘इस बार मैं भी अयोध्या जाकर कारसेवा में शामिल होना चाहता था, लेकिन नेतृत्व ने मुझे दिल्ली वापस लौटने का हुक्म दिया है। शरीर से मैं दिल्ली में रहूंगा, लेकिन आत्मा व मन अयोध्या में कारसेवकों के बीच ही रहेगा। रामजी ने शायद मेरे लिए अन्य कुछ कार्य निर्धारित कर दिए हैं। कारसेवक कल शांतिपूर्वक कारसेवा करेंगे। वहां बैठकर राम नाम की कीर्तन करेंगे। उच्च न्यायालय के निर्देशों का पूरा सम्मान किया जाएगा। पर, अगर वहां जा रहे भक्तों के बैठने के लिए सफाई नहीं की है तो स्वाभाविक है कि वहां की साफ-सफाई होगी ही। झाड़-झंखाड़ हटाया जाएगा। पत्थर व ईंट के टुकड़े भी हटाने पड़ेंगे। नकीले ईंटे भी हटानी होगी।’

उनके शब्दों पर मौजूद भीड़ से लगभग 10 मिनट तक तालियां बजाती रहीं। बात जो भी हो, लेकिन भीड़ में मौजूद लोग कह रहे थे कि कल का दिन अयोध्या ही नहीं इस देश के लिए भी खास होगा। 

आडवाणी व जोशी की नहीं सुनी गई

लखनऊ में सभा के बाद लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरलीमनोहर जोशी अयोध्या पहुंचे। विहिप ने प्रतीकात्मक कारसेवा की घोषणा की। तय हुआ कि कारसेवक सरयू से एक-एक मुट्ठी बालू लाकर श्री राम जन्मभूमि स्थल से कुछ दूर निश्चित किए गए स्थान पर डालेंगे।

कारसेवकों से अनुशासन और संयम की अपील की जा रही थी ताकि प्रतीकात्मक कारसेवा भी हो जाए और प्रदेश सरकार की साख भी बनी रहे। अयोध्या के चारों तरफ के रास्तों को रोक रखा गया था ताकि विहिप की तरफ से जिले के लिए तय कारसेवक ही अयोध्या पहुंचे और प्रतीकात्मक कारसेवा करके लौट जाएं।

विहिप यह कार्यक्रम 11 दिसंबर 1992 तक चलाना चाहती थी क्योंकि उस दिन कल्याण सिंह सरकार द्वारा अधिग्रहीत 2.77 एकड़ भूमि के अधिग्रहण के खिलाप उच्च न्यायालय में लंबित याचिका पर फैसला आना था। पर, कारसेवक बेकाबू हो गए। परिसर में मौजूद आडवाणी और जोशी ने रोकने की कोशिश की तो उन्हें भी कारसेवकों के आक्रोश का निशाना बनना पड़ा। इसके बाद तो पूरे संघ परिवार ने बस हालात के साथ चलने में ही भलाई समझी।

महाजन बाद में बोले
अटल का भाषण पूरा ही हुआ था कि खबर आई कि कुछ ही देर में आडवाणी और जोशी सभा में पहुंच जाएंगे। लखनऊ में पहली बार अटल के बाद किसी का नाम बोलने के लिए पुकारा गया तो वह थे प्रमोद महाजन। जिन्होंने कहा भी, ‘उन्हें अटल जैसे वक्ता के बाद बोलने का सौभाग्य मिलेगा, यह तो कभी सोचा ही नहीं था।’

अटल ने रात में ब्रह्मदत्त को क्यों भेजा अयोध्या

भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र तिवारी बताते हैं कि अमीनाबाद की सभा के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उस समय प्रदेश सरकार में ऊर्जा मंत्री ब्रह्मदत्त द्विवेदी को अयोध्या भेजा। ब्रह्मदत्त द्विवेदी पहले राजस्व मंत्री थे।

उन्होंने ही अयोध्या में राम कथाकुंज के लिए जमीन अधिग्रहण का पूरा प्रस्ताव बनाया था। प्रदेश के बड़े वकीलों में गिने जाने वाले ब्रह्मदत्त फैजाबाद के प्रभारी भी थे और अटल बिहारी वाजपेयी के काफी विश्वसनीय लोगों में भी।

ब्रह्मदत्त द्विवेदी के जरिये अटल जी ने अयोध्या में मौजूद लोगों को शांति का संदेश भेजा था। पर, कुछ लोग नहीं माने। हालांकि सूत्रों की मानें तो श्रीराम जन्मभूमि मामले में प्रदेश में भाजपा के रणनीतिकारों में शामिल द्विवेदी संबंधित स्थल से कुछ महत्वपूर्ण अभिलेख लेने गए थे। जिनका भविष्य में कानूनी उपयोग किया जा सके।

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