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जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव: अखिर क्यों जीतकर हारी सपा

Sat, 09 Jan 2016 01:52 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 09 Jan 2016 01:52 AM IST
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analysis on District Panchayat President election.

धनबल, बाहुबल और सरकारी मशीनरी के सहारे समाजवादी पार्टी भले ही जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बड़ी सफलता हासिल करने का दम भर रही हो, लेकिन यह जीत बड़ा राजनीतिक संकेत देने वाली नहीं है। इसे 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए जनता का रुझान नहीं माना जा सकता।

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बावजूद इसके सत्तारूढ़ दल ने इस चुनाव में ‘दबंगई’ में कोई कसर बाकी नहीं रखी। कई जिलों में प्रत्याशियों की जीत के लिए सपाइयों ने जिस तरह की तिकड़में कीं, उससे आम लोगों के बीच नकारात्मक संदेश गया है।
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चुनाव की निष्पक्षता पर भी सवालिया निशान लगे हैं, लेकिन सपा इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उल्टे दावा किया जा रहा है कि चुनाव में किसी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं हुई।
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जिला पंचायत अध्यक्ष के 74 में से 38 पदों पर निर्विरोध निर्वाचन हो गया था। 36 जिलों में बृहस्पतिवार को मतदान हुआ। इनमें उन्नाव में सपा की बागी प्रत्याशी संगीता सेंगर समेत सपा के 24 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है।

शिवपाल यादव बता रहे हैं बड़ी उपलब्धि

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जिला पंचायत चुनाव में जीत पर विधानसभा में कई बार हार
वरिष्ठ मंत्री और सपा के मुख्य प्रवक्ता शिवपाल सिंह यादव ने 74 में से 60 सीटें जीतने को बड़ी उपलब्धि बताते हुए 2017 के चुनाव में इसी तरह की सफलता दोहराने की बात कही है, लेकिन राजनीतिक जानकार इससे इत्तेफाक नहीं रहते। वे मानते हैं कि धन और सत्ताबल से अप्रत्यक्ष चुनाव जीतना जनभावना की अभिव्यक्ति नहीं होती।

जिस तरह चुनाव में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया, वह लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। अप्रत्यक्ष चुनावों से सीधे राजनीतिक लाभ मिलने की संभावनाएं भी नहीं रहतीं। प्रदेश की राजनीति में पहले ऐसा होता रहा है कि जिस दल ने पंचायत चुनाव में जीत दर्ज की, विधानसभा चुनाव में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा।

वर्ष 2010 में जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में बसपा प्रत्याशियों की इसी तरह शानदार जीत हुई थी, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को करारा झटका लगा। 2005 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। तब जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में सपा के अधिकतर प्रत्याशी विजयी रहे थे, लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में बाजी उसके हाथ से निकल गई।

बागियों ने हासिल की जीत, तीन स्‍थानों पर मिली हार

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पंचायत चुनावों में निचले स्तर तक पनपी गुटबंदी भी सपा के लिए मुसीबत का सबब बनेगी। लगभग सभी जिलों में प्रत्याशी चयन को लेकर नाराजगी रही।

कई जिलों में सपा नेताओं ने खुलकर या पर्दे के पीछे से भितरघात किया। विधानसभा चुनाव में सपा की यह खेमेबंदी रंग दिखा सकती है।

पार्टी की उठापटक के चलते कुछ नेता दूसरे दलों का रुख भी कर सकते हैं। सपा के बागियों ने भी पार्टी के सामने चुनौती पेश की है। तीन विधायकों ने बगावत की और तीनों स्थानों पर सपा को हार का सामना करना पड़ा।

एक तरह से इन विधायकों ने साबित कर दिया कि उनकी राजनीति पार्टी संगठन से नहीं चल रही है। यह संदेश भी सपा को नुकसान पहुंचा सकता है।

सपनों में न खोए सपा, यह लोगों का मिजाज नहीं

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लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव के हालिया नतीजों से जनता के मिजाज का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इन्हें लेकर सत्तारूढ़ दल को सपनों में नहीं खोना चाहिए।

ये चुनाव 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए कोई संकेत नहीं हैं। मतदाता बहुत सतर्क है। पंचायत चुनावों को छोड़ दीजिए, लोकसभा और विधानसभा तक के चुनावों में मुद्दे अलग-अलग होते हैं। तमाम घटनाएं इन चुनावों को प्रभावित करती हैं।

इन चुनावों में बड़े स्तर पर धनबल, बाहुबल और सत्ता का इस्तेमाल हुआ है। यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। आजादी के छह-सात दशक बाद भी लोकतंत्र का परिपक्व न होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

जनतंत्र का निकृष्टतम रूप सामने आया

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प्रो. द्विवेदी कहते हैं कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव लोकतंत्र का सहभागी मॉडल होते हैं। इसमें ऐसे प्रतिनिधि चुने जाते हैं जो जनता के एकदम नजदीक होते हैं।

दुखद है कि अनुदान मिलने और वंशवाद बढ़ने से पंचायती संस्थाओं के चुनावों में व्यावसायिक भाव आ गया है। जाति और धर्म का फैक्टर पहले से मौजूद है। हाल के पंचायत चुनावों में जनतंत्र का निकृष्टतम रूप सामने आया है।

जनतंत्र में लोगों को राजनीतिक रूप से शिक्षित करना जरूरी होता है, पर सभी राजनीतिक दलों ने इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया है। इसी से जनतंत्र का सहभागी मॉडल विकृत होता जा रहा है। महात्मा गांधी और संविधान निर्माताओं ने पंचायती राज की ऐसी परिकल्पना नहीं की थी।

वोटों के गणित के लिए बदले एसपी-डीएम

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चुनाव के दौरान यूं तो तमाम जिलों में सत्ता का खुला दखल दिखाई दिया, लेकिन वोटों का गणित दुरुस्त करने के लिए अंबेडकरनगर में एसपी और गोरखपुर में डीएम को बदला गया। दोनों जगह चुनाव में बड़े स्तर पर धांधली के आरोप लगे हैं।

गोरखपुर जिले में चुनाव प्रभारी बनाए गए पशुधन मंत्री राजकिशोर सिंह ने जीत का रास्ता साफ करने के लिए न केवल वहां के जिलाधिकारी रंजन कुमार को हटवाया, वरन अपनी पसंद के ओमनारायण सिंह की तैनाती भी कराई।

राजकिशोर के करीबी रिश्तेदार बताए जा रहे ओमनारायण ने चुनाव में 11 वोट निरस्त कराकर सत्तारूढ़ दल के प्रति अपनी वफादारी साबित भी कर दी। अंबेडकरनगर में एसपी राहुल पी कनय को बदलवर अजय कुमार सिंह की तैनाती कराने के पीछे भी इसी तरह की मंशा थी।

वहां भी कप्तान ने विपक्षी दल के प्रत्याशी के वोटों को निरस्त कराने में काफी अहम भूमिका निभाई। अंबेडकरनगर और गोरखपुर में क्रमश: 10 और 11 वोट अवैध घोषित किए गए हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में इतने वोट निरस्त होने पर सवाल उठ रहे हैं।

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