यूं ही नही था योगी का अयोध्या दौरा, छिपे हैं खास सियासी संकेत
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प्रतीकों से संदेश और सरोकारों पर संकल्प। मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की पहली अयोध्या यात्रा का निचोड़ यही है। अयोध्या यात्रा से एक दिन पहले लखनऊ में विवादित ढांचा ध्वंस मामले के आरोपी लालकृष्ण आडवाणी की अगवानी व स्वागत।
पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वीरबहादुर सिंह की पुण्यतिथि के कार्यक्रम में यह कहना कि कांग्रेस में रहते हुए भी बतौर मुख्यमंत्री सिंह (वीर बहादुर सिंह) ने अयोध्या में ताला खोलने की स्वीकृति देकर पुण्य का काम किया।
फिर बुधवार को अयोध्या में हनुमान गढ़ी से लेकर श्रीराम जन्मभूमि स्थल व सरयू तट पर जाकर दर्शन-पूजन और हनुमान गढ़ी में एक संत के मंदिर निर्माण के सवाल पर मुस्कुराते हुए यह जवाब, ‘जल्द बनेगा राम मंदिर।’
यह समझने के लिए पर्याप्त है कि योगी का अयोध्या दौरा एक श्रद्धालु का अपने आराध्य के दर्शन-पूजन और मुख्यमंत्री के रूप में कानून-व्यवस्था व फैजाबाद मंडल की विकास कार्यों की समीक्षा तक ही सीमित नहीं था। इस दौरे ने देश व प्रदेश की भावी सियासत की इबारत भी लिखने की कोशिश की है।
आडवाणी का लखनऊ दौरा संयोग पर सियासी समीकरण भी
भले ही आडवाणी का लखनऊ आगमन और उसके एक दिन बाद योगी की अयोध्या यात्रा संयोग भर हो, लेकिन जिस तरह से यह घटा उसके पीछे कुछ न कुछ तो सियासी समीकरण छिपे ही हैं। यह बात इसलिए क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में योगी की अयोध्या यात्रा पहले मार्च के अंतिम सप्ताह में ही तय हो रही थी। फिर अचानक कार्यक्रम बदला।
अयोध्या दौरे की तारीख तब तय हुई जब सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर राम जन्मभूमि आंदोलन के रथयात्री लालकृष्ण आडवाणी का लखनऊ स्थित सीबीआई अदालत में हाजिर होने का दिन और समय निश्चित हो गया। इसके गहरे सियासी निहितार्थ हैं।
पहचान बने प्रतीक, जिनसे जुड़ी हुई हैं घटनाएं
अयोध्या की बात चले तो सरयू नदी का स्मरण स्वाभाविक है। हनुमान गढ़ी और श्रीराम जन्मभूमि स्थल के बारे में भी जिज्ञासा पैदा होगी। इन स्थानों के साथ अयोध्या आंदोलन की बात चलेगी तो अयोध्या की पहचान बने इन स्थानों में दिगंबर अखाड़ा और महंत नृत्यगोपाल दास का स्थान मणिराम दास छावनी भी जुड़ जाएगी।
ये वही स्थान हैं जो 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के ‘परिंदा भी अयोध्या में पर नहीं मार पाएगा’ के दावे को झुठलाते हुए कारसेवकों का ठिकाना बने थे। हनुमान गढ़ी, दिगंबर अखाड़ा, मणिराम दास छावनी और सरयू नदी के नया घाट और उसके पास बना पुल कारसेवकों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष के साक्षी भी रहे थे।
मुख्यमंत्री के रूप में योगी इन सब स्थानों पर गए। जिस सरयू के जल से कभी उनके गुरु महंत अवेद्यनाथ ने हजारों लोगों को श्रीराम जन्मभूमि स्थल की मुक्ति और वहां पर भव्य राम मंदिर निर्माण का संकल्प दिलाया था, जो नया घाट कारसेवकों और सुरक्षा बलों के बीच मंदिर निर्माण आंदोलन के चलते हुए संघर्ष का केंद्र बना था, योगी ने वहीं पहुंचकर सरयू का जब पूजन किया, तो वे यह संदेश देते दिखे कि चेहरे भले ही बदल गए हैं लेकिन मंदिर निर्माण और अयोध्या को भव्य बनाने का संकल्प नहीं बदला है।
यह भी संकेत दिए योगी ने
बतौर मुख्यमंत्री योगी ने इस दौरे में केंद्र व प्रदेश सरकार की तरफ से अयोध्या के विकास व सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने वाले कामों की बात कही। गंगा की तरह सरयू की नित्य आरती की सरकार की तरफ से व्यवस्था की घोषणा की। सरयू में गिरने वाले नालों को बंद करने तथा राम जन्मभूमि आंदोलन की पहचान स्व. रामचंद्र परमहंस के अंत्येष्टि स्थल को सजाने, संवारने और स्मारक के रूप में बनाने की बात कही।
फिर महंत नृत्यगोपाल दास के जन्मोत्सव में जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय के सुलह-समझौते से मंदिर मुद्दे के हल के सुझाव पर आगे बढ़ने का आह्वान किया, उससे यह भी साफ दिखा कि भाजपा यह बताना चाहती है कि वह न तो अयोध्या को भूली है और न हिंदुत्व की उन आकांक्षाओं को जिन्हें पूरी करने के लिए लोगों को आंदोलन करना पड़ा। अदालत का आसरा लेना पड़ा और कारसेवा के लिए संघर्ष करना पड़ा, जिसमें कुछ नौजवानों की जानें भी गईं।
आंदोलन ने बदल दी राजनीति की धारा
इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि अयोध्या आंदोलन ने देश की राजनीति की धारा बदली है। अयोध्या आंदोलन से पहले राजनीति में हिंदू व हिंदुत्व की बात करने का साहस बहुत कम लोग करते थे।
पर, आज राजनीति में हिंदुत्व एक ऐसा फैक्टर बन गया है जो सियासी दलों के जीतने व हारने के समीकरण तैयार करता है। भाजपा को तो फर्श से अर्श तक पहुंचाने में अयोध्या आंदोलन के जरिए बने इस फैक्टर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
भाजपा की असफलता के लिए भी अब तक यही रहे जिम्मेदार
भाजपा के तमाम नेता आज यह मानते हैं कि बीच में अयोध्या, मंदिर और हिंदुत्व पर नरम रवैया ही उनकी असफलता का कारण रहा। शायद यही वजह है कि भगवा टोली मोदी व योगी के जरिए प्रतीकों के माध्यम से लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सरोकारों पर उनका संकल्प रत्तीभर भी नहीं बदला है।
योगी ने अयोध्या की पहचान व मंदिर आंदोलन वाले स्थानों को प्रतीक बनाकर यह संदेश देने का प्रयास किया कि सरोकारों पर संकल्प जस का तस है। मंदिर बनने में भले ही कुछ वक्त लगे लेकिन अयोध्या को आस्था का केंद्र बनाने और उस लिहाज से उसे भव्यता व दिव्यता देने के काम में कोई कोताही नहीं होगी।
भाजपा के रणनीतिकारों का यह मानना है कि 2019 में लोकसभा चुनाव की लड़ाई ज्यादा मुश्किल हो सकती है। भाजपा विरोधी दल आपस में हाथ मिलाकर मुकाबले में आ खड़े हो सकते हैं।
उस स्थिति में हिंदुत्व का चेहरा और सरोकार ही सियासी लड़ाई को 80 बनाम 20 बना पाएंगे, जिससे भाजपा को विजय मिले। अयोध्या यात्रा में योगी ने कहीं न कहीं उस लड़ाई के लिए समीकरण तैयार करने की कोशिश भी की है।