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टकराहट, अकुलाहट की मिलेगी बानगी, इस बार इंट्रेस्टिंग होगा राष्ट्रपति चुनाव

Thu, 06 Jul 2017 12:35 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Thu, 06 Jul 2017 12:35 PM IST
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analysis about president election
मीरा कुमार और रामनाथ कोव‌िंद - फोटो : demo pic
राष्ट्रपति चुनाव कई कारणों से प्रदेश के लिए काफी खास हो गया है। इसलिए नहीं कि यूपी के रहने वाले रामनाथ कोविंद को राजग ने उम्मीदवार बनाया है और जीत का गणित उनके पक्ष में होने के कारण उत्तर प्रदेश से पहली बार किसी व्यक्ति को देश का सर्वोच्च पद मिलने वाला है।
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खास मतलब इसलिए है क्योंकि  इस चुनाव ने अपने आगोश में प्रदेश की सियासत की कई सच्चाइयां और समीकरण छिपा रखे हैं। इनकी झलक इस चुनाव में प्रदेश में पड़ने वाले वोटों से मिलेगी।
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ये वोट दलों के भीतर की कहानी ही नहीं बताएंगे, बल्कि सपा में चल रही टकराहट और कुछ दलों में अकुलाहट की खबरों की सच्चाई भी समझाएंगे। बताएंगे कि यह टकराहट और अकुलाहट प्रदेश में किसी नए सियासी समीकरण की नींव रख रही है या सब कुछ सिर्फ अपने अस्तित्व की लड़ाई तक ही सीमित है।
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दरअसल, जिस तरह समाजवादी पार्टी में चाचा शिवपाल सिंह यादव और भतीजे पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही है। शिवपाल ने सेकुलर मोर्चा बनाने की घोषणा कर रखी है।

पार्टी के संस्थापक और अब संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने भाजपा गठबंधन (राजग) के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद की तारीफ कर समर्थन का संकेत ही नहीं दिया, बल्कि 20 जून को यहां मुख्यमंत्री आवास पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में आयोजित रात्रिभोज में भी शामिल होकर एक बार फिर यह जता दिया है कि उनके राजनीतिक फैसले पुत्र अखिलेश के प्रभाव से मुक्त हैं, उससे इन संभावनाओं को और बल मिल रहा है।

यह संकेत भी मिलने लगे हैं कि भले ही राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा व राजग की राह मुश्किल बनाने के लिए मोर्चा और गठबंधन की बातें हो रही हों लेकिन यूपी की राजनीति की धारा भविष्य में भाजपा के लिए और अनुकूल समीकरण बनाने की तरफ बढ़ती दिख रही है।

यह है वोटों का गण‌ित

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रामनाथ कोविंद
ऐसा इसलिए नहीं कि शिवपाल के काफी नजदीकी दीपक मिश्र ने कोविंद के समर्थन की अपील की है या मुलायम कोविंद को लेकर सकारात्मक बोल चुके हैं। दरअसल, सपा के कुछ और विधायक तथा राज्यसभा सदस्य भी ऐसे हैं जो भले ही खुलकर अखिलेश यादव के खिलाफ न बोलते रहे हों, लेकिन मुलायम व शिवपाल के समर्थक हैं।

इसे देेखते हुए संभावना दिख रही है कि राष्ट्रपति चुनाव के बहाने ये सब अखिलेश यादव को झटका देने की कोशिश कर सकते हैं।सपा ही नहीं, बसपा और कांग्रेस के भी कुछ सदस्यों को लेकर बीच-बीच में कई बार भाजपा से संपर्क के समाचार चर्चा में आते रहे हैं।

इन चर्चाओं का किसी पक्ष ने खंडन भी नहीं किया है। ऐसे में संभावना बनती दिख रही है कि गुप्त मतदान और व्हिप जारी न होने के कारण भाजपा विरोधी पार्टियों में बिखराव सामने आ सकता है।

राष्ट्रुपति चुनाव में प्रदेश के 514 जनप्रतिनिधि वोट डालेंगे। इनमें 80 सांसद, 31 राज्यसभा सदस्य और 403 विधायक हैं। सांसदों में 73 भाजपा व गठबंधन के हैं। पांच सपा के और दो कांग्रेस के हैं।

विधायकों में 325 भाजपा गठबंधन (312 भाजपा, 9 अपना दल व 4 भारतीय समाज पार्टी) के हैं। सपा के 47, बसपा के 19 और कांग्रेस के 7 विधायक हैं। इसके अलावा एक विधायक रालोद के और चार निर्दलीय हैं।

राज्यसभा सदस्यों में सपा के 19, बसपा के 6 तथा भाजपा व कांग्रेस के तीन-तीन सदस्य हैं। इस तरह प्रदेश के 514 वोटों में भाजपा के पास 401 वोट है जबकि रालोद के एक सदस्य और चार निर्दलीय सदस्यों को मिलाकर विपक्ष के पास 113 वोट हैं।

ऐसे में राजग उम्मीदवार कोविंद को प्रदेश से भारी बढ़त मिलनी निश्चित ही है। पर, भाजपा के रणनीतिकार इस चुनाव के बहाने यह संदेश भी देना चाहते हैं कि प्रदेश में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ है। भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में कोई नहीं है। इसीलिए उनकी कोशिश है कि ज्यादा मत होने के बावजूद विरोधी दलों के वोटों में सेंधमारी की जाए।

इस‌ल‌िए हैं चुनाव के खास मायने

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मीरा कुमार - फोटो : meera kumar
मुलायम और शिवपाल के तेवर देखते हुए भाजपा की रणनीति सफल होती भी दिख रही है। जो समीकरण हैं, उनसे लगता है कि विपक्ष के मतों में निश्चित रूप से सेंधमारी होगी।

मुलायम और शिवपाल के साथ सपा के कुछ और विधायक तथा राज्यसभा सदस्य भी कोविंद के पक्ष में मतदान कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अमर सिंह तो सपा से राज्यसभा सदस्य हैं, पर लगभग सात महीनों से उनके तेवर अखिलेश विरोधी हैं।

राज्यसभा के कुछ अन्य सदस्य भी मुलायम व शिवपाल के पक्ष में बोल चुके हैं। इसे देखते हुए लगता है कि कोविंद के विरोध में खड़ी मीरा कुमार को सपा के वोट एकमुश्त मिलना काफी मुश्किल है।

लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर दलित और पिछड़े वोट की लामबंदी की हरसंभव कोशिश कर रहे भाजपा के रणनीतिकार राष्ट्रपति चुनाव के बहाने यह संदेश भी देना चाहते हैं कि दलितों व पिछड़ों के वोटों की असली हकदार वही है। यह संदेश तभी जाएगा जब विपक्ष के वोटों में बिखराव हो।

सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद के विधायक के अलावा प्रदेश की विधानसभा में चार विधायक निर्दल भी हैं। इनमें रघुराज प्रताप सिंह प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मंच भी साझा कर चुके हैं।

यही नहीं, सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री होते हुए भी राजा भैया खाद्य-रसद विभाग हटाए जाने से नाराज चल रहे थे। एक और निर्दल विधायक अमनमणि बहुत पहले ही मुख्यमंत्री की तारीफ कर चुके हैं।

ऐसे में यही माना जा रहा है कि इनके वोट भी कोविंद के पक्ष में जा सकते हैं। रही बात इस चुनाव के प्रदेश के लिए खास होने कीतो  इसके नतीजों से साफ हो जाएगा कि भाजपा को रोकने के लिए विपक्ष की एकजुटता का भविष्य कैसा है। भाजपा के समर्थन में दिख रहे 401 वोटों के अलावा और कौन-कौन वोट कहां से आए हैं। वे कौन हैं जो नई राजनीतिक राह तलाश करने की कोशिश में जुटे हैं। 
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