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Lucknow News: प्रो. सुखवीर सिंहल के वाश चित्रों की प्रदर्शनी लगी
Tue, 10 Jun 2025 02:26 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Tue, 10 Jun 2025 02:26 AM IST
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प्रो. सुखवीर सिंहल।
लखनऊ। भारतीय चित्रकला को समृद्ध बनाने में अहम योगदान देने वाले स्वर्गीय प्रो. सुखवीर सिंहल के 38 वाश चित्रों की प्रदर्शनी सोमवार से दिल्ली के एनेक्सी आर्ट गैलरी में शुरू हुई। ‘द साइलेंट कैनवस स्पीक अगेन’ शीर्षक से लगी प्रदर्शनी 17 जून तक रहेगी। इसका उद्घाटन चित्रकार पद्मभूषण जतिन दास, कला समीक्षक उमा नायर और कवि प्रयाग शुक्ल ने किया।
प्रदर्शनी की क्यूरेटर प्रो. सिंहल की पौत्री प्रियम चंद्रा ने बताया कि यह एक एकल पूर्वव्यापी प्रदर्शनी है जो एक भूले हुए कला गुरु की स्थायी प्रतिभा की पुष्टि करती है और उन्हें यह श्रद्धांजलि है। 33 साल बाद दिल्ली में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी है। लखनऊ में कैसरबाग चौराहे से पहले अमीरुद्दौला लाइब्रेरी के बगल से एक रास्ता जाता है जिसका नाम प्रो. सुखवीर सिंहल के नाम से रखा गया है। यह रास्ता सीधा प्रो. सिंहल की कला वीथिका तक पहुंचाता है। प्रो. सिंहल ने 1964 में लखनऊ स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रोफेसर के रूप में जॉइन किया था। यह प्रदर्शनी एक ऐसे युग की आवाज को पुनर्जीवित करेगी जो समय के साथ दब गई थी।
कला समीक्षक भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि प्रो. सुखवीर सिंहल ने सैकड़ों वाश पेंटिंग बनाईं। इसके अलावा जल रंग में दृश्य चित्रण भी किया है जिसके रंग आज भी ताजा लगते हैं। रंगों का मिश्रण भी अकल्पनीय है। उनकी वाश पेंटिंग में एक, दो, तीन फिगर नहीं बल्कि ढेर सारे मानव के समूह आकृतियों को अलग-अलग भाव भंगिमाओं में देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि प्रो. सिंघल एक मात्र ऐसे कलाकार रहे जिन्होंने एक वाश पेंटिंग में मानव के समूह आकृतियों को स्थान दिया। उन्हें वाश पेंटिंग का गॉडफादर भी कहा जाता है। जीवन के अंतिम समय तक वे कला के प्रति समर्पित रहे। उनका निधन 29 नवंबर 2006 को हुआ था।
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प्रदर्शनी की क्यूरेटर प्रो. सिंहल की पौत्री प्रियम चंद्रा ने बताया कि यह एक एकल पूर्वव्यापी प्रदर्शनी है जो एक भूले हुए कला गुरु की स्थायी प्रतिभा की पुष्टि करती है और उन्हें यह श्रद्धांजलि है। 33 साल बाद दिल्ली में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी है। लखनऊ में कैसरबाग चौराहे से पहले अमीरुद्दौला लाइब्रेरी के बगल से एक रास्ता जाता है जिसका नाम प्रो. सुखवीर सिंहल के नाम से रखा गया है। यह रास्ता सीधा प्रो. सिंहल की कला वीथिका तक पहुंचाता है। प्रो. सिंहल ने 1964 में लखनऊ स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रोफेसर के रूप में जॉइन किया था। यह प्रदर्शनी एक ऐसे युग की आवाज को पुनर्जीवित करेगी जो समय के साथ दब गई थी।
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कला समीक्षक भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि प्रो. सुखवीर सिंहल ने सैकड़ों वाश पेंटिंग बनाईं। इसके अलावा जल रंग में दृश्य चित्रण भी किया है जिसके रंग आज भी ताजा लगते हैं। रंगों का मिश्रण भी अकल्पनीय है। उनकी वाश पेंटिंग में एक, दो, तीन फिगर नहीं बल्कि ढेर सारे मानव के समूह आकृतियों को अलग-अलग भाव भंगिमाओं में देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि प्रो. सिंघल एक मात्र ऐसे कलाकार रहे जिन्होंने एक वाश पेंटिंग में मानव के समूह आकृतियों को स्थान दिया। उन्हें वाश पेंटिंग का गॉडफादर भी कहा जाता है। जीवन के अंतिम समय तक वे कला के प्रति समर्पित रहे। उनका निधन 29 नवंबर 2006 को हुआ था।
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