Samvad: बर्तन घिसे और सड़क पर बेची क्रीम, अमेठी से सांसद बनने और घर बनाने की कहानी; स्मृति ने राहुल पर ये कहा
अमर उजाला संवाद में केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि जब पार्टी नेतृत्व ने बताया कि अमेठी से प्रत्याशी बनना है। 22 मार्च 2014 की शाम थी। बात सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन मैंने कहा कि मुझे घर पर एक बार पूछना है। मुझे इस बात का अहसास था कि अमेठी की लड़ाई साधारण राजनीतिक लड़ाई नहीं होगी।
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अमर उजाला संवाद के दूसरे दिन केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने राहुल गांधी पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि जो अमेठी छोड़ चुके हैं वह अब वायनाड छोड़ने की तैयारी में है। इस दौरान उन्होंने कई सवालों के जवाब दिए। आप अब अमेठी में घर ले चुकी हैं। यह अनुभव कैसा रहा?, पहली बार अमेठी से चुनाव लड़ना है तो कैसा अनुभव रहा और मोहब्बत की दुकान बनाम मोदी की गारंटी पर क्या कहेंगी।
आप अब अमेठी में घर ले चुकी हैं। यह अनुभव कैसा रहा?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि अमेठी तो 2014 में ही मेरा घर बन चुका था। फर्क यह था कि कमरा किराए पर था। कुछ लोग कहते थे कि मैं अस्थाई हूं। कुछ लोगों को कमरे का किराया देने में झिझक होती थी कि मैं रहूंगी तो कांग्रेस के किसी कार्यकर्ता के गुस्से की आग में वह झुलस न जाए। तब पूरी जनपद में रहने को जगह नहीं मिली तो गौरीगंज के मध्य में खेत में सीमेंट का गोदाम था। कार्यकर्ता वहां ले गए और कहा कि यहां कमरा मिल सकता है।
सीमेंट की बोरियों के बीच से राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई। हम चार-पांच महिला कार्यकर्ता थीं। उनमें से कई ऐसे परिवारों से थीं जिन्होंने फर्श पर सोने की कल्पना नहीं थी। उन्हें पता था कि सफर कठिन है। क्षमताओं के आधार पर इतिहास लिखा जाना था। उन्हें फर्श और टपकती छत मंजूर थी। कीड़े-मकोड़े भी टपकती छत के साथ मौजूद रहते थे।
कल आपके मंच पर उपमुख्यमंत्री आए थे। 2019 में जब वे प्रचार पर आए तो लोगों से मिलने पर कहा गया कि दीदी किराए के घर में रहती हैं तो वे अपना मकान बनाएंगी। उन्होंने कहा कि मैं वादा करता हूं कि दीदी मकान बनाएंगी। भाई के मुख से यह बात निकल गई तो बात पूरी करनी थी। यह सौभाग्य है कि मेरे लिए यह 10 साल की यात्रा का अहम पड़ाव है।
जब आपको पहली बार बताया गया कि अमेठी से चुनाव लड़ना है तो कैसा अनुभव रहा?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि जब पार्टी नेतृत्व ने बताया कि अमेठी से प्रत्याशी बनना है। 22 मार्च 2014 की शाम थी। बात सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन मैंने कहा कि मुझे घर पर एक बार पूछना है। मुझे इस बात का अहसास था कि अमेठी की लड़ाई साधारण राजनीतिक लड़ाई नहीं होगी। उसका खामियाजा मुझे नहीं, बल्कि पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा। 2014 में तब केंद्र में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी। प्रदेश में सपा की सरकार थी। दोनों तरफ दो खीचीं हुई तलवारों के मध्य में मुझे अमेठी में प्रवेश करना था।
अमेठी वह क्षेत्र है, जहां चुनावों में उम्मीदवार की हत्या हो जाती है या गोलियां चल जाती हैं। जब परिवार को मैंने फोन पर यह बताया तो मुझसे पूछा गया कि अनहोनी हो जाए तो क्या करोगी? 10 साल पहले एक बच्चा नौ साल और एक 11 साल का था। तब पति-पत्नी ने बैठकर निर्णय किया कि आप कभी मत अमेठी आइएगा क्योंकि दोनों में से एक को बच्चों के लिए जीवित बचना चाहिए। जब आज हम कहते हैं कि हम 400 सीटों के पार जाने वाले हैं, तब यह समझना मुश्किल हो जाता है कि 2014 में क्या मंजर रहा होगा।
नौ साल, 11 साल के बच्चों को देखकर यह निर्णय लेना पड़ा था कि परिवार सुरक्षित रहे, इसलिए वह अमेठी न आए। भद्दी बातें कही जाएंगी, सब चुपचाप सहना है। बड़ों-बच्चों को साथ बैठाना और उन्हें समझाना अपने आप में जीवन की अलग किताब है। वहीं से अमेठी का सफर शुरू हुआ। यह चर्चा हमारे घर में मात्र एक घंटे की रही। मां और पूरा मायका संघ की पृष्ठभूमि से है। निर्णय लेने में वैचारिक कठिनाई नहीं थी। बस परिवार की दृष्टि से भावनात्मक चुनौती थी। एक घंटे में पारिवारिक निर्णय हुआ और बाकी सब इतिहास है। रात 11:40 बजे मैंने पार्टी नेतृत्व को बताया कि हां मैं अमेठी से चुनाव लड़ूंगी।
2024 में क्या शीर्षक होगा?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि जिन्होंने 2019 में अमेठी छोड़ दिया, अब वे वायनाड छोड़ने की तैयारी में हैं। अमर उजाला के मंच पर आई हूं, मुझ तक यह खबर भी न पहुंचती तो लानत है। अमेठी में कौन लड़ेगा, यह भाजपा का संसदीय बोर्ड बताएगा। जब आप ऐतिहासिक जीत दर्ज कर लें तो बहुत मुश्किल होता है। मैंने पांच साल में एक ही जवाब दिया है। अमेठी में कौन लड़ेगा, यह निर्णय भाजपा संसदीय बोर्ड ही करेगा। कार्यकर्ताओं से अपेक्षा है कि मर्यादा का उल्लंघन न करे। जो भी लड़ेगा, 400 पार के आंकड़े में अमेठी से कमल का एक फूल जरूर जाएगा।
क्या आपके सामने प्रियंका गांधी होंगी?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि अगर आप अमेठी का राजनीतिक विश्लेषण करें तो 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक कमान श्रीमती वाड्रा के हाथ में थी। अमेठी की पांच में से चार विधानसभा में प्रियंका और राहुल गांधी दोनों मिलकर चुनाव प्रचार करने आए थे। जिन चार सीटों पर वे प्रचार करने आए, चारों पर कांग्रेस की जमानत जब्त हो गई। 2019 में कांग्रेस का प्रत्याशी अकेले नहीं लड़ा था। हमने 2019 में ही इंडी अलायंस को हरा दिया था। तब चार लाख से ज्यादा वोट मिले थे।
शायद ही किसी ने यह विश्लेषण किया हो कि 2019 के चुनाव में भाजपा को जो अमेठी में वोट मिला, तब वह अमेठी के इतिहास में किसी प्रत्याशी को मिले सबसे ज्यादा वोट थे। अगर आप 2022 के विधानसभा चुनाव की समीक्षा करें तो पाएंगे कि पूरे लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस में महज 1.40 लाख वोट ही बचे हैं। अगर वे ये बचे हुए वोट लेने आना चाहते हैं तो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। मैंने उनकी राजनीति को जितना देखा है, उससे पता चलता है कि जहां संघर्ष है, वहां वे कदम नहीं रखते।
मोहब्बत की दुकान बनाम मोदी की गारंटी पर क्या कहेंगी?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि पहली बार गांधी परिवार ने स्वीकार किया है कि राजनीति उनके लिए किसी दुकान से कम नहीं है। पहली बार उन्होंने एलान किया है कि राजनीति उनके लिए कारोबार है। मोदी जी के लिए तो यह सेवा का माध्यम है। जो खुद को चिह्नित करके दुकानदार बता दे, जनता उसे भविष्य का सौदा करने के लिए वोट क्यों दे?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि मैं सात साल की थी, जब घर छोड़ना पड़ा था। मां के साथ हम तीन बहनें थीं। जब घर से निकाला जा रहा था, उस घर के सामने मैं खड़ी रही। मां ने कहा कि क्या ताक रही हो घर को। मैंने मां से कहा कि एक दिन आएगा, जब मेरी इतनी औकात होगी कि जिस घर से तुम्हें निकाला है, वो घर मैं खरीद सकूं। मुझे याद है कि तब मुझे कसकर चांटा पड़ा था क्योंकि मेरी मां ने मुझसे कहा था कि हम एक ऐसी आर्थिक पृष्ठभूमि से हैं, जहां न कोई ऐसे सपने देखता है, न बयां करता है। शायद उन्हें इस बात की तकलीफ थी कि मैं ऐसा सपना न देखूं, जिससे दिल टूटे। आज मेरे अपने बच्चे हैं तो मुझे यह समझ आता है कि माता-पिता क्यों बच्चों को उनकी महत्वाकांक्षाओं से ही बचाए रखना चाहते हैं।
जिंदगी में दूसरा मौका तब आया, जब मैं परिवार के साथ उसी के घर के सामने पहुंची। यह 15 साल पहले की बात है। तब मुझे एहसास हुआ कि जो घर मुझे महल-सा लगता था, वह असल में ड्राईक्लीनर का लॉन्ड्री वॉशरूम था। गुड़गांव में न्यू कॉलोनी में आर्य समाज मंदिर के पास यह घर था। ड्राईक्लीनर भागा-भागा आया और उसने कहा कि आप यहां रहती थीं। मुझसे मेरे परिवार ने कहा कि खरीदना है घर? मैंने कहा कि नहीं... कोई अपनी बदकिस्मती को नहीं खरीदता। सात साल की उम्र में आपको जहां से निकाला गया, आप वहां क्षमतावान बनकर लौट पाओ, यही आपका सौभाग्य है। जब पीएम मोदी यह कहते हैं कि हमने 25 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा तो यह आंकड़ा नहीं हकीकत है। मैं खुद को इससे जोड़ना चाहता हूं क्योंकि मैं भी एक वक्त गरीबी का वह आंकड़ा थी।
मैंने कभी भी विक्टिम बनना मंजूर नहीं किया। यह बात मैं इसलिए कह रही हूं कि जब हम सफलता की सीढ़ी चढ़ते हैं, जीवन के सामाजिक-आर्थिक पड़ावों से उत्तीर्ण होते हैं, तब लोगों को यह खुशफहमी होती है कि हम सब अच्छा-अच्छा बोलें ताकि हमारा वैभव बना रहे। मैं संभावनाओं का प्रतीक हूं कि महिला ठान ले तो अपने दम पर संस्कारों से समझौता किए बिना, झुके बिना आगे बढ़ सकता है। झुकना सीखो यह बचपन से सिखाया जाता है, मैं सख्त रीढ़ के साथ मर पाऊं, यही अभिलाषा। झुकूं तो बड़ों के सामने विनम्रता से और बच्चों को दुलार करने के लिए। इसलिए नहीं झुकूं कि सामने वाला ताकत और घमंड रखता है।
आपको प्रेरणा किससे मिलीं? आपकी कभी सुषमा स्वराज जी से तुलना होती है।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि सुषमा स्वराज जी लीजेंड हैं। उनसे मेरी तुलना होना सही नहीं है। सुषमा जी की पीढ़ी ने तब संघर्ष किया, जब भाजपा में होना अपने आप में दुर्लभ दृश्य होता था। बहुत सारे साथी नहीं मिलते थे। मीडिया से मुखातिब होना आसान नहीं था। उनकी शैली और उनका योगदान भिन्न था। मेरा नाम उनके साथ लिया जाता है तो वह उनकी तौहीन होगी। उनका अपना योगदान है। मेरी अब तक औकात नहीं हुई है कि मेरा नाम सुषमा जी के साथ लिया जाए।
यह माना जाता है कि अभिनय की दुनिया या मुंबई से आ रहा है तो उसकी भाषा अलग होती है। आपकी भाषा एकदम अलग है। आप स्पीच से पहले तैयारी करती हैं?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि मुझे नहीं पता था कि संवाद क्या होने वाला है। अब तक जो भी कहा, वो कैल्कुलेटेड नहीं है। मेरे दादा मुरादाबाद के हैं। उन्हें आप श्रेय दे सकते हैं। लोगों को गलतफहमी थी कि ये मुंबई से आई हैं। दादी महाराष्ट्र से हैं। नानी असम, नाना बंगाल से हैं।
पति गुजराती पारसी हैं। मेरे साथ भाषा का अभाव नहीं है। हम एक गलतफहमी जरूर पालते हैं कि जो हमें सुन-देख रहा है, वह अपने अनुभव से टटोल नहीं पा रहा कि हम कितना सच या साफ बोल रहे हैं। मैंने जीवन में अपने लिए एक ही नियम रखा कि जिससे आप बतिया रहे हैं, उसके साथ कम से कम गरिमा और सम्मान से पेश आएं। वो जान सकता है कि जो आपके दिल में है, क्या वही आपकी जुबान पर है? मुझे ऐसा भी लगता है कि कोई भी व्यक्ति जीवन में त्रुटि न करे, यह संभव नहीं है। स्वाभाविक रूप से व्यक्ति अक्लमंद तब है, जब वह गलती पर माफी मांगे और विनम्र है। इस देश का दिल बड़ा है, वह अच्छे-अच्छों को माफ कर देता है।
आप स्पीच से पहले तैयारी करती हैं?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि यूपी वालों का अंदाज-ए-बयां ही ऐसा है, क्या कीजिएगा? यह भी सत्य है कि प्रभु की असीम कृपा रही है कि मैं कहीं कोई डेटा या कोई छंद पढ़ लूं तो आजीवन याद रहता है। मैं पिताजी की चलती फिरती टेलीफोन बुक हुआ करती थी। वे कहते थे कि स्मृति को बुलाओ, उसे नंबर याद होगा। नाना ने मेरा नाम सृति रखा था। पिता पंजाबी थे तो बोले कि जिंदगी भर नाम नहीं ले पाएंगे तो वह स्मृति कर दिया गया, लेकिन डेटा याद रहता है मुझे। अनुभव याद रहते हैं। इसलिए स्पीच लिखकर बोलने वालों में से नहीं हूं। यह शौक सिर्फ गांधी खानदान के लोग रहते हैं।
क्या आप अभिनय के क्षेत्र को याद करती हैं?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि 140 करोड़ के देश में भारत की सेवा करने के लिए संसद में चुना जाना, अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य है। सांसदों के जमघट में से भी कैबिनेट में मौका मिले, यह भी सौभाग्य से कम नहीं। सेवा और सौभाग्य को ठुकराकर कौन पलटकर जाएगा? सिंहावलोकन करूं तो मैंने सिर्फ अभिनय नहीं किया, मैंने राइटिंग की, प्रोडक्शन किया, जिसके लिए मुझे पुरस्कृत किया गया। एक चैनल में राजनीतिक शो का हिस्सा रही हूं। मैं मीडिया में स्ट्रिंगर हुआ करती थी। एडिटर भगा दिया करते थे। वे कहते थे कि किसी लायक नहीं हो।
कुछ साल पहले उन्हीं एडिटर ने मुझे बुलाया और पुरस्कृत किया। कुछ लोगों को मीडिया को लेकर भ्रांतिया हैं। हार्ड न्यूज के मीडिया के बारे में भ्रांति है कि वे पक्ष देखकर लिखते हैं। जो जनरल एंटरटेनमेंट से हैं, उनके बारे में कहा जाता है कि वे शायद गंभीर नहीं हैं कि वे मुद्दों पर चर्चा कर सकें। मैं मीडिया के दोनों पक्षों से थी तो मेरा बोझ बड़ा था। चित भी मेरी नहीं थी, पट भी मेरा नहीं था। यह मेरी जिम्मेदारी थी कि मीडिया कर्मी के नाते मैं राजनीति में गंभीर योगदान दे सकती हूं।
मीडिया जगत के लिए यह मेरा योगदान है। मीडियाकर्मी भी राजनीति से आएं तो उन्हें सम्मान से देखा जाए। हर वर्ग से लोग राजनीति से आते हैं। मीडिया वाले चिह्नित इसलिए होते हैं क्योंकि हम खबरों के सरताज होते हैं। फिर कहा जाता है कि आप महिलाओं के लिए क्या करेंगी? भेदभाव के बीज आप ही बोते हैं। महिला राजनेता हैं तो महिलाओं के लिए क्या करेंगी। पुरुषों से कोई नहीं पूछता।
आपको आलोचना कितनी झेलनी पड़ी?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि सबसे सफल वह व्यक्ति है, जिसकी कोई अभिलाषा नहीं है। जनपथ में मनोज प्रभाकर की कंपनी थी, वहां 200 रुपये दिहाड़ी पर सड़क पर क्रीम बचेगी। मुंबई में 1800 रुपये महीने की बर्तन घीसने की नौकरी करती थी। जिसने यह सब देखा हो, उसके लिए आज यहां होना ही बड़ी सफलता है।
आगे कहा कि मुझे अमेठी में कहा गया कि आप तो 'तुलसी' हैं और पहले भी यहां उम्मीदवार पर गोली चल चुकी है। मेरे लिए संघर्ष आसान था क्योंकि मैं सड़क से उठी हूं। गांधी परिवार के यह लिए मुश्किल है क्योंकि उन्होंने सड़क कभी देखी नहीं थी। मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि सब कुछ चला जाए और दोबारा बर्तन मांजने पड़े, तब भी दो वक्त की रोटी तो कमा ही लूंगी। लोग कहते थे कि एक्टर है तो बुद्धिविहीन होगी। जो व्यक्ति अपमान कर रहा है, वो उन लोगों से कैसे बर्ताव करता है जिनके पास न सत्ता है न शोहरत है।
उन्होंने आगे कहा कि लोग कटाक्ष या अपमान करते थे तो सुनती थी कि क्या आलोचना रचनात्मक है या घमंड की वजह से है। अगर उनका विश्लेषण मेरे बारे में सही है तो मुझे बेहतर करना होगा। कोई घमंड से आपकी आलोचना कीजिए तो मुस्कुराकर आगे बढ़ जाइए। मुकद्दर के आप सिकंदर निकले तो आप उनसे ऊंचे पलड़े पर होंगे। तब आप याद रखें कि क्षमा सबसे बड़ा दान है।
अमेठी के बारे में और क्या कहना चाहेंगी?
स्मृति जुबिन ईरानी ने जवाब देते हुए कहा कि 2014 से पहले अमेठी में भाजपा को 30 हजार वोट मिलते थे। मैंने 22 दिन में प्रचार किया। 1800 में से 1200 बूथ पहुंची। दिन में 35 जगह भाषण दिए। 30 हजार का वोट बढ़कर तीन लाख हो गया था। 60 फीसदी बूथ पर कुर्सी पर बैठने के लिए लोग नहीं थे। 2019 में लोगों का हुजूम ऐसा जुड़ गया कि उन बूथों पर इक्का-दुक्का लोग मिले जो बैठ सकते थे। बूथ पर बैठना यानी गली या मोहल्ले में खुद पर और परिवार के सिर पर जोखिम मोल लेना होता है। 2024 में आप बूथ पर जाएंगे तो 60 हजार लोग मिलेंगे। लोग पैसे से नहीं जुड़ते। मंचों पर नेता के साथ रहना आसान है। गांव-गली में दहशत के सामने कुर्सी लगाकर बैठना मुश्किल है।