मायावती की राह चले अखिलेश यादव, 'एक राष्ट्र- एक चुनाव' पर बैठक से किया किनारा
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सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में दिल्ली में होने वाली 'एक राष्ट्र- एक चुनाव' की बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे। हालांकि, पहले अखिलेश यादव के बैठक में शामिल होने की बातें कही जा रही थीं। अखिलेश यादव ने अपने बयान में कहा कि अब सरकार को चुनाव में किए हुए वादों को पूरा करने पर ध्यान लगाना चाहिए। कई पार्टियां एक राष्ट्र एक चुनाव के मुद्दे पर सहमत नहीं हैं।
गौरतलब है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस बैठक में न शामिल होने का निर्णय लिया है। उन्होंने ट्वीट कर अपने फैसले की जानकारी दी और कहा कि इस समय चुनाव में ईवीएम की भूमिका को लेकर जनता का भरोसा लगातार कम होता जा रहा है ऐसे में अगर बैलेट से चुनाव करवाने के मुद्दे पर बैठक होती तो जरूर जाती।
खास बात है कि अखिलेश यादव दिल्ली में ही हैं फिर भी वह बैठक में भाग नहीं ले रहे हैं जबकि मायावती लखनऊ आ चुकी हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक राष्ट्र- एक चुनाव के मुद्दे पर बुधवार को दिल्ली में विपक्षी दलों से चर्चा करेंगे।
प्रदेश की योगी सरकार ने मोदी के इस सुझाव पर पिछले साल ही व्यापक विचार-विमर्श कर राज्य की सहमति केंद्र सरकार को भेज दी थी। सरकार की ओर से गठित उच्च स्तरीय कमेटी ने 2024 तक विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने का सुझाव दिया था। 2029 से लोकसभा व विधानसभा के साथ पंचायत चुनाव भी साथ-साथ कराने के सुझाव दिए गए थे। विशेषज्ञों ने इस प्रयोग की तमाम खूबियां भी गिनाई थीं।
एक राष्ट्र एक चुनाव का यह बताया गया फॉर्मूला
- दिसंबर 2021 को केंद्रीय बिंदु माना जाए और 31 दिसंबर 2021 के पहले कार्यकाल पूरा करने वाली विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनाव 2019 के साथ कराए जाएं। इस पर अमल नहीं हो सका। इस पर नए सिरे से विचार करना होगा।
- दिसंबर 2021 के बाद कार्यकाल पूरा करने वाली विधानसभाओं के चुनाव 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ कराए जाएं।
- प्रस्तावित व्यवस्था से 2024 तक लोकसभा व विधानसभा चुनाव साथ-साथ हो सकते थे।
2029 में स्थानीय निकायों के चुनाव भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ कराएं।
राष्ट्रपति शासन लागू हो तो ऐसी हो व्यवस्था
विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति बने और विधानसभा का कार्यकाल कम रह गया हो तो राष्ट्रपति शासन लगा रहे। अगर कार्यकाल ज्यादा हो तो नए चुनावों में गठित विधानसभा का कार्यकाल पांच साल न होकर उतना ही हो जितना कार्यकाल शेष रह गया हो, उपचुनावों की तरह। अविश्वास प्रस्ताव के साथ विश्वास प्रस्ताव भी अनिवार्य किया जाए। अविश्वास प्रस्ताव तभी पारित माना जाए जब साथ में विश्वास प्रस्ताव भी पारित हो।