फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   akhilesh yadav's challenges and condition of SP.

तख्त ही नहीं हुकूमत भी चाहते हैं अखिलेश पर अपनों से ही मिल रही चुनौती!

Mon, 31 Oct 2016 02:12 PM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 31 Oct 2016 02:12 PM IST
विज्ञापन
akhilesh yadav's challenges and condition of SP.
अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala

समाजवादी पार्टी के अंदरूनी कलह पर शीर्ष नेताओं ने भले ही अभी चुप्पी साध ली है, लेकिन हकीकत ये है कि भीतर ही भीतर ये आग लगातार सुलग रही है। ये समस्या इसलिए भी समाप्त नहीं मानी जा रही क्योंकि पार्टी के भीतर इस झगड़े के सभी पहलुओं पर न तो सिलसिलेवार विचार हुआ न उसे सुलझाने की ईमानदार पहल हुई।

विज्ञापन


झगड़े के पीछे केवल शिवपाल और अखिलेश की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को मान लेना भी इस पूरे प्रकरण को सुलझाने की दिशा में हो रही सबसे बड़ी भूल है।

इस तूफानी विवाद के बाद बस इतना हुआ कि शिवपाल और उनके समर्थकों ने भी मान लिया कि मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में अखिलेश का दूसरा विकल्प फिलहाल उनके पास नहीं है।
विज्ञापन


इस एक बिंदु पर बुझे मन से समर्थन जताने के बावजूद शिवपाल समर्थकों में कसक बाकी है। शिवपाल को क्रांति नायक बताने वाले पोस्टरों के जरिए उनकी ये कसक सार्वजनिक भी होती रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


हालत ये है कि संगठन पर कब्जा जमाए बैठे शिवपाल और सरकार पर काबिज अखिलेश के बीच सामान्य संवाद शुरू होने की संभावना कम और स्थिति इसके प्रतिकूल हो जाने की अधिक दिखाई दे रही है।

रथयात्रा को लेकर भी नहीं मिल रहे उत्साहजनक संकेत

akhilesh yadav's challenges and condition of SP.
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala

क्या शिवपाल और उनके समर्थक ये भुला पाएंगे कि प्रदेश अध्यक्ष की हैसियत से पवन पांडेय को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर उनकी सिफारिश पर मुख्यमंत्री ने चुप्पी ओढ़ ली है?

क्या अखिलेश और उनके साथ खड़े नौजवान सपाइयों का यह दर्द कमतर है कि रथयात्रा के एलान के बावजूद पार्टी की ओर से कोई उत्साहजनक संकेत नहीं मिल रहे हैं?

सरकार और संगठन के बीच इस संवादहीनता का असली नजारा तो पहले 3 नवंबर की रैली में दिखेगा। वैसे भी ये संदेश तो जनता के बीच चला ही गया है कि अखिलेश को मुख्यमंत्री का चेहरा बताने वाली पार्टी सपा के बजाय यह आयोजन मूल रूप से जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट की अगुवाई में हो रहा है।

इस बात की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इसके छींटे दो दिन बाद होने वाले रजत जयंती समारोह में नहीं पड़ेंगे। यह तो पहले से ही तय है कि अखिलेश के कुछ खास समर्थक इस जयंती समारोह से पहले ही दूरी बनाने की बात कह चुके हैं।

ऐसे में तीसरी धारा के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी के बावजूद सपा का ये मंच क्या संदेश देगा, इसपर फिलहाल कोई टिप्पणी मुनासिब नहीं। यूपी के सियासी माहौल पर नजर रखने वाले इसका अनुमान काफी बेहतर लगा रहे हैं और शायद वे सही भी साबित हों।

सिर्फ तख्त नहीं, अपनी हुकूमत भी चाहते हैं अखिलेश

akhilesh yadav's challenges and condition of SP.

सपा के भीतर दोनों धड़ों के बीच टकराव के बिंदु केवल यही नहीं हैं। असल सवाल इससे कहीं आगे केहैं और बेहद अहम भी। दरअसल, अखिलेश केवल तख्त नहीं चाहते अपनी हूकूमत भी चाहते हैं। अपनी सत्ता भी चाहते हैं।

वो चाहते हैं कि पार्टी ऐसा कोई भी फैसला नहीं ले जिनको लेकर उन्हें जनता या विरोधियों के सवालों का सामना करना पड़े। वे उन सवालों पर अब भी कायम रहना चाहते हैं जिनकी वजह से जनता ने उन्हें सिर माथे बैठाया था।

...और इन सवालों में सबसे बड़ा सवाल है,आपराधिक चरित्र के लोगों का पार्टी में शामिल करना या उन्हें पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर पेश करना। लेकिन उनकी पार्टी शायद उनसे ये चाहती है कि वो तख्त पर तो बैठे रहे लेकिन उनके तई होने वाले फैसले कोई और करता रहे। और कुछ भी फैसला करता रहे।

सोच का यही फर्क लड़ाई की दूसरी बड़ी वजह है। अगले चुनाव में अखिलेश का चेहरा जितना अहम है उतना ही अहम ये है कि पार्टी अपने किस चरित्र को लेकर चुनाव मैदान में उतरती है। अखिलेश चाहते हैं कि दागी और विवादित चेहरों को अधिक तवज्जो नहीं दिया जाए जबकि उनके संगठन को चुनाव जीतने के लिए किसी से भी परहेज नहीं।

अखिलेश के फैसले नहीं हैं सर्वोपरि

akhilesh yadav's challenges and condition of SP.

अखिलेश सपा के इस सोच में बदलाव के पैरोकार के तौर पर उभरते दिखाई दे रहे हैं। लेकिन हाल के घटनाक्रम से जनता के बीच यही संदेश गया है कि अखिलेश मुख्यमंत्री तो हैं लेकिन उनके सभी फैसले सर्वोपरि नहीं हैं।

अखिलेश ने विवादों से घिरे कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रजापति को बाहर का रास्ता तो दिखा दिया लेकिन कुछ दिनों के भीतर उन्हें फिर से शपथ दिलाना पड़ा। अखिलेश केदबाव में जिस कौमी एकता दल का सपा में विलय रद्द हो गया था, उसे दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया गया।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में शिवपाल की नियुक्ति के बाद ऐसे कई फैसले हुए जिन्हें अखिलेश की स्थायी छवि को नुकसान पहुंचा। इतना ही नहीं अखिलेश के समर्थक युवा साथियों को भी पार्टी से बेदखल कर दिया गया। इतना सब होने की वजह से अखिलेश एक मजबूर और विवश मुख्यमंत्री के तौर पर दिखने लगे।

ऐसी परिस्थिति बन जाने के बाद अखिलेश और उनके समर्थकों में खलबली मच जाना स्वाभाविक ही था। पार्टी में खेमेबंदी की लकीरें खिंचने लगीं। कौन किसके साथ, इसके चर्चे शुरू होने लगे। और आखिरकार विभाजन को लेकर भी खबरें उड़ने लगीं।

नई पार्टी बनाने की खबरों से सपा नेतृत्व के कान खड़े

akhilesh yadav's challenges and condition of SP.

सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों में नई पार्टी से लेकर उसके सिंबल और चुनाव आयोग तक बात पहुंचने की खबरों ने जब खलबली मचाई तो सपा नेतृत्व के कान खड़े हुए।

चुनाव करीब आते ही अहम हुई पार्टी
दरअसल चुनाव करीब आते ही टिकट बंटवारे की वजह से पार्टी की भूमिका अहम हो गई। वरना चार साल से भी ज्यादा वक्त तक किसी को याद भी नहीं था कि प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी खुद मुख्यमंत्री के पास ही सुरक्षित है।

खुद मुख्यमंत्री सरकार के कामकाज को लेकर इतने मसरूफ रहे कि संगठन की ओर अधिक ध्यान ही नहीं दिया। सत्ताधारी पार्टी की अपने संगठन को लेकर उदासीनता सर्वविदित है। 2012 में सरकार बनने के बाद कोलकाता और आगरा में राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित करने के अलावा पार्टी ने कभी कोई औपचारिक-अनौपचारिक बैठक नहीं बुलाई जिसमें संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने या उसको आगे बढ़ाने को लेकर कोई बड़ी चर्चा हुई हो।

चुनाव से पहले मुलायम सिंह की ओर से विधायक दल और प्रमुख नेताओं की बुलाई बैठक में क्या हुआ यह तो सभी देख ही चुके हैं।

पहले अनुशासनहीनता नहीं रहा है कोई मुद्दा

akhilesh yadav's challenges and condition of SP.

पार्टी के भीतर अनुशासनहीनता की घटनाओं को भी पहले कभी खास तवज्जो नहीं दी गई, जिससे जनता में पार्टी को लेकर गलत संदेश गया। जिला अध्यक्षों की नियुक्ति भी मनमाने और अनमने तरीके से होती रही।

शिकायतों के आधार पर थोड़े बहुत बदलाव भी हुए पर इसे लेकर ठोस नीति या रणनीति नहीं दिखी। यहां तक कि अभी तक जो टिकट बांटे गए हैं उसे लेकर भी कोई लोकतांत्रित तौर-तरीका नहीं अपनाया गया।

पार्टी के भीतर संगठन को लेकर यही तदर्थवाद फिलहाल सबसे बड़ी मुसीबत बनी है। अब जबकि चुनाव करीब हैं तो संगठन और उसके अधिकारों की लड़ाई तेज हो गई है। टिकट बंटवारे में अखिलेश अपनी अहम भूमिका पर जोर दे रहे हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि अगली बार उनकी पसंद के लोग ही चुनकर विधानसभा पहुंचें और अगली सरकार वे अपने हिसाब से चला सकें।

लेकिन पार्टी फिलहाल अपने सीएम चेहरे को इतना ताकतवर छोड़ देने के मूड में नहीं। देखना दिलचस्प होगा कि अगले कुछ दिनों में ताजा घटनाक्रम क्या मोड़ लेता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed