रायबरेली रेल हादसा: पीड़ित बोले-अचानक ऐसा लगा जैसे बवंडर आ गया
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न्यू फरक्का एक्सप्रेस की जनरल बोगी में ज्यादातर बिहार के वे लोग थे जो दिल्ली और आसपास के इलाके में गरीबी की जंग लड़ने जा रहे थे। कोई गमछा बिछाकर फर्श पर लेटा था तो कोई अपने बच्चे का हाथ पकड़ कर खड़ा था। कुछ लोग जाग रहे थे तो कुछ अलसाए से थे। कुछ दरवाजे के पास खड़े थे।
अचानक लगा जैसे बवंडर आ गया। तेजी से खड़खड़ाहट की आवाज हुई। ऊपर की सीट पर सो रहे लोग नीचे गिरने लगे। ऊपर रखा सामान और गठरी भी गिर पड़ी। कुछ देर तो समझ में ही नहीं आया कि किधर से यात्री गिर रहे हैं और किधर से गठरी। तब तक चीख पुकार मच गई और धम्म से बोगी भी गिर पड़ी। रेल हादसे में घायल और उन्हें लेकर केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर पहुंचने वाले रिश्तेदारों ने इन्हीं शब्दों में अपनी दास्तां सुनाई।
ट्रॉमा सेंटर पहुंचे पांच घायलों में बातचीत करने की स्थिति में सिर्फ पिंटू है। बिहार के भभुआ जिले के नराव गांव के14 लोग बरेली राइस मिल में काम करने जा रहे थे। इन्होंने वाराणसी से ट्रेन पकड़ी। रात में भीड़ ज्यादा थी। तड़के कुछ लोग इधर-उधर हुए तो पिंटू की टोली ने आराम करने के लिए फर्श पर गमछा बिछा दिया। हादसे में पिंटू का दाहिना पैर टूट गया है। वह बताता है कि आंख लगी ही थी कि तेज झटका लगा और ऊपर वाले नीचे गिर पड़े।
महिलाएं बच्चों को लेकर कूद पड़ीं
सुबह हो गई थी। जाग रहा था। खड़खड़ाहट हुई तो लगा पहिए में कोई दिक्कत आ गई है। तब तक आगे वाली बोगी से लोग चीखने लगे और अगले पल हमारी बोगी भी गिर पड़ी। लोगों को भागते देख गेट की ओर दौड़ा, लेकिन वहां इतने ज्यादा लोग थे कि निकलने में पांच मिनट लग गए। मेरा झोला बोगी में छूट गया। कुछ महिलाएं बच्चों को लेकर कूद पड़ीं। जो बच्चे रह गए उन्हें बाद में निकाला गया।
खिड़की से बाहर निकला
बोगी पलटने के बाद हर तरफ अफरा-तफरी मच गई। सभी गेट की तरफ भागे। किसी की बुद्धि काम नहीं कर रही थी कि क्या करें। हमने पहले गेट की ओर भागने की कोशिश की। देखा समय ज्यादा लग रहा है। फिर खिड़की टूटी देखी तो रास्ता सूझा। उसी से बाहर निकल आया। हमारे निकलने के बाद कई लोग खिड़की से बाहर निकले।
शायद ही कोई सही सलामत बचा हो