यूपी चुनाव 2022: विकास का मुद्दा छोड़ जातिगत सियासत की राह पर चली आम आदमी पार्टी
आम आदमी पार्टी ने यूपी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए जातीय मुद्दों को उठाना शुरू कर दिया है। पहले ठाकुरों के मुद्दे पर और अब ब्राह्मण मुद्दों पर आप की रणनीति को इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
विकास के नए मॉडल के दम पर दिल्ली में लगातार तीन बार सरकार बना चुकी आम आदमी पार्टी (आप) यूपी में जड़ जमाने के लिए जातिगत राजनीति का भी सहारा ले रही है। यूपी में पार्टी का सियासी आधार तैयार करने की जिम्मेदारी उठाने वाले रणनीतिकार पहले ठाकुरों को आधार बनाकर सरकार पर हमला कर रहे थे। अब बिकरू कांड के मामले में जेल में बंद खुशी दुबे का मुद्दा उठाकर भाजपा सरकार पर हमलावर होने को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
आप के प्रदेश प्रभारी संजय सिंह और अन्य नेता एक माह से जिस तरह से ब्राह्मण उत्पीड़न को लेकर योगी सरकार पर हमलावर हैं, उससे यह साफ है कि आप भी अब अन्य दलों की तरह जातिगत समीकरण साधकर अपनी फिजां बनाना चाहती है। हालांकि आप को जातिगत राजनीति का कितना लाभ मिलेगा, यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन जातिगत मुद्दों को लेकर उसकी मुखर सक्रियता ने प्रदेश की सियासत में जातिगत समीकरणों की अहमियत को फिर से उजागर कर दिया है।
विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद से ही आप के रणनीतिकार इस मुद्दे पर सरकार को लगातार घेरकर ब्राह्मणों की संवेदना कुरेदने का प्रयास कर रहे हैं। अब खुशी दुबे की जेल से रिहाई का मुद्दा उछालने की कोशिश में जुटी है। माना जा रहा है कि इसके पीछे आप नेताओं की मंशा प्रदेश की कुल आबादी में 12 से 15 फीसदी ब्राह्मणों को किसी न किसी तरह अपने पाले में खड़ा करने की है।
14 साल बाद वापसी ब्राह्मणों की लामबंदी का ही परिणाम
दरअसल, प्रदेश में कांग्रेस के कमजोर होने के बाद ब्राह्मणों की पहली पसंद भाजपा रही है। भाजपा से ब्राह्मणों की नाराजगी का फायदा उठाकर पहले भी बसपा और सपा सरकार बना चुके हैं। करीब 14 साल बाद प्रदेश की सत्ता में भाजपा की वापसी में भी ब्राम्हणों की लामबंदी ही मुख्य आधार रहा है।
ऐसे में आप को लगता है कि जिस तरह ब्राह्मणों की नाराजगी मुखर होती रहती है, उसके चलते यदि सहानुभूति के सहारे जगह बना ली जाए तो विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी को फायदा हो सकता है।
राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी कहते हैं कि आजादी के पहले ही वर्ष 1919 में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के साथ अंग्रेजों ने संसदीय परिपाटी में जातीय तत्व के समावेश का रास्ता खोल दिया था। उत्तर प्रदेश की बात करें तो चौधरी चरण सिंह से लेकर मुलायम सिंह यादव और कांशीराम सभी ने यही किया।