{"_id":"5953de2f4f1c1b0f108b46db","slug":"31498668591-lucknow-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कुपोषण की राह में रोड़ा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कुपोषण की राह में रोड़ा
Updated Wed, 28 Jun 2017 11:31 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
खर्च होते 150 रुपये, प्रोत्साहन राशि मिलते 50
कुपोषित बच्चों के इलाज में रोड़ा बन रहा कम शुल्क
दूरदराज से जिला अस्पताल आने से परहेज करतीं आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता
कुपोषण के अभियान में रोड़ा
इस साल 51 लोग नहीं लेने पहुंचे प्रोत्साहन राशि
अमर उजाला ब्यूरो
सीतापुर। बच्चों को कुपोषण मुक्त बनाने की योजना में प्रोत्साहन राशि रोड़ा बन रही है। खर्च के मुकाबले प्रोत्साहन राशि कम मिलने से लोग कुपोषित बच्चों को अस्पताल पहुंचाने से परहेज कर रहे हैं। ऐसे में कुपोषण मुक्त भारत बनाने की सरकार की पहल पर संकट मंडरा सकता है। हालत ये है कि उस प्रोत्साहन राशि को पाने के लिए न तो आशा बहू और न ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कोई प्रयास कर रहे हैं।
45 लाख से अधिक आबादी वाले इस जिले में करीब 19 विकास खंड हैं। जबकि 20 सामुदायिक व 61 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। जिले में कुपोषण पांव न पसारने पाए, इसको लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर इलाज की व्यवस्था है। स्वास्थ्य केंद्रों पर अगर बात न बने तो जिला अस्पताल में कुपोषण विभाग ही खोल दिया गया है। जहां पर दस बेड हैं और उन पर कुपोषित बच्चों का इलाज किया जाता है। कुपोषित बच्चों को चिह्नित करने के लिए आशा बहू, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम व क्षेत्र के स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सकों को जिम्मेदारी दी गई है। यदि कुपोषित बच्चों को आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता जिला अस्पताल के कुपोषित सेंटर में लेकर जाती है, तब उसे एक मरीज के एवज में 50 रुपये का प्रोत्साहन शुल्क दिया जाता है। जबकि कुपोषित सेंटर से बच्चे को घर भेजने के बाद चार बार फॉलोअप के लिए कुपोषण सेंटर पर बुलाया जाता है। फॉलोअप के लिए प्रति चक्कर 25 रुपये का प्रोत्साहन शुल्क है। ऐसे में जिले के दूरदराज इलाके में काम करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहू बच्चों को जिला अस्पताल पहुंचाने से तौबा कर रही हैं। हालत ये है कि 2016-17 में करीब 51 आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपना प्रोत्साहन शुल्क लेने ही नहीं पहुंचे। नाम न छापने की शर्त पर कई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहू ने बताया कि जितना प्रोत्साहन शुल्क मिलता है, उससे चार गुना तो खर्च हो जाता है। ऐसे में वे अस्पताल जाने से परहेज करती हैं। यहां बता दें कि अगर तंबौर क्षेत्र से सीतापुर का बस से सफर किया जाए तो एक यात्री का एक तरफ का किराया ही 45 रुपये बैठता है। जबकि रेउसा क्षेत्र से जिला मुख्यालय जाने का किराया 56 रुपये है। ऐसे में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहुओं का कहना है कि एक तो पूरा दिन खराब होता है। कुछ भी न करो, तब भी 100 रुपये जरूर खर्च हो जाते हैं। जबकि प्रोत्साहन शुल्क 50 रुपये ही मिलता है। फॉलोअप में तो वह 25 रुपये ही हो जाता है। कहने को तो अस्पताल ले जाने व वापस आने के लिए 102 व 108 नंबर एंबुलेंस मिलती हैं, लेकिन जब जिला अस्पताल में बच्चे को भर्ती करा दो, तब वापसी के लिए एंबुलेंस संचालकों की खुशामद करनी पड़ती है। नतीजतन वे इस झंझट से बचना चाहती हैं। यही वजह है कि कुपोषण के इलाज को लेकर जिम्मेदार बेपरवाह होते जा रहे हैं। तमाम आशा बहुओं व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को प्रोत्साहन राशि 50 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये कर देनी चाहिए। फॉलोअप केे समय भी 300 रुपये मिलने चाहिए।
इतना हो जाता है खर्च
यदि आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रेउसा क्षेत्र से जिला अस्पताल पहुंचती है, तो उसे वापस जाने के लिए 10 रुपये ऑटो से रोडवेज बस स्टाप तक पहुंचने के लिए खर्च करने पड़ेंगे। जबकि रेउसा जाने के लिए बस का किराया 56 रुपये है। ऐसे में सफर के दौरान 25 से 50 रुपये खाने व नाश्ते में भी खर्च करने पड़ेंगे। 116 खर्च होंगे जबकि उसे बदले में 50 रुपये ही मिलेंगे। ऐसे में कौन रुचि लेगा, यह समझ से परे है।
विज्ञापन
बैंक खाते में होता भुगतान
सबसे बड़ी बात तो यह है कि सरकार योजना की प्रोत्साहन राशि का भुगतान बैंक अकाउंट में करती है। ऐसे में राशि को पाने के लिए आशा बहू व आंगनबाड़ी को अपना बैंक अकाउंट नंबर अस्पताल में देना होता है। उसी अकाउंट नंबर पर जिम्मेदार अधिकारी प्रोत्साहन राशि का भुगतान करते हैं। प्रोत्साहन राशि का नकद न मिलना भी आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को परेशानी में डालता है। जिसकी वजह से वे इस योजना से दूरी बनाने में ही भलाई समझती हैं।
यह भी है झंझट
यहां बता दें कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले कुपोषित बच्चे को जिला अस्पताल लाने से पहले निकट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरूरी है। जिसके बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से सरकारी एंबुलेंस मिलती है। ऐसे में बहुत से क्षेत्र ऐसे होते हैं, जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से 12 से 20 किलोमीटर दूर तक होते हैं। जिसकी वजह से आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
...
2015 में 52 मरीजों को जिला अस्पताल लेकर आया गया। इनमें 33 आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने प्रोत्साहन शुल्क लिया, जबकि 19 ने इस राशि को लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई। तब प्रोत्साहन राशि 100 रुपये व फॉलोअप राशि 50 रुपये थी। 2016 में यह राशि 100 से घटाकर 50 रुपये व फॉलोअप 50 से घटाकर 25 रुपये कर दिए गए । 2016-17 में कुल 67 मरीज जिला अस्पताल पहुंचाए गए। इनमें 16 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहुओं ने ही प्रोत्साहन राशि ली। जबकि 51 ने इस राशि के लिए प्रयास में कोई रुचि नहीं दिखाई।
नियमानुसार हो रहा काम
सरकार ने योजना के तहत जो राशि तय की है, उसका भुगतान नियमानुसार किया जा रहा है। यह सच है कि अधिकांश आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहुओं ने प्रोत्साहन राशि पाने के लिए अपने खाता नंबर उपलब्ध नहीं कराए। आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व आशा बहुओं की यह शिकायत भी सत्य है कि जिला अस्पताल से घर जाने के लिए एंबुलेंस बड़ी मुश्किल से मिलती हैं।
डॉ. एके गौतम, सीएमएस
विज्ञापन
कुपोषित बच्चों के इलाज में रोड़ा बन रहा कम शुल्क
दूरदराज से जिला अस्पताल आने से परहेज करतीं आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता
कुपोषण के अभियान में रोड़ा
इस साल 51 लोग नहीं लेने पहुंचे प्रोत्साहन राशि
अमर उजाला ब्यूरो
सीतापुर। बच्चों को कुपोषण मुक्त बनाने की योजना में प्रोत्साहन राशि रोड़ा बन रही है। खर्च के मुकाबले प्रोत्साहन राशि कम मिलने से लोग कुपोषित बच्चों को अस्पताल पहुंचाने से परहेज कर रहे हैं। ऐसे में कुपोषण मुक्त भारत बनाने की सरकार की पहल पर संकट मंडरा सकता है। हालत ये है कि उस प्रोत्साहन राशि को पाने के लिए न तो आशा बहू और न ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कोई प्रयास कर रहे हैं।
45 लाख से अधिक आबादी वाले इस जिले में करीब 19 विकास खंड हैं। जबकि 20 सामुदायिक व 61 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। जिले में कुपोषण पांव न पसारने पाए, इसको लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर इलाज की व्यवस्था है। स्वास्थ्य केंद्रों पर अगर बात न बने तो जिला अस्पताल में कुपोषण विभाग ही खोल दिया गया है। जहां पर दस बेड हैं और उन पर कुपोषित बच्चों का इलाज किया जाता है। कुपोषित बच्चों को चिह्नित करने के लिए आशा बहू, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम व क्षेत्र के स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सकों को जिम्मेदारी दी गई है। यदि कुपोषित बच्चों को आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता जिला अस्पताल के कुपोषित सेंटर में लेकर जाती है, तब उसे एक मरीज के एवज में 50 रुपये का प्रोत्साहन शुल्क दिया जाता है। जबकि कुपोषित सेंटर से बच्चे को घर भेजने के बाद चार बार फॉलोअप के लिए कुपोषण सेंटर पर बुलाया जाता है। फॉलोअप के लिए प्रति चक्कर 25 रुपये का प्रोत्साहन शुल्क है। ऐसे में जिले के दूरदराज इलाके में काम करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहू बच्चों को जिला अस्पताल पहुंचाने से तौबा कर रही हैं। हालत ये है कि 2016-17 में करीब 51 आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपना प्रोत्साहन शुल्क लेने ही नहीं पहुंचे। नाम न छापने की शर्त पर कई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहू ने बताया कि जितना प्रोत्साहन शुल्क मिलता है, उससे चार गुना तो खर्च हो जाता है। ऐसे में वे अस्पताल जाने से परहेज करती हैं। यहां बता दें कि अगर तंबौर क्षेत्र से सीतापुर का बस से सफर किया जाए तो एक यात्री का एक तरफ का किराया ही 45 रुपये बैठता है। जबकि रेउसा क्षेत्र से जिला मुख्यालय जाने का किराया 56 रुपये है। ऐसे में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहुओं का कहना है कि एक तो पूरा दिन खराब होता है। कुछ भी न करो, तब भी 100 रुपये जरूर खर्च हो जाते हैं। जबकि प्रोत्साहन शुल्क 50 रुपये ही मिलता है। फॉलोअप में तो वह 25 रुपये ही हो जाता है। कहने को तो अस्पताल ले जाने व वापस आने के लिए 102 व 108 नंबर एंबुलेंस मिलती हैं, लेकिन जब जिला अस्पताल में बच्चे को भर्ती करा दो, तब वापसी के लिए एंबुलेंस संचालकों की खुशामद करनी पड़ती है। नतीजतन वे इस झंझट से बचना चाहती हैं। यही वजह है कि कुपोषण के इलाज को लेकर जिम्मेदार बेपरवाह होते जा रहे हैं। तमाम आशा बहुओं व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को प्रोत्साहन राशि 50 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये कर देनी चाहिए। फॉलोअप केे समय भी 300 रुपये मिलने चाहिए।
विज्ञापन
इतना हो जाता है खर्च
यदि आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रेउसा क्षेत्र से जिला अस्पताल पहुंचती है, तो उसे वापस जाने के लिए 10 रुपये ऑटो से रोडवेज बस स्टाप तक पहुंचने के लिए खर्च करने पड़ेंगे। जबकि रेउसा जाने के लिए बस का किराया 56 रुपये है। ऐसे में सफर के दौरान 25 से 50 रुपये खाने व नाश्ते में भी खर्च करने पड़ेंगे। 116 खर्च होंगे जबकि उसे बदले में 50 रुपये ही मिलेंगे। ऐसे में कौन रुचि लेगा, यह समझ से परे है।
विज्ञापन
बैंक खाते में होता भुगतान
सबसे बड़ी बात तो यह है कि सरकार योजना की प्रोत्साहन राशि का भुगतान बैंक अकाउंट में करती है। ऐसे में राशि को पाने के लिए आशा बहू व आंगनबाड़ी को अपना बैंक अकाउंट नंबर अस्पताल में देना होता है। उसी अकाउंट नंबर पर जिम्मेदार अधिकारी प्रोत्साहन राशि का भुगतान करते हैं। प्रोत्साहन राशि का नकद न मिलना भी आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को परेशानी में डालता है। जिसकी वजह से वे इस योजना से दूरी बनाने में ही भलाई समझती हैं।
यह भी है झंझट
यहां बता दें कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले कुपोषित बच्चे को जिला अस्पताल लाने से पहले निकट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरूरी है। जिसके बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से सरकारी एंबुलेंस मिलती है। ऐसे में बहुत से क्षेत्र ऐसे होते हैं, जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से 12 से 20 किलोमीटर दूर तक होते हैं। जिसकी वजह से आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
...
2015 में 52 मरीजों को जिला अस्पताल लेकर आया गया। इनमें 33 आशा बहू व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने प्रोत्साहन शुल्क लिया, जबकि 19 ने इस राशि को लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई। तब प्रोत्साहन राशि 100 रुपये व फॉलोअप राशि 50 रुपये थी। 2016 में यह राशि 100 से घटाकर 50 रुपये व फॉलोअप 50 से घटाकर 25 रुपये कर दिए गए । 2016-17 में कुल 67 मरीज जिला अस्पताल पहुंचाए गए। इनमें 16 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहुओं ने ही प्रोत्साहन राशि ली। जबकि 51 ने इस राशि के लिए प्रयास में कोई रुचि नहीं दिखाई।
नियमानुसार हो रहा काम
सरकार ने योजना के तहत जो राशि तय की है, उसका भुगतान नियमानुसार किया जा रहा है। यह सच है कि अधिकांश आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व आशा बहुओं ने प्रोत्साहन राशि पाने के लिए अपने खाता नंबर उपलब्ध नहीं कराए। आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों व आशा बहुओं की यह शिकायत भी सत्य है कि जिला अस्पताल से घर जाने के लिए एंबुलेंस बड़ी मुश्किल से मिलती हैं।
डॉ. एके गौतम, सीएमएस