{"_id":"597a15ac4f1c1bd9268b4744","slug":"161501173164-lucknow-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"जागरूकता से ही हेपेटाइटिस पर नियंत्रण संभव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जागरूकता से ही हेपेटाइटिस पर नियंत्रण संभव
Updated Thu, 27 Jul 2017 10:30 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हेपेटाइटिस एक गंभीर बीमारी है जिससे हर साल कई लोगों की मौत भी होती रहती है। जानकारों की मानें तो प्रत्येक 12 व्यक्तियों में एक व्यक्ति हेपेटाइटिस की बीमारी से ग्रसित होता है। डॉ. जिला प्रतिरक्षण अधिकारी राकेश अग्रवाल के मुताबिक हेपेटाइटिस की ज्यादातर बीमारी एल्कोहल (शराब) के सेवन से होती है, जो आगे चलकर लीवर सिरोसिस या फिर लीवर कैंसर जैसी बीमारियों में तब्दील हो जाती है। बच्चों को इस बीमारी से बचाने के लिए पहले जहां हेपेटाइटिस बी का टीका लगाया जाता था तो वहीं अब सी का भी टीका लगने लगा है जबकि बड़ों को भी इस बीमारी से बचाने के लिए टीके की व्यवस्था है। बावजूद इसके हेपेटाइटिस के शिकार लोगों की जान इस बीमारी के उपचार में देरी और जागरूकता के अभाव में चली जाती है। ऐसे में जरूरत है तो इस बीमारी के प्रति लोगों के जागरूक होने की, क्योंकि बिना इसके बीमारी पर अंकुश लग पाना मुमकिन नहीं है। पेश है रिपोर्ट-
क्या है हेपेटाइटिस
हेपेटाइटिस लीवर को हानि पहुंचाने वाला एक खतरनाक रोग है। जिससे शरीर की कोशिकाओं में सूजन आ जाती है और आगे चलकर यही पीलिया का रूप ले लेती है जिससे लीवर में घाव होने लगता है। छह महीने से अधिक समय तक इस बीमारी से पीड़ित मरीज को आगे चलकर लीवर सिरोसिस या फिर लीवर कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं जिससे उसकी जान तक चली जाती है। हेपेटाइटिस की बीमारी मुख्यत: पांच प्रकार ए, बी, सी, डी व ई टाइप की होती है। जिसका फौरी उपचार न होने पर यह बीमारी दीर्घकालिक होने के साथ पूरे लीवर को डैमेज कर देती है।
शराब के सेवन से रहता खतरा
अधिकांशत: एल्कोहल सम्बंधी पेय पदार्थों में पाया जाना वाला इथेनॉल हेपेटाइटिस का एक महत्वपूर्ण कारण है। आम तौर पर एल्कोहल से होने वाला हेपेटाइटिस एल्कोहल के बढ़ते हुए सेवन के फलस्वरूप होता है। लंबे समय तक एल्कोहल का सेवन करने वाले लोगों में अन्य हेपेटाइटिस मरीजों की अपेक्षा हेपेटाइटिस सी पाया जाता है जिससे लीवर सिरोसिस नामक बीमारी होने का खतरा ज्यादा रहता है।
विज्ञापन
हेपेटाइटिस के लक्षण
शरीर में दर्द, कमजोरी, भूख कम लगना, उल्टी, कब्ज, गहरे रंग की पेशाब आना, हल्के रंग का मल होना, बुखार, सिर दर्द, पेटदर्द, शरीर में पीलापन आ जाना, खुजली होना, जोड़ों में दर्द, खून की उल्टी, मलाशय से रक्त आना, वजन कम होना।
ऐसे फैलता हेपेटाइटिस
दूषित इंजेक्शन के प्रयोग, शरीर पर गोदना, छेदना व नशीली दवाईयों के प्रयोग से, गुर्दे की डायलिसिस, एक से ज्यादा व्यक्ति के साथ असुरक्षित संभोग, गर्भवती माता से शिशु में, शरीर के किसी अंग के प्रत्यारोपण से, दूषित भोजन व जल के सेवन आदि से।
बीमारी से बचाव
परहेज के जरिए हेपेटाइटिस से बचा जा सकता है। साथ ही इंटरफे रोन, राइबावोरिन, अमान्टिडिन नामक दवाइयां ही इस बीमारी के लिए बाजार में उपलब्ध हैं। जबकि संजीदा रोगियों के लिए इस बीमारी से बचने का एक मुख्य उपाय लीवर प्रत्यारोपण है।
जन्म लेने के 24 घंटे में लगता हेपेटाइटिस बी का टीका
संस्थागत (सरकारी अस्पतालों) में जितने भी प्रसव होते हैं, उन सभी में बच्चे के जन्म लेते ही 24 घंटे के भीतर बच्चे के हेपेटाइटिस बी का टीका लगा दिया जाता है। जबकि एक साल के बच्चे को पेंटाबैलेंट नामक टीका लगाया जाता है। जो पांच तरह की बीमारियों गलघोंटू, कालीखांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी व हीमोफीलस व्इंफ्ल्एंजी बी की रोकथाम करता है। पेंटाबैलेंट का इंजेक्शन स्वास्थ्य विभाग की हर सीएचसी-पीएचसी पर हर बुधवार और शनिवार को लगाया जाता है। जिसकी 6 हफ्ते में पहली डोज, 10 हफ्ते पर दूसरी और 14 हफ्ते पर तीसरी डोज बच्चे को दी जाती है। 10 साल के बच्चे को टिटनेस व टाक्साइड का इंजेक्शन लगता है। स्वास्थ्य विभाग में अब तक दो बार इसे लेकर व्यापक स्तर पर अभियान चलाया गया है। जिसमें हर किसी को हेपेटाइटिस के इंजेक्शन लगाए गए।
दो बार चलाया गया व्यापक अभियान
सरकारी अस्पतालों में हेपेटाइटिस की रोकथाम के लिए अब तक दो बार बड़े व्यापक स्तर पर इसका अभियान चलाकर घर-घर बच्चे, बड़ों को इसका इंजेक्शन लगाया गया। जबकि जन्म लेने के 24 घंटे के भीतर व साल भर के बच्चे को हेपेटाइटिस के इंजेक्शन नियमित रूप से हर जगह लगाए जा रहे हैं। -डॉ. राकेश अग्रवाल, जिला प्रतिरक्षण अधिकारी
बड़ों की मौत का कोई रिकार्ड नहीं
जिले में हेपेटाइटिस से पांच साल के भीतर कितनी मौतें हुई हैं, इसका कोई रिकार्ड उनके पास नहीं है। क्योंकि हेपेटाइटिस से पीड़ित लीवर सिरोसिस या फिर लीवर कैंसर के मरीज जैसे ही यहां आते हैं उन्हें उपचार के लिए हायर सेंटर जैसे राममनोहर लोहिया, मेडिकल कॉलेज, पीजीआई रिफर कर दिया जाता है। इसलिए इससे सम्बंधित मौतों का कोई रिकार्ड विभाग के पास नहीं रहता। - डॉ.रतन कुमार, सीएमएस जिला अस्पताल गोंडा
विज्ञापन
क्या है हेपेटाइटिस
हेपेटाइटिस लीवर को हानि पहुंचाने वाला एक खतरनाक रोग है। जिससे शरीर की कोशिकाओं में सूजन आ जाती है और आगे चलकर यही पीलिया का रूप ले लेती है जिससे लीवर में घाव होने लगता है। छह महीने से अधिक समय तक इस बीमारी से पीड़ित मरीज को आगे चलकर लीवर सिरोसिस या फिर लीवर कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं जिससे उसकी जान तक चली जाती है। हेपेटाइटिस की बीमारी मुख्यत: पांच प्रकार ए, बी, सी, डी व ई टाइप की होती है। जिसका फौरी उपचार न होने पर यह बीमारी दीर्घकालिक होने के साथ पूरे लीवर को डैमेज कर देती है।
विज्ञापन
शराब के सेवन से रहता खतरा
अधिकांशत: एल्कोहल सम्बंधी पेय पदार्थों में पाया जाना वाला इथेनॉल हेपेटाइटिस का एक महत्वपूर्ण कारण है। आम तौर पर एल्कोहल से होने वाला हेपेटाइटिस एल्कोहल के बढ़ते हुए सेवन के फलस्वरूप होता है। लंबे समय तक एल्कोहल का सेवन करने वाले लोगों में अन्य हेपेटाइटिस मरीजों की अपेक्षा हेपेटाइटिस सी पाया जाता है जिससे लीवर सिरोसिस नामक बीमारी होने का खतरा ज्यादा रहता है।
विज्ञापन
हेपेटाइटिस के लक्षण
शरीर में दर्द, कमजोरी, भूख कम लगना, उल्टी, कब्ज, गहरे रंग की पेशाब आना, हल्के रंग का मल होना, बुखार, सिर दर्द, पेटदर्द, शरीर में पीलापन आ जाना, खुजली होना, जोड़ों में दर्द, खून की उल्टी, मलाशय से रक्त आना, वजन कम होना।
ऐसे फैलता हेपेटाइटिस
दूषित इंजेक्शन के प्रयोग, शरीर पर गोदना, छेदना व नशीली दवाईयों के प्रयोग से, गुर्दे की डायलिसिस, एक से ज्यादा व्यक्ति के साथ असुरक्षित संभोग, गर्भवती माता से शिशु में, शरीर के किसी अंग के प्रत्यारोपण से, दूषित भोजन व जल के सेवन आदि से।
बीमारी से बचाव
परहेज के जरिए हेपेटाइटिस से बचा जा सकता है। साथ ही इंटरफे रोन, राइबावोरिन, अमान्टिडिन नामक दवाइयां ही इस बीमारी के लिए बाजार में उपलब्ध हैं। जबकि संजीदा रोगियों के लिए इस बीमारी से बचने का एक मुख्य उपाय लीवर प्रत्यारोपण है।
जन्म लेने के 24 घंटे में लगता हेपेटाइटिस बी का टीका
संस्थागत (सरकारी अस्पतालों) में जितने भी प्रसव होते हैं, उन सभी में बच्चे के जन्म लेते ही 24 घंटे के भीतर बच्चे के हेपेटाइटिस बी का टीका लगा दिया जाता है। जबकि एक साल के बच्चे को पेंटाबैलेंट नामक टीका लगाया जाता है। जो पांच तरह की बीमारियों गलघोंटू, कालीखांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी व हीमोफीलस व्इंफ्ल्एंजी बी की रोकथाम करता है। पेंटाबैलेंट का इंजेक्शन स्वास्थ्य विभाग की हर सीएचसी-पीएचसी पर हर बुधवार और शनिवार को लगाया जाता है। जिसकी 6 हफ्ते में पहली डोज, 10 हफ्ते पर दूसरी और 14 हफ्ते पर तीसरी डोज बच्चे को दी जाती है। 10 साल के बच्चे को टिटनेस व टाक्साइड का इंजेक्शन लगता है। स्वास्थ्य विभाग में अब तक दो बार इसे लेकर व्यापक स्तर पर अभियान चलाया गया है। जिसमें हर किसी को हेपेटाइटिस के इंजेक्शन लगाए गए।
दो बार चलाया गया व्यापक अभियान
सरकारी अस्पतालों में हेपेटाइटिस की रोकथाम के लिए अब तक दो बार बड़े व्यापक स्तर पर इसका अभियान चलाकर घर-घर बच्चे, बड़ों को इसका इंजेक्शन लगाया गया। जबकि जन्म लेने के 24 घंटे के भीतर व साल भर के बच्चे को हेपेटाइटिस के इंजेक्शन नियमित रूप से हर जगह लगाए जा रहे हैं। -डॉ. राकेश अग्रवाल, जिला प्रतिरक्षण अधिकारी
बड़ों की मौत का कोई रिकार्ड नहीं
जिले में हेपेटाइटिस से पांच साल के भीतर कितनी मौतें हुई हैं, इसका कोई रिकार्ड उनके पास नहीं है। क्योंकि हेपेटाइटिस से पीड़ित लीवर सिरोसिस या फिर लीवर कैंसर के मरीज जैसे ही यहां आते हैं उन्हें उपचार के लिए हायर सेंटर जैसे राममनोहर लोहिया, मेडिकल कॉलेज, पीजीआई रिफर कर दिया जाता है। इसलिए इससे सम्बंधित मौतों का कोई रिकार्ड विभाग के पास नहीं रहता। - डॉ.रतन कुमार, सीएमएस जिला अस्पताल गोंडा