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आधी रह गई किताबों की बिक्री
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 29 Sep 2014 01:15 PM IST
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मोती महल लॉन में सजा 12वां राष्ट्रीय पुस्तक मेला खट्टी-मीठी यादों के साथ रविवार को विदा हो गया। दस दिवसीय मेले में इस बार किताबों की कम बिक्री से प्रकाशक मायूस दिखे और पुस्तकों के प्रति शहरियों के घटते रुझान पर चिंता जताई।
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इस बार मेले में मात्र 1.70 करोड़ रुपये की किताबों की बिक्री हुई, जो गत वर्ष की तुलना में 30 प्रतिशत कम है। हालांकि, रविवार को मेले के समापन पर खासी भीड़ रही।
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19 सितम्बर से लगे मेले में 211 स्टॉल के साथ ही पहली बार पांच कवि सम्मेलन व 14 पुस्तकों का विमोचन हुआ। इसके अलावा साहित्यकार शिरोमणि सम्मान की शुरुआत भी प्रशंसनीय रही।
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मेले की शाम तो सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गुलजार रही, पर प्रशासक मायूस ही रहे। ज्ञानपीठ प्रकाशन के राहुल श्रीवास्तव बताते हैं कि आयोजकों के आपसी मनमुटाव का दुष्प्रभाव खरीदारी पर पड़ा।
गत वर्ष करीब पांच लाख रुपये की किताबें बिकी थीं, पर इस बार नतीजे चिंतनीय हैं। तीन महीने के अंतराल में दो पुस्तक मेले हुए। ऐसे में खरीदार कहां से आएंगे।
पहले उमेश ढल, देवराज अरोड़ा व मनोज चंदेल मिलकर भव्य पुस्तक मेला आयोजित करते थे, फिर मनोज सिंह चंदेल ने अपना पुस्तक मेला शुरू किया, जिससे पाठक बंट गए।
सामयिक प्रकाशन के ललित कहते हैं कि युवाओं को जोड़ने में नाकामयाब रहे। सारा फोकस पुस्तकों के विमोचनों व सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर रहा। महंगे स्टॉल और दुकानों की संख्या बढ़ाना नुकसानदायक रहा।
प्रभात प्रकाशन के कमलापति कहते हैं कि साहित्यिक गोष्ठियों की संख्या बढ़ाने के बावजूद खरीदारों को नहीं जोड़ पाए, जो सोच का विषय है।
राजकमल प्रकाशन के विनोद बताते हैं कि पुस्तक मेले में दस प्रतिशत की छूट किताबों पर मिलती है, जबकि ऑनलाइन खरीदारी पर 50 प्रतिशत तक छूट मिलती है। ऐसे में मेलों से किताबों की बिक्री घटनी लाजिमी है।